विराट को विराट ही रहने दो, कोई नाम ना दो

सचिन तेंदुल्कर वो नाम है जो क्रिकेट का पर्याय है हमारी पीढ़ी के अधिकतर लोगों के लिए। हमने सचिन को बयानवे के लिबरलाइजेशन से लेकर आठ के लीमैन ब्रदर्स कॉलेप्स और तेरह के वानखेड़े तक देखा है। सचिन हमारे लिए वो नाम है जो भारत के किसी क्षेत्र में अच्छा करने के गौरव से जुड़ा […]

लाशें मुसलमान नहीं होतीं, लाशें हिन्दू नहीं होती

आज पूरा दिन टाइमलाइन पर एक डॉक्टर की हत्या की ख़बरें आती रहीं। दोनो पक्ष आए, जिसमें एक ये थे कि वो ‘रोड-रेज’ था और उसे एक कम्यूनल रंग दिया जा रहा है। इसे कम्यूनल रंग दिया जा रहा है, इस बात पर भी हमारे तमाम मीडिया हाउसों ने आर्टिकल लिखे हैं। हुआ क्या है: […]

आज के डिबेट और डिस्कोर्स का स्तर

कॉरपोरेट की नौ घंटे की ग़ुलामी बजाने के बाद, लगभग एक घंटे मेट्रो में बिना सहारे के खड़े होकर सफ़र (अंग्रेजी वाला पन मार लीजिए यहाँ) करते हुए कनॉट प्लेस पहुँचे एक मित्र से मिलने। बड़े बड़े कूड़ेदानों की बदबू लाँघते हुए, ऑडी-बीएमडब्ल्यू की बेतरतीब क़तार को निहारते हुए, सड़क के किनारे खोंपचे में बने […]

विशेषणहीन दलित का कोई माय-बाप नहीं होता

एक आदमी को मशीन में पीस कर मार दिया गया और आप विशेषण खोज रहे हैं कि वो स्कॉलर है, भाजपा वाले राज्य में है, चुनाव होने वाले हैं की नहीं, इसपर बात करने से मेरे अजेंडे को क्या फायदा होगा …

फ़ॉग ही चलता रहा तो लफंदरई ही होगी, आलोचना नहीं

देश में फेसबुक चल रहा है। फेसबुक को आज का युवा और कल के कुछ बुज़ुर्ग चला रहे हैं। बुज़ुर्गों को युवा चला रहा उनकी बातें शेयर और लाइक करके। और युवा को चला रहा है फ़ॉग। फ़ॉग कई तरह का होता है, एक होता है वो जो इतना चलता है कि दिखना बंद हो […]

भाषणों, प्रतिक्रियाओं और सुपरलेटिव विशेषणों के दौर में आलोचना का शीघ्रपतन

आजकल त्वरित प्रतिक्रियाओं का दौर चल रहा है जहाँ हर विशेषण सुपरलेटिव से कम नहीं होना चाहिए। आप या तो एकदम फ़ैन हो जाते हैं, या नकार देते हैं। दोनो ही स्थिति में आदमी अक्सर वजहें लिखना भूल जाता है।

कन्हैया जी, JNU देश नहीं है, न ही देश का प्रतिबिम्ब है

भारत के नए जवाहरलाल का स्वागत है। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जुमलों के खिलाफ बोलने के लिए  खुद जुमलों का सहारा ले रहे हैं। लेकिन ठीक है कि कम से कम इनकी आज़ादी अब भारत से नहीं, भारत में ही चाहिए। इनका कहना है की 31% ने ही इस सरकार को वोट दिया, बाकि […]

Hashtag #Existence

The more the days are passing, the more disenchanted I am becoming. This disenchantment is from almost everything. No, I am not feeling suicidal. Not yet. I have realised, over a period of time, that things don’t matter. Or, to put in different way, I don’t matter to things. It is the Dickensian ‘Hard Times’ […]