ग़ुलाम अली लाईव (Ghulam Ali at Delhi)

तबलची की टिक-ठक और ग़ुलाम अली साहब के अलाप से शुरू हुआ कार्यक्रम। ‘ये पाँच मिनट मुझे दे दो और बाक़ी के सारे मिनट आपके’ के साथ खाँ साहब ने मंडली के साथ सुरों की फाइन ट्यूनिंग, साउंड चेक आदि किया।

इस तरह के कार्यक्रमों की ख़ास बात ये होती है कि वो चिरकुटों, कूल डूड्स और हाट चिक एण्ड चिकलेट्स से महफ़ूज़ होते हैं। हमने कूल डूड्स बहुत खोजें लेकिन कोई मिला नहीं।

बहरहाल आग़ाज़ हुआ और बड़े ही ख़ूबसूरत अंदाज में हुआ:

रोज़ कहता हूँ भूल जाउँ उसे
रोज़ ये बात भूल जाता हूँ

अहमद फ़राज़ की ग़ज़लों से शुरूआत हुई और ‘हंगामा है क्यों बरपा’ पर जाकर ख़त्म हुई। ‘फिर उसी रहगुज़र पर शायद, चुपके चुपके, कल चौदहवीं की रात थी, ये बातें झूठी बातें हैं, आवारगी, दिल में एक लहर सी’ कुछ चुनिंदा ग़ज़लों में थीं। दो पंजाबी गाने भी गाए।

कुछ सिचुएशनल जोक भी मारे: (किसी ने फरमाईश की) ‘इतनी मुद्दत बाद मिले हो’… इन्होंने चुटकी ली, ‘अरे हम तो मिलते ही रहते है!’ एक ने कहा, ‘हमको किसके ग़म ने मारा’… जवाब आया, ‘हमें क्या पता भाई!’

कुछ डिस्टर्बिंग कैमरा वालों को झाड़ भी लगाई और ये भी बताया कि उनका नाम ग़ुलाम अली कैसे पड़ा। जब एक महिला एंकर ने उनके रोमांटिक होने के पीछे की वजह और कोई प्रेम प्रसंग की बात पूछी तो कह दिया कि ‘आपको लिख के भेज दूँगा’।

कन्सर्ट्स की ख़ासियत होती है कि गायक स्वतंत्र होता है, वह एक ही लाईन को क़रीब बारह तरीक़े से गाता है (दिल में एक लहर सी उठी है अभी)। गाते भी गये, मतलब भी समझाते गये और सीटी मारने वालों को भी प्यार भरी डाँट पिलाई: मुझे पता है आप अप्रिसिएट कर रहे हैं, लेकिन ये थोड़ी क्लासिकल चीज़ है!

वक़्त ने आवाज़ पर अपनी ख़राश छोड़ दी है पर अंदाज वही है। पुरानी मधुरता नहीं रही पर पचास साल (1964 से गाने लगे थे लाईव कन्सर्ट्स में) से गायकी करने वाले की आवाज़ में बदलाव तो होगा ही।

हम भाग्यशाली हैं कि उन्हें गाते हुए सुन लिया, पता नहीं फिर कब मौक़ा मिले।

उन्हीं के द्वारा सुनाया एक शेर ये भी था जो ‘हंगामा है क्यों बरपा’ में जोड़ा था उन्होंने:

पहले तो पिलाते हैं, फिर सबको बताते हैं
इससे न मिले कोई, ये शख़्स शराबी है

हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है….

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