मितरों, बीफ़ खाते रहिए और वंदे-मातरम् गाते रहिए

पूरा हाथ पाँव मारा जा रहा है कि दादरी काँड चलता रहे। इसके चलते रहने में बहुत फ़ायदा है कुछ लोगों को। अब ये नहीं चलेगा तो कैसे लोग ‘हम बीफ खा रहे हैं, हमें मारो’ का इंटेलेक्चुअलिज्म दिखा पाएँगे।

दादरी काँड का ज़िंदा रहना आज़म खान जैसे मगजमारियों के लिए ज़रूरी है। ये खतम हो गया तो फिर नया काँड कराना होगा ताकि इनका रिलिवेंस बना रहे मुसलमानों के लिए।दादरी, मुज़फ़्फ़रनगर ज़रूरी हैं हिंदू अतिवादी नेताओं से ज्यादा, मुसलमान नेताओं के लिए। अब आज़म खान ‘मुसलमान बहुत ही ख़ौफ़ज़दा हैं’ नहीं कहेंगे तो करेंगे क्या। कैसे पन्ने फहरा कर कहेंगे कि यूएन जा रहे हैं। हास्यास्पद ही है कि पूरे दादरी प्रकरण में उत्तर प्रदेश की सरकार पर उँगली उठाने वाला अभी तक कोई नहीं मिला।

हिंदुओं द्वारा मुसलमान मार दिया जाय या मुसलमानों द्वारा कोई हिंदू मार दिया जाय, दोनों ही स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है ‘हिंदू वोट पोलराईजेशन हो रहा है’ कहकर मुसलमानों को भड़काकर वहाँ पोलराईजेशन करना।

अब मुसलमानों के हितैषी, ओवैशी जी, लालू जी, नितीश जी ये सब बीफ बैन पर नहीं बोलेंगे तो करेंगे क्या! अभी तो ट्रेडिंग बात वही है। हैशटैग जर्नलिज़्म तो आजकल उसी पर हो रिया है। 

हॉट टॉपिक है भाई, मुसलमान मर गया, हिंदुओं ने मार डाला, गो माँस खाने के लिए मार डाला… इससे बढिया कॉकटेल क्या होगा। इसको तो पपीते की डंठल में छेद कर कर के फूँक मारकर ज़िंदा रखना होगा।

आख़िर बात तो हिंदू-मुसलमान वाली है। सेकुलर राग अलापने वाले भी तो हवा देते ही रहेंगे। आप लोग भी अपना अपना खेमा बाँट लीजिए और ‘हम बीफ खा रहे हैं, हमें मार डालो’ बैनर के तले बीफ भक्षण कीजिए। लेकिन आपको कोई नहीं मारेगा। आपने मोहम्मद साहब का कार्टून थोड़े ही बनाया है। बीफ ही खा रहे हैं, खाते रहिए।

और वंदे मातरम् गाते रहिए।

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