ख़्वाबों में आते जाते

ख़्वाबों में आते जाते देखा है तुम्हें जवाबों में तेरा नाम कई बार आया है तेरी लाल बिंदिया ने सवाल छोड़े थे कई जो मेरे कमरे के आदमकद शीशे पे अकेली सोई हुई है दाहिनी तरफ एकदम उस जगह पर जहाँ मेरा दिल होता है तेरे माथे से चुराया था मैंने उसको जब तू ख़्वाबों […]

दीवाली, पटाखे और इंटरनेटिया हिंदू झंडेबाज़

इंटरनेटिया हिंदू लोग ख़फ़ा हो गए हैं कि दीवाली पर ‘प्रदूषण’ की चर्चा होती है जबकि सालों भर गाड़ियाँ चलती है, फ्रिज से सीएफ़सी निकलता है, फैक्ट्री चलती है वग़ैरह वग़ैरह। और ये सब चाल है एक ‘हिंदू पर्व’ को दबाने का। जब आप इन्हें ‘हिंदू’ शब्द पर घेरेंगे तो कहेंगे कि हिंदू एक ‘जियो-पॉलिटिकल […]

समझदारी का रोग

फिर से फ़ेसबुक से मन उचट रहा है। हमें एक बीमारी हो गई है, खुद को समझदार समझने की और अपना लिखा पढ़कर लगता है कि यहाँ पर कुछ भी लिखूँ तो एक ही उद्देश्य होता है कि मैं खुद को सबसे बड़ा विद्वान, तत्वज्ञानी, और समझदार दिखाना चाहता हूँ और बाकी लोगों को नीचा। […]

माँसाहार और साईंस की दलीलों के नाम

तुम इसलिए नहीं खाते क्योंकि तुम्हें नहीं खाना और उसके लिए दलील देने की ज़रूरत नहीं है।

Movie review: Haider is a must watch

When Shakespeare is the base and Vishal Bhardwaj the director and storyteller, you get to see masterpieces like Maqbool, Omkara and now, Haider. Haider is the last of the Bhardwaj’s Shakespearean trilogy and the director has just taken the tempo of his style of storytelling forward. For the starters, you ought to have some patience […]