संस्कारी सेंसर की कैंची: Bar Bar Dekho ना हुआ, कटरीना का Bra Bra Dekho हो गया! 

आजकल कटरीना और सिद्धार्थ की फ़िल्म ‘बार बार देखो’ पर सेंसर बोर्ड, जिसके पूरे नाम (सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफिकेशन) में कहीं भी सेंसर शब्द नहीं है, की संस्कारी दृष्टि पड़ी है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कैटरीना के ब्रा वाले (कुछ) दृश्य हमारी संस्कृति के ख़िलाफ़ हैं इसीलिए सेंसर ने उन्हें काट दिया है। सनद रहे, हमारे सेंसर बोर्ड ने जेम्स बॉन्ड को भी ‘बॉन्ड’ नहीं बनने दिया था। वो बॉन्ड होगा अपने घर में, बुढ़िया ‘एम’ के साथ।

हमने उस विदेशी हैंडसम हंक को बताया था कि कितने सेकेंड तक चूमना संस्कारी है, कितनी देर बाद वो हमारी संस्कृति को खराब करने लगता है, और कितनी देर बाद एकदम खराब कर देता है। सारा खेल सेकेंडों का है। ऐसे में कटरीना कौन सी चीज़ है। वैसे तो हमारे यहाँ ‘सरकाय लो खटिया जाड़ा लगे’ से लेकर ‘&%#* में दम है तो बंद करवा लो’ जैसी कालजयी पंक्तियाँ लिखी जाती रही हैं, लेकिन स्क्रीन पर चुंबन की लंबाई, कटरीना के पेट और ब्रा से परहेज़ है। 

लगता है कि बोर्ड के मेंबरान ‘बार बार देखो’ (Bar Bar Dekho) को अक्षरों के हेरफेर के कारण ‘ब्रा ब्रा देखो’ (Bra Bra Dekho) पढ़ गए। अब जब फ़िल्म का नाम ही ऐसा हो तो उन्हें लगा होगा कि ज्यादा बार ‘ब्रा’ देखने से हमारी संस्कृति कहीं खराब ना हो जाए। वैसे फिल्म के कई गाने आ चुके हैं जिनमें कटरीना के ‘टोन्ड ऐब्स’ आपको दिखते रहेंगे। 


इन्हीं गानों में कटरीना ने कहीं ब्लाउज़ (बिना बाँह के जो कि ब्रा से बस थोड़ा ही बड़ा होता है), कहीं ऐसी ब्रा जो दुकानों में दिखने वाली ब्रा जैसी नहीं है पर है ब्रा ही, कहीं बिकिनी भी पहन रखी है। लेकिन ये सब हर जगह हैं, और बहुतायत हैं। अब बात ये है कि सेंसर बोर्ड ने हर जगह से क्यों नहीं हटाया? 

या तो आप संस्कृति के पक्षधर बनिए और पूरा हटा दीजिए या फिर बिना बात के ऐसे तर्कहीन काम मत किया कीजिए। जब आपका काम सर्टफिकेट देने का है तो आप एक फ़िल्म के दृश्यों को क्यों काटते हैं? आप सीधा ‘एडल्ट’ सर्टिफ़िकेट दीजिए क्योंकि हमारे समाज में ब्रा तो लड़के, बच्चे, मर्द, औरतें आदि देखते नहीं। 

जैसा कि आप सबको पता ही होगा कि हमारा देश तो ब्रा को लेकर इतना सेंसिटिव है कि ब्रा का कोई पोस्टर किसी भी मैगज़ीन में नहीं दिखता। चाहे वो गृहशोभा हो, फ़िल्मफ़ेयर हो, सिने ब्लिट्ज हो, वॉग हो या कोई भी। ना तो हममें से किसी ने भी कहीं दुकान के बाहर ‘जॉकी ऑर नथिंग’ का कटआउट देखा है, ना ही टाइम्स ऑफ इंडिया की साइट पर ‘ब्यूटीज़ इन ब्रा’ की फ़ोटो गैलरी देखी है। 

और तो और अगर आप वेब सर्फिंग कर रहे हों तो आपको ‘सिलोरी’ का विज्ञापन भी नहीं दिखेगा जिसमें मॉडल ब्रा पहने होती हैं। मैं तो यहाँ तक अभ्यस्त हो गया हूँ कि जहाँ भी मुझे ब्रा दिखता है वहाँ अपने आप गुलाब के बड़े-बड़े दो फूल नज़र आने लगते हैं।


सेंसर बोर्ड को संसद से कहकर ऐसा एक क़ानून पास कराना चाहिए जिसमें ये कहा गया हो कि ब्रा पहनने वाली लड़कियाँ और महिलाएँ भी खुद को कभी ब्रा में ना देखें, इससे संस्कार पर असर पड़ेगा। ये काम वैसे सुप्रीम कोर्ट भी कर सकती है क्योंकि आजकल उनके पास भी दही हाँडी की ऊँचाई, नमक नमकीन होता है या नहीं, पीएमओ के अप्वॉइंटमेंट देखने आदि के अलावा कोई खास काम लगता नहीं कि है। 

इस तरह का संस्कारी आतंक बंद होना चाहिए। फ़िल्मों को बोर्ड सिर्फ सर्टिफ़िकेट दे कि किस उम्र का व्यक्ति कौन सी फ़िल्म देख सकता है। इसके अलावा हर फ़िल्ममेकर को ये छूट होनी चाहिए कि वो अपने हिसाब से फ़िल्में बनाए क्योंकि भारत का संविधान उसे अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। सीधी सी बात है कि दर्शक आख़िरी फ़ैसला देता है, दर्शक समाज का हिस्सा भी है और समाज भी। बोर्ड के चार लोगों की मानसिकता से पूरे समाज की मानसिकता तय नहीं होनी चाहिए।….

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