बारिशों को होते रहना चाहिए

ऑफिस से निकला तो बारिश हो रही थी। बारिशों को समय समय पर होते रहना चाहिए। हम तो प्लुवियोफाईल नहीं है लेकिन ऐसे ही लगता है कि बारिशों का होना और होते रहना बहुत ज़रूरी है।

बहुत चीजें धुल जाती हैं बारिशों में। समय के ना पहुँचने से और हवाओं की ग़ैरमौजूदगी में ज़मीं धूल की परत, चाहे चश्मे पर हो या दुनियावी आईने पर, बारिशें सब को धो देती हैं।

दुर्भाग्य ये नहीं है कि अखलाख मार दिया गया या अखिलेश। दुर्भाग्य है कि आदमी ने आदमी को मार दिया। अखलाख दफ़ना दिए जाते हैं, अखिलेश जला दिए जाते हैं, लेकिन कुछ हाथों पर खून का रंग बहुत दिनों तक चिपका रह जाता हैं। ये रंग तौलिए से रगड़ कर नहीं मिटाए जाते। इसीलिए कभी कभी बारिशें हो ही जाएँ तो अच्छा है।

दुर्भाग्य ये है कि आदमी आदमी को मारता रहेगा। दुर्भाग्य ये है कि ये मौतें पुनर्जीवित होती रहेंगी हर रोज़। इन मौतों का ज़िंदा रहना हमारे सभ्य समाज़ के सभ्य लोगों की सभ्य संध्याकालीन चाय की चुस्कियों के दौरान होने वाली बातचीतों के लिए ज़रूरी है।

कुछ रंगों का धुलना ज़रूरी है। उनका हमारे हाथों से धुल कर, रिसते हुए, जमीन पर गिरना और फिर बहते हुए कहीं दूर पहुँच जाना ज़रूरी है। ज़रूरी है कि ऐसी बारिशें हों जो हाथ से स्याही भी धो दे। ज़रूरी है कि ऐसी बारिशें हों जहाँ हमारी पहचान धुल जाए।

कभी निकलिए बाहर और धुल जाईए। ….

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