दिल्ली मेट्रो और आंटी का लिप्स्टिक नारीवाद: आप उतने भी वरिष्ठ नहीं हैं!  

हमारे एक मित्र हैं फेसबुक पर। उन्होंने एक वाक़या अपनी वॉल पर लिखा है कि किस तरह से उनके सत्तर साल के पिता और उनके एक बुज़ुर्ग मित्र को, एक महिला ने ‘वरिष्ठ नागरिक’ वाले सीट पर ये कहकर बैठने नहीं दिया, “आप उतने भी वरिष्ठ नहीं हैं।”

हमारे मित्र ने संस्कारों के दायरे में रहते हुए कुछ नहीं किया। उनकी जगह हम या आप भी रहते तो कुछ नहीं कर पाते। महिला स्वस्थ थीं, और चालीस-पैंतालीस साल की रही होंगी।

हमारे मित्र का पूछना है कि क्या यही नारीवाद है? अगर हाँ तो ये किस तरह का नारीवाद है? 

मेरी समझ में ये नारीवाद तो बिल्कुल नहीं है। ये दो पैसे की ओछी हरकत है उस महिला की जिसने सिर्फ महिला होने का फ़ायदा उठाया। राड़पन और चिरकुटई सिर्फ लौंडों का एक्सक्लूसिव डोमेन नहीं है।

आप किसी भी लड़की से पूछिए कि लेडीज़ कम्पार्टमेंट में कुछ लड़कियाँ और कुछ महिलाएँ किस तरह से आचरण करती हैं तो सारा ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो’ का कॉन्सेप्ट बिखर जाएगा।

समाज में ‘इक्वालिटी’ का मतलब ये नहीं कि जो अत्याचार पुरूषों ने सदियों किया है वो अब महिलाएँ करने लगें। ये लिप्स्टिक नारीवाद है, जिसमें हम नारी को पूरे कन्टेक्स्ट से बाहर खींचकर, उसे सिर्फ नारी रहने देते हैं और बाकी बातों में जो हमारे मन की है, उसे चुनकर निशानेबाज़ी करने लगते हैं।

इस बात को लिप्स्टिक फ़ेमिनिस्ट कुछ यूँ जस्टिफाइ करेगा: “अरे इतनी ही दिक्कत थी तो बगल के पुरूष को सीट छोड़ देनी चाहिए थी। एक महिला क्या उस स्थान पर नहीं बैठ सकती जिस पर पितृसत्तात्मक सत्ता ने उसे बैठने से वंचित कर रखा है? महिलाओं को हर उस जगह पर बैठना चाहिए जहाँ पुरूष बैठ सकते हैं। उन्हें बराबरी का हक है, और हम ये हक लेकर रहेंगे।”

इस नारीवाद में पुरूष भी सिर्फ पुरूष रह जाता है। वो ना तो बीमार हो सकता है, ना ही बुज़ुर्ग हो सकता है, ना बाप, ना दादा, कुछ नहीं। और चूँकि आप पुरूष हैं तो आप झेलिए क्योंकि समाज पेट्रियार्कल है। 

और यही कारण है कि मेट्रो में मैं पूरे डेढ़ घंटे के सफ़र में भी मेरे सामने महिलाओं वाली सीट खाली भी हो तो मैं नहीं बैठता। गलती से बैठा, और किसी महिला या लड़की के आने पर उठ भी गया, तो वो ऐसे घूरती हैं मानो मैंने किसी का दुपट्टा खींच लिया हो! 

लेकिन ये लिप्सिटिकिया नारीवादियों के कारण ही मैं मेट्रो में बीच की सीट पर बैठता हूँ। अगर कोई बुज़ुर्ग आएँ, महिला हों या पुरूष, तो जगह छोड़ देता हूँ। लेकिन हाँ कोई भी लड़की या महिला जो पूर्णतः स्वस्थ हो और मुझे घूरे और गिल्टी फील कराए, तब तो सवाल ही नहीं है कि उनका लिप्स्टिक उस गर्मी और भीड़ में पिघल ही क्यों ना जाए, मैं सीट नहीं देने वाला।

सीधी सी बात है, जिन्हें मालूम ना हो, लड़के भी इन्सान होते हैं। डेढ़ घंटे चाहे आप खड़ी रहें या मैं, दोनो की पीठ में दर्द होगा। आप भी स्वस्थ हैं, मैं भी स्वस्थ हूँ। आपको भी सीट चाहिए, मुझे भी सीट चाहिए। मैं पहले आया तो मैं बैठूँगा, और आप पहले आईं तो आप बैठेंगी। ना तो मैं खड़े होकर आपको घूरता रहूँगा कि ‘हाय हाय! मैं कितना दुबला हूँ, कैसे नब्बे मिनट खड़ा होकर जाऊँगा’, ना तो आप मुझे सीट देंगी। 

तो यही कर्टसी मुझे भी क्यों ना एक्सटेंड की जाए! आपके लिए पूरी बॉगी अलग है, वहाँ बैठिए। हर बॉगी में आपकी रिज़र्व सीट है, वहाँ बैठिए। अगर आप अस्वस्थ हैं तो आपको कहने की ज़रूरत नहीं होगी, मैं अपनी स्वस्थ माँ को उठा दूँगा अगर आपको कोई सीट ना दे रहा हो तो। लेकिन ये तो एकदम चिरकुटों वाला काम है कि आप एक तो ‘वरिष्ठ नागरिक’ के लिए आरक्षित सीट पर बैठी हैं, और दूसरा आप ये बेहूदगी भरी बात कहती हैं कि ‘आप उतने भी वरिष्ठ नहीं हैं।’

फिर तो मैं भी आपको ये कह दूँगा कि ‘आप उतनी भी महिला नहीं हैं!’ क्योंकि महिलाएँ आम तौर पर ऐसी नहीं होतीं। आप में ज़रूर कुछ कमी रह गई होगी। ….

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