झुँड, झंडे और कई बार मर चुकी मानवता

मानव को मानव से परेशानी नहीं है, झुँड को झुँड से परेशानी है। सारी मौतें झुँडों और झंडों के लिए होती है। मानवता झुँड और झंडों की हर भीड़ के गुज़रने के बाद फुटपाथ पर पिसी हुई, दम तोड़ती मिलती है।

सेकुलर राग: गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है!

अगर आपको डंके की चोट पर गोमाँस खाने का शौक़ है, लेकिन मोहम्मद साहब का कार्टून नहीं देख सकते तो फिर आप भी डार्विन के सिद्धांत को चुनौती दे रहे हैं।

बारिशों को होते रहना चाहिए

ऑफिस से निकला तो बारिश हो रही थी। बारिशों को समय समय पर होते रहना चाहिए। हम तो प्लुवियोफाईल नहीं है लेकिन ऐसे ही लगता है कि बारिशों का होना और होते रहना बहुत ज़रूरी है। बहुत चीजें धुल जाती हैं बारिशों में। समय के ना पहुँचने से और हवाओं की ग़ैरमौजूदगी में ज़मीं धूल […]

गोमाँस ईटिंग फ़ेस्टीवल, बुद्धिजीविता, हिंदू-मुसलमान ब्ला, ब्ला, ब्ला

मैं क्या करता हूँ अजान सुनकर? एडजस्ट। क्यों? क्योंकि हिंदू धर्म सर्वसमावेशी है और बर्दाश्त करना सिखाता है। दूसरे धर्म और मत को जगह देना ही हिंदुत्व है। लेकिन आप ये सोच कर बैठ जाएँ कि आप जानबूझ कर किसी को उकसाएँगे और वो बर्दाश्त करता रहेगा तो ये आपकी भूल है।

मानवता, दंगे और ‘कम्यूनल दंगे’

काँग्रेस वाले दंगे जो होते हैं, उसमें मानवता नहीं मरती। वो कम्यूनल नहीं है। क्योंकि, पहली बात, मानवता को दंगे का पता चल जाता है और वो कुछ दिनों के लिए कहीं छुप जाती है और उसकी मौत नहीं होती और ना ही उसकी आँखो का पानी कोई देख पाता है।

मितरों, बीफ़ खाते रहिए और वंदे-मातरम् गाते रहिए

पूरा हाथ पाँव मारा जा रहा है कि दादरी काँड चलता रहे। इसके चलते रहने में बहुत फ़ायदा है कुछ लोगों को। अब ये नहीं चलेगा तो कैसे लोग ‘हम बीफ खा रहे हैं, हमें मारो’ का इंटेलेक्चुअलिज्म दिखा पाएँगे। दादरी काँड का ज़िंदा रहना आज़म खान जैसे मगजमारियों के लिए ज़रूरी है। ये खतम […]