आसान है गाली देना देश, सरकार और समाज को

चलिए पहले आसान बातों की बात करते हैं। आसान बात है आलोचना, आसान है गाली देना। देश, सरकार, सेना, नेताओं को गाली देना बहुत आसान है। आम आदमी को लगता है कि सरकार का काम है देश चलाना और उनका काम है गाली देना, आलोचना करना।

आलोचना हर स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होती है। लेकिन आलोचना का हक सबको नहीं होता। ये हक सबको इसीलिए नहीं होता क्योंकि कई बार आलोचना और गाली में अंतर नहीं रह जाता। आलोचना का उद्देश्य संवर्धन होता है। जिस आलोचना का कोई फल ना हो, वो नकारात्मक और निकम्मी होती है।

अब कठिन बातें करते हैं: सड़क पर थूकने से खुद को रोकना, सरकार चलाने में अपना योगदान जानना और देना, सेना जो करती है उसका एक प्रतिशत अनुशासन अपनी जिंदगी में लाना, सही नेताओं के बारे में बात करना, सही बातों के बारे में बात करना।

लेकिन ये कईयों से नहीं हो पाता। हमारा सारा लॉजिक कन्विनिएँस का है। हमारे लिए जब जो बात आसान होती है, हम वो करते हैं। जिस देश के नागरिक सिग्नल तोड़ना अपना सम्मान मानते हैं, सड़क पर अपने हिसाब से इसलिए चलते हैं कि उन्हें कहीं जाने में आसानी होगी, संविधान के अधिकारों पर अपना हक़ जताकर हो हल्ला करते हैं पर कर्तव्य भूल जाते हैं, वैसे देश के लिए सड़सठ साल का गणतंत्र हो जाना अपने आप में एक मिसाल ही है।

स्वच्छ भारत पर हँस लेना बहुत आसान है। उतना ही आसान है टॉफ़ी, च्यूइंग ग़म का रैपर हवा में उड़ा देना क्योंकि आपके बाप उसे उठाने आएँगे।

सबसे आसान है ये कह देना कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। भाई मेरे बहुत कुछ हो रहा है, और होता रहेगा। देश को कुछ हो जाने के लिए आप जैसे रंडी-रोना करने वालों की ज़रूरत नहीं है। निकम्मों की तादाद उतनी नहीं हुई है कि उनके कह देने से भारत ठहर जाए।

ऐसे लोगों से, जब भी आप सुनें तब, पूछिए कि उसके हिसाब से क्या होना चाहिए कि देश का कुछ हो जाए। इनके पास शायद जवाब नहीं होगा।

आसान होता है आइडियलिस्टिक बातें कर देना कि ये सरकार अच्छी नहीं है, वो योजना पिछले सरकार की थी, मेट्रो तो शीला दीक्षित ने बनवाई थी… कठिन है इस बात को स्वीकारना कि कोई सरकार दो दिन के लिए नहीं आती और ना ही ऐसा काम करती है कि किसी का बुरा हो। इसमें हम आप योगदान ना दें तो हर योजना असफल होती रहेगी चाहे वो मोदी की हो, मनमोहन की हो या नितीश की।

कठिन है सामने की परिस्थिति को स्वीकारना और उसे देखकर एक समाधान देना। मोदी या केजरीवाल पाँच साल की ना बदलने वाली सच्चाई है। वो हमारे गाली वाले ट्रॉल से, वेमुला-मालदा-दादरी की राजनीति से, हमारी भयानक आलोचना से नहीं जाने वाले। वो अपने काम के कारण आएँगे और जाएँगे।

हमें अपनी बेहतरी के बारे में यहाँ होते हुए और इन बातों को जानते हुए समाधान की खोज में बात करनी होगी। इन्टॉलरेंस, ग़रीबी, बुलेट ट्रेन, किसान, दादरी, ब्रह्मोस जैसी बातें होती रही हैं, होती रहेंगी। हर संस्था को अपना काम करने दीजिए। घटिया न्यूज देखियेगा तो वही दिखेगा। घटिया नेता चुनिएगा तो आप ही को झेलना होगा।

इसीलिए चर्चा अपने सहयोग की संभावना की तरफ मोड़िए। हमारा संविधान और देश सच में महान है आप मानिए, ना मानिए। ये भी याद रखिए कि जिस तरफ देखकर आप रोते हैं कि वहाँ ऐसे होता है, यहाँ तो कुछ नहीं है तो जरा वहाँ के न्यूज़ चैनल, पेपर आदि भी पढ लीजिएगा।

प्रजातंत्र परफ़ैक्ट नहीं होता। सौ में साठ वोट देते हैं, उनका एक चौथाई, यानि की पंद्रह, एक पार्टी को बहुमत देती है जिनके चुने हुए लगभग तीन सौ लोग ये डिसाईड करते हैं कि क्या होना चाहिए। यानि की अफेक्टिवली देश के दस-पंद्रह परसेंट लोगों द्वारा चुने तीन सौ लोग सवा अरब का भविष्य सुधारने की क़वायद में होते हैं।

प्रजातंत्र की अपनी ख़ामियाँ हैं लेकिन अभी तक का सबसे बेहतर तरीक़ा है शासन का। और इसमें आम जनता की बहुत बड़ी भागीदारी है। गाली देकर, फेसबुक से ज्ञान लेकर, हैशटैग ट्रेंड कराकर इससे भागिए मत।

गणतंत्र देश बन नहीं जाते संविधान बनाकर, जनता खुद गणतंत्र बनाती है संविधान को वैयक्तिक और सामाजिक स्तर पर अपना कर।

खुद से पूछिए संविधान के कितने हिस्से को आप जानते हैं, कितने को अपनाया है। समझ में आ जाएगा कि इंडिया गेट से परेड क्यों ज़रूरी है, सेना क्यों ज़रूरी है, सरकारें क्यों ज़रूरी हैं और, सबसे ज्यादा, आप क्यों ज़रूरी हैं अपने समाधान की कोशिशों के साथ।

बधाई हो कि आप भारत में हैं और भारत एक गणतंत्र है।

जय हिन्द, जय भारत!….

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