साबुनदानी की गाड़ियाँ

तब न तेल के दाम बढ़े थे न हमारी गाड़ियों में पेट्रोल डलता था लाद लेते थे साबुनदानियों में दुनिया भर के कंकड़, गिट्टियाँ, बालू और उबड़ खाबड़ सडको पर दौड़ती थी हमारी बिन चक्कों की गाड़ियाँ एक पतली डोरी के दम पर जिसे खींचते हुए नाक से एक गाढ़ी, पीली धार होठों तक पहुँचती […]

Happy Rakshabandhan, is it?

लगभग सोलह साल हो गए कि मेरी बहन ने हाथ पर राखी नहीं बांधी। आमतौर पर वो मुझे राखी भेज देती थी या कभी कभी देर से पहुँचती थी तो मेरी राखी उसी दिन होती थी। कभी कभी ये भी हुआ कि मैंने कह दिया कि तेरे नाम से खरीद कर बाँध लूँगा तू भेजने […]

संवेदनशून्य मैं

आमतौर पर मैं आज़ादी या किसी और भी खुश होने वाले दिन खुश नहीं होता। कारण मुझे पता नहीं और न कभी मैंने इस विषय पर कोई आत्मचिंतन किया है । हो सकता है कि मुझे ज़रूरत महसूस न हुई हो। होने को तो प्याज का दाम भी कम हो सकता है और देश की […]

बड़े जर्नलिस्ट

आज फर्स्ट इयर के बच्चों के ओरिएंटेशन के लिए किसी तथाकथित बहुत बड़े जर्नलिस्ट को बुलाया गया था। वैसे जिसको भी बुलाया जाता है वो आम तौर पर बड़े ही होते हैं। और अगर देखने से, या बोलने से बड़े न लगें तो उनके बारे में बताकर उन्हें बड़ा साबित कर दिया जाता है। ख़ैर, हमें […]

धार्मिक अराजकता और धर्म

शाम होते ही लाल बत्ती पर ही एक पूरा कोना धार्मिक गीतों पर नाच का स्टेज बन जाता है और रही सही कसर प्रोजेक्टर लगा कर पूरी हो जाती है। अंधभक्तों का एक मजमा लग जाता है और आधी से ज्यादा सड़क भोलेनाथ के नाम चढ़ जाती है। पुलिस हाथ बांधे टुक टुक ताकती रहती है।