कमरे के भीतर

महीनों से वो घर से बाहर नहीं निकलता। न कहीं जाता है, न कहीं से आता है। किसी ने उसे कुछ करते हुए नहीं देखा। सिर्फ़ जगता है, बेसिन तक जाता है, चेहरा धोता है, बाथरूम से निकलता है, ब्रश करता है, कुछ खाता है और फिर उसी कमरे में घुस जाता है जहाँ से […]

औसतन, औसत लोग मर जाते हैं…

  औसत इंसान, जिसे अंग्रेज़ी में ‘मीडियोकर’ भी कहते हैं, कौन है? डिकेंस, ‘हार्ड टाईम्स’ में, लिखते हैं कि रोज़ वही दिनचर्या, वही घर से निकलना, उसी फुटपाथ पर, उसी लय में पैर पटकते हुए, फैक्ट्री में जाना और आना, शायद ये परिभाषा है औसत इंसान की। अजीब लगता है जब सुनता हूँ कि फ़लाँ […]

क्या यार! बलात्कार बंद हो गए…. बताईए!

देश में अचानक बंद हो गए बलात्कारों और ‘पेड़ पर लटके शवों’ के ना दिखने से मैं चिंतित हूँ। मैं ना तो दलित चिंतन कर पा रहा हूँ और ना ही इस घिनौने कृत्य की क्रांतिकारी रूप में भर्त्सना। सरकार को #RailFareHike अभी नहीं करना था। मीडिया को समाज के मज़े लेने देते कुछ दिन। […]

Crisis in Iraq: अमेरिका के मानवाधिकारों वाला झंडा कहाँ है?

इराक़ में शिया और सुन्नी की लड़ाई चल रही है और स्थिति काफ़ी घटिया है। अमेरिका जो कि फुस्स बात पर ‘मानवीय अधिकारों के हनन’ की दलील देता अपनी सेना तेल संपन्न देश में पहुँचा देता था, आज चुप है। क्यों चुप है भगवान जाने! सीरिया में जो हाल है वो वहीं के लोग जानते […]

बधाई हो, बलात्कार हुआ है! (Badaun rape case)

बलात्कार पर राजनीति शुरू हो गई है। बलात्कार पर इस देश में राजनीति और मीडिया कवरेज के अलावा कुछ होता भी नहीं। याद है दिसंबर २०१२ का निर्भया कांड? उसके बाद अगले मार्च तक बस बलात्कार ही होते रहे। बच्ची का बलात्कार हो गया, वृद्धा का बलात्कार हो गया, दलित का बलात्कार हो गया… जी […]