पिंक कोई बेहतरीन फ़िल्म नहीं है, फिर भी देखना सबको चाहिए

‘पिंक’ का नाम पिंक क्यों है ये फ़िल्म में नहीं बताया है। मेरे हिसाब से, चूँकि ये फ़िल्म सामाजिक स्टीरियोटाइप्स को तोड़ती है, पिंक कलर के लड़कियों से जोड़ा जाता है, इसीलिए इसका नाम शायद पिंक रखा हो।

ख़ैर मीडियोक्रिटी के दौर में हर ‘ठीक-ठाक’ फ़िल्म को अच्छी, ‘अच्छी’ को बेहतरीन, और ‘बहुत अच्छी’ को पता नहीं क्या क्या कह दिया जाता है। ये फ़िल्म अच्छी है। ये फ़िल्म कई मायनों में अच्छी है। ये फ़िल्म फ़िल्म विद्यालयों में दिखाने लायक है कि एक सिंपल कहानी से, बिना किसी बेवजह के थिएट्रिक्स का सहारा लिए, आप कहानी कह सकते हैं। ये फ़िल्म समाज के लिए भी एक संदेश लेकर आती है जिसे हर आदमी को समझना ज़रूरी है।

इसके डायलॉग्स आपको हर फ़ेमिनिस्ट कैम्पेन के ब्लॉग से मेल खाते लगेंगे जहाँ कई बार हम ये पढ़ते है कि ‘लड़की के ना का मतलब ना ही होता है, उससे ज्यादा कुछ नहीं’। कोर्ट के जिरह के दृश्य फ़िल्म का आधे से ज्यादा समय लेते हैं, क्योंकि मुख्य कहानी वहीं होती है। लेकिन कोर्ट रूम के अंदर का संवाद आपको वैसा ही लगेगा मानो कई बार आप देख चुके हैं।

पीयूष मिश्रा एक वक़ील हैं जो कि ये साबित करने पर तुले हैं कि तीन लड़कियाँ वेश्यावृति करती हैं। इसके डायलॉग आपने अगर वॉलीवुड की फ़िल्मे देखी हैं तो खुद लिख लेंगे। हलाँकि अमिताभ बच्चन के संवाद आपको फ़ेमिनिस्ट ब्लॉग की याद दिलाएँगे। ये सब आपने कहीं ना कहीं पढ़ा हुआ है कि शराब पीना लड़की का कैरेक्टर तय नहीं करता; स्कर्ट-जींस से कैरेक्टर को तौलना गलत है; नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियाँ वैसी ही होती हैं, ये सोचना गलत है; लड़की मुस्कुरा रही है तो आपको बुला नहीं रही, वो आपको चूमने का लाइसेंस नहीं दे रही आदि आदि।

वॉलीवुड के कोर्टों में वक़ील वकालत कम और ओवरएक्टिंग ज्यादा करता है। वहाँ हमेशा वो दूसरे वक़ील को नीचा दिखाने के चक्कर में रहता है। वॉलीवुड के तमाम कोर्ट रूम (जॉकी एलएलबी को छोड़कर) ऐसे होते हैं कि लगता है बहुत मेहनत से बनाया होगा। एक आदमी गीता लिए खड़ा रहता है, एक आदमी सबको बुलाता रहता है। और फिर वक़ील के रोल को निभाता आदमी अपने जलवे दिखाता है सो अलग।

संवादों के सुने-सुने से, पढ़े-पढ़े से होने के बावजूद अपनी अदाकारी से, और एक नेचुरल परफ़ॉर्मेंस से दोनों ही वक़ील आपको खींचते हैं अपनी ओर। हाँ, पीयूष मिश्रा, शायद उनके बोलने की अदा ही वैसी है, पिछली कई फ़िल्मों की तरह रुक-रुक कर ही बोलते हैं जो कि अजीब लगता है कई बार।

कहानी बहुत सीधी है। तीन लड़कियाँ, तीन लड़कों से मिलती हैं किसी रॉक कन्सर्ट में और वहाँ से डिनर का प्लान बनता है। सब लोग किसी रिसॉर्ट में जाते हैं। वहाँ हँसी का माहौल है, लोग दारू के पेग बनाते हैं। सब दारू पीते हैं और फिर रईसज़ादों को लगता है कि लड़की अब टुन्न है तो बिस्तर पर ले चलें। बहाने बनते हैं और एक एक कर लड़के एक लड़की को लेकर निकलते हैं। तीसरी लड़की और लड़का अकेले हैं। लड़का छूने और चूमने की कोशिश करता है, लड़की मना करती है। वो नहीं मानता तो सर पर बोतल फोड़ देती है।

यहाँ से फिर वही पुरानी कहानी की लड़के का चाचा विधायक है, लड़कियाँ डरी हुई हैं। फिर कुछ दिन बाद लड़की केस करती है तो लड़के वाले पहुँच का इस्तेमाल करते हुए लड़की पर अटेम्प्ट टू मर्डर, वेश्यावृति आदि का चार्ज लगाकर गिरफ़्तार करा देते हैं। उसके बाद कोर्ट में जिरह होती है।

तीनों लड़कियों, तापसी, कीर्ति और आन्द्रिया, ने और अमिताभ तथा पीयूष मिश्रा ने अच्छी अदाकारी दिखाई है। फ़िल्म में हर जगह एक सीन से दूसरे सीन में जाने के लिए काले फ़्रेम का प्रयोग हुआ है जो कि एक समय के बाद बोरिंग और अटपटा लगने लगता है। एडिटर कुछ और कर सकता था।

संगीत अच्छा है। ‘कारी-कारी’ गाना संगीत और बोल, दोनो हिसाब से अच्छे लगते हैं सुनने में। बैकग्राउंड स्कोर भी फ़िल्म की कहानी को सपोर्ट करती है और आपको पता भी नहीं चलता कि बैकग्राउंड स्कोर भी है। अंत में अमिताभ की आवाज़ में एक कविता भी है, हॉल से निकलने से पहले सुनिएगा ज़रूर। कैमरे ने दिल्ली को ख़ूबसूरती से कैप्चर किया है। इसकी भागती ट्रैफ़िक और जलती बुझती बत्तियाँ बहुत ही मनोरम हैं। एक सीन ख़ासकर आपको अच्छा लगेगा जब एडिटर ने जलती बुझती ट्रैफ़िक लाइट और नॉर्मल स्ट्रीट लाइट का एक मोन्टाज सा डाला है।

डायरेक्टर ने कहानी के कसाव को बनाए रखा है। एक घटिया डायरेक्टर इसमें बीस मिनट और जोड़ सकता था जिससे कहानी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लड़कियों के घरवालों का रिएक्शन जोड़कर इस फ़िल्म को घटिया बनाया जा सकता था।

ये फ़िल्म अच्छी इसलिए है कि ये आपको वो बात कहती है जो आप सुनना नहीं चाहते। ये आपसे वहाँ सवाल पूछती है जो कि समाज के लिए थोड़ा अन्कम्फ़र्टेबल है। ये आपको बताता है कि आज के समाज में चाहे लड़की पाँच लड़के के साथ रिलेशन में रह चुकी हो, चाहे वो सेक्स वर्कर हो, आपकी बीवी हो, वो अगर सेक्स करने से मना करती है तो उसका मतलब है कि आप रुक जाइए।

स्कर्ट, जींस, शराब, शारीरिक संबंध बनाना एक निजी फ़ैसला है। इससे किसी को कोई निमंत्रण नहीं मिलता। इससे आपको ये लाइसेंस नहीं कि आप उस लड़की के कैरेक्टर के बारे में सोचें और फिर उसकी मुस्कान को बिस्तर तक ले जाने का फ़्री पास समझ लें।

ये फ़िल्म एक सामाजिक संदेश देती है। पाँच और आठ स्टार देखकर मत जाइए। ना ही ये सोचकर जाइए कि माइंड-ब्लोइंग या कालातीत कुछ बन गया है। ये एक सीधी सी कहानी है, जिसको वैसे ही दिखाया गया है जैसा दिखाया जाना चाहिए। इसमें कुछ नया नहीं है लेकिन फिर भी ये फ़िल्म देखना ज़रूरी है क्योंकि हर सप्ताह नए विषय पर फ़िल्म ना तो बनती है, ना बननी चाहिए। इसका नयापन इसकी हिम्मत है कि डायरेक्टर ने इस बात पर फ़िल्म बनाई।

इस मुद्दे को फ़िल्म की शक्ल देने के लिए हिम्मत चाहिए थी। इतनी छोटी सी, सरल कहानी पर कोई काम करना नहीं चाहता। इससे किसी को हीरो बनने का मौका नहीं मिलता। इसमें आपको लार्जर देन लाइफ होने की जगह नहीं है। इसमें ओवर द टॉप डायलॉग डिलीवरी का मौका नहीं है। इसमें आम सी कहानी है, जो होती हर रोज़ है, जानते सब कोई हैं, लेकिन कोई बनाता नहीं। क्यों नहीं बनाता, पता नहीं।

इसे देखिए क्योंकि इसे सबको देखना चाहिए। बच्चों को जरूर दिखाइए। कॉलेज के लड़कों को ख़ासकर देखनी चाहिए और अमिताभ के हर डायलॉग को अपने अंदर उतारना चाहिए कि लड़की तुम्हारे बाप की जायदाद नहीं है, वो हँसे, दस के साथ रहे, मिनी स्कर्ट पहने, तुमसे हँसकर बात करे, चाहे वो तुम्हारी गर्लफ़्रेंड ही क्यों ना हो, उसकी सहमति के बग़ैर उसको छूना भी ग़लत है।….

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