AIB Roast: Mainstreaming verbal pornography, just because you CAN

The supposedly ‘cool’ AIB Roast is mainstreaming filth or verbal pornography. In a nation where ‘deti hai to de warna kat le’ is sold as literature and being read by thousands, discussed in everyday discourse, no wonder it is getting likes and support by people who have bachelors degree, can read and write and have […]

AIB Roast of Arjun and Ranveer: Your roast is just Vulgar and Filthy, nothing else

After seeing too many ‘AIB Roast of Arjun Kapoor and Ranveer Singh’, and knowing what ‘roast’ actually is in comedy genre, I decided to watch it. The first few sentences that the host, Karan Johar, has is ‘it is going to get filthier, dirtier and very very offensive.’ However, roasting is not that way. It […]

रवीश से मुझे दिक्कत है

दिक्कत तब से हुई है जब से दिल्ली के चुनाव घोषित हुए हैं। मैं भाजपा को वोट देता हूँ, आगे भी दूँगा। दिल्ली का वोटर हूँ नहीं पर सरकार भाजपा की चाहता हूँ। ये मैं पहले ही पैरा में क्लियर कर दे रहा हूँ क्योंकि रवीश कुमार आजतक क्लियर कर नहीं पाए कि वो किस […]

फिल्म रिव्यू: बेबी देखिए बत्रा जैसे हॉल में

बेबी देखिए जाकर। वो वाला बेबी नहीं और ना ही जानू वाला बेबी। अक्षय वाला बेबी देखिए। कसी हुई फिल्म है, मिनट भर भी बोर नहीं होंगे। सभ्य लोगों वाले हॉल में इसका आनंद नहीं आएगा वो भी गणतंत्र दिवस के आस पास होने पर। टुटपुँजिया हॉल या सिंगल स्क्रीन में देखिए। आपके स्टेटस को […]

द इकॉनॉमिस्ट का कल्चर ज्ञान: आर्टिकल के रूप में अजेंडाबाजी

बुद्धिजीवी भारतवासियों की पुरानी आदत है कि वेस्टर्न मीडिया जो भी लिखे, भारत के हालात पर भी, हम एकदम जीभ लगा के चाट लेते हैं और गुनगाण करते रहते हैं। कुछ लोगों की आदत होती है वो आर्टिकल शेयर करने की ताकि लोगों को पता चले कि वो वॉशिंगटन टाईम्स और द इकॉनॉमिस्ट भी पढ़ते […]

रैंडम रविवार के लेज़ी लम्हों में साहित्यिक फ़र्ज़ीपना

रात के बज रहे हैं बारह। काम बहुत है, मूड किसी काम को करने का है नहीं। पिछले कई महीनों से समयबोध ख़त्म हो चुका है। दिन और रात बस बीतते जाते हैं। कभी बाहर निकलता हूँ तो धूप देख लेता हूँ। रविवार की रात को फेसबुक का ट्रैफ़िक डिप मार जाता है क्योंकि सोमवार […]

जेने की बालकनी में हमारे एंकर

दिल्ली की मीडिया ज्याँ जेने (Jean Genet) रचित नाटक ‘ले बालकन’ या ‘द बालकनी’ टाईप हो गई है। जेने के नाटक में एक वेश्यालय (बालकनी) सत्ता में हो रही गतिविधियों का एक केंद्र जैसा दिखता है और बाहरी शहर की दुनिया का माईक्रोकॉज़्म या सूक्ष्म रूप है। मैं वेश्यालय के लिए रंडीखाना शब्द का इस्तेमाल […]

अमेरिकन स्नाईपर: फ़िल्म समीक्षा

अभी अभी ‘अमेरिकन स्नाईपर’ देखी। अच्छी फिल्म है। मतलब पाईरेटेड में भी प्रिंट बढिया था। देखिए कुछ चीजों में हम नैतिकता, या मोरालिटी का लोड नहीं लेते। इन दोनों शब्दों के, चाहे अंग्रेज़ी हो या हिंदी, मेरे लिए कई समयों और जगहों पर मायने नहीं होते। हीरो भी, ब्रैडली कूपर, जिसने क्रिस कायल नामक मशहूर […]

नीत्शे का सुपरमैन

जर्मन दार्शनिक नीत्शे ‘दस स्पेक ज़रथ्रुस्ट्रा’ में एक Superman, Overman या übermensch की परिकल्पना करता है। ये आपका कॉमिक्स वाला सुपरमेन नहीं है जो स्टील मोड़ता पाया जाता है। उसकी कल्पना बहुत ही वास्तविक थी कि मानवता का एक ही काम है और वो है बेहतर मानव बनाते रहना। इसके अलावा ह्यूमैनिटी को और कुछ […]