Observations from a visit to Beijing

In the past one month many ‘firsts’ happened to me. I authored and published my first book; published my first research paper; for the first time some stranger recognised me and asked for an autograph, sat on an airplane for the first time; and finally visited a foreign place (other than Nepal) for the first […]

‘ज्वलंत’ मुद्दों के बीच मैं पार्टी बदल कर तटस्थ हो गया हूँ

वैसे तो समय तटस्थ रहने वालों का भी अपराध लिखेगा, दिनकर ने कहा है, पर कई मौक़ों पर जब समझ में ना आए तो खेमा पकड़ने से बेहतर है तटस्थ रह जाना।  जेएनयू और एन्टी-नेशनल काँड पर मैं अपने इग्नरेन्स के साथ तटस्थता की तरफ बढ़ रहा हूँ। आज पता चला वीडियो डॉक्टर्ड हैं! साला […]

आप करें तो प्यार-व्यार, हम करें तो बलात्कार! 

विरोध, मतभेद और केरल की आजादी, भारत की बर्बादी में अंतर है, था और रहना चाहिए।  बाकी आपको जो ज्ञान बाँटना है बाँटिए। हम किसी को सर्टिफिकेट नहीं दे रहे, ना ही कोई हमें दे तो बेहतर है। मैं इस डिसेन्ट वर्सस सेडीशन के डिबेट में नहीं घुस रहा क्योंकि मुझे दोनों शब्दों के मायने […]

First few days in Beijing 

It’s been a few days here in this land with more population than ours but there is nothing callous about it. I love my country but I can see how people make their nation great. It is very small things from keeping the roads clean to let the traffic lights get green to move ahead; […]

मैं एक टुटपुँजिया विचारक हूँ

किसी एक विचारधारा के होने में बहुत दिक़्क़तें हैं। कोई भी एक विचारधारा बहुत ज्यादा दिन तक नहीं चलती, आदमी चलता रहता है। आदमी बनिए वरना ब्रा खोल कर निप्पल प्रदर्शन करने वाले नारीवादी विचारक भी हैं और चड्डी पहनकर घूमने वाले राष्ट्रभक्त भी। और आपको अच्छे से पता है कि दोनों ही अलग अलग श्रेणी के चूतियाप हैं।

Do you see the irony, morons?

One day, one of my school friends from Indian Army visited us on his way home. It was after his first posting as an officer in Siachen. We were excited to hear his stories about the life at that altitude and that temperature. Spoiler alert, there is nothing romantic about the blinding white land with […]

‘साइलेंस ऑफ़ द लेफ़्ट’, टाइप= कन्विनिएंट

सर? उ जेएनयू वाला काँड सुने क्या? अब कौन सा काँड हो गया बे? फिर कोई एमएमएस आया क्या? या फिर किसी ने सेक्सुअल ऑफेंस कर दिया? जेएनयू तो प्रोटेस्ट के साथ साथ भारत के तमाम विश्वविद्यालयों को ‘सेक्स, रेप और ‘फन टाइम” वाले आस्पेक्ट में पछाड़े हुए है। अरे नहीं सर, वो सब तो […]

भड़वा, दल्ला कहने वाले ‘मासूम छात्र’

जो प्रोटेस्ट, ख़ासकर के इस तरह के प्रोटेस्ट, करने जाते हैं उन्हें ये पता होना चाहिए कि किसी को ‘दल्ला’ कहना और बाद में ‘मासूम छात्र’ बन जाना दोनों एक साथ संभव नहीं।