बाहुबली की जय!

बाहुबली देखी। आप भी देखिए। सीधी कहानी को कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है, ये इस फ़िल्म से सीखा जा सकता है। कोई महान संदेश नहीं है। कोई बनावटीपना नहीं है। खाटी दक्षिण भारतीय फ़िल्म के सारे ज़ायके आपको मिलते हैं इसमें। फ़ंतासी, डेथ-डिफाईंग हिम्मत, ग्रैविटी-शेमिंग स्टंट्स सब गुँथे हैं जो दक्षिण भारतीय सिनेमा में होते हैं।

युद्ध और प्रतिशोध पर आधारित कहानियों में बैकग्राऊंड स्कोर और एक्शन कोरियोग्राफ़ी का बहुत बड़ा हाथ होता है। बाहुबली इस बात का एहसास दिलाता है। युद्ध का एक एक दृश्य, चाहे मनुष्य और साँड़ की लड़ाई हो, आदमी-आदमी की लड़ाई हो या फिर एक पूरा का पूरा युद्ध, सब के सब आपको ये एहसास दिलाते हैं कि आप राजमाता के साथ खड़े होकर सारा कुछ देख रहे हैं।

बाहुबली जब आप एक थियेटर में देखते हैं तो वो आप पर उतरता है।

आप बाहुबली की दुनिया में डूब जाते हैं। संगीत आपका रोमांच चरम पर ले जाता है और सारी ओवर-द-टॉप मारधाड़ निगलने लायक बन जाती है। बैकग्राऊंड स्कोर तो लाजवाब है। एक रिदम में जब संगीत, नायक के साथ तीव्र और तेज़ होता जाता है तो लगता है कि घोड़े पर भाला लेकर आप स्वयं ही रणभूमि में उतर गए हैं।

वैसे गीत, चूँकि अनुवादित हैं तो, उतने अच्छे नहीं लगते पर आशा है कि तेलुगु में बेहतर होंगे।

सिनेमेटोग्राफ़ी तो बेहतरीन है ही। अवतार के लगभग समानांतर। उतना रंगीन नहीं है हर जगह पर जहाँ रंग चाहिए वहाँ दिखता है। एनिमेशन बहुत ही फ़्लूईड है। एनिमेटेड कैरेक्टर और वास्तविकता एक दूसरे से पिघलते हुए दो धातुओं के समान एक दूसरे में उतर जाते हैं। 

अदाकारी भी उत्तम है। निर्देशन भी आले दर्ज़े का है। कुछ लोग फ़िल्म के अंत से निराश दिखते हैं। कुछ लोग पूर्वार्ध वाले हिस्से को कह रहे हैं कि ज्यादा खिंच गया है। उन्हें यही कहूँगा कि आपका कहना जायज़ होता यदि ये फ़िल्म एक ही हिस्से की होती।

ये तो पहला हिस्सा है इसीलिए सारे पात्रों के विकसित होने का समय दिया है निर्देशक ने। जब इसे अगले हिस्से के साथ देखेंगे तो आपको वही मज़ा आएगा जैसा ‘गेंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के साथ आया था। वासेपुर के दूसरे हिस्से से कुछ लोगों को दिक्कत थी। 

असली दिक्कत है कि आधा देख कर आकलन नहीं करना चाहिए। पूरी हो जाने दीजिए तब देखा जाएगा। फ़िलहाल तो जाकर देखिए और इस बेहतरीन फ़िल्म को अपना समर्थन दीजिए।….

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