रघुराम राजन, फेसबुकिया अर्थशास्त्री, और भारतीय अर्थव्यवस्था

मुझे जब चिदंबरम्, बरखा, राजदीप जैसे लोग राजन के जाने से तिलमिलाते दिखते हैं तो लगता है कि शायद उनका जाना ठीक ही होगा। क्योंकि ऐसे लोगों का अजेंडा पूरे देश के सामने है।

नहीं बैसाखनंदन, मोदी की विदेश यात्राओं से ग़रीबी नहीं मिटी…

ना ही किसानों के घर में मरे बाप और भाई लौट कर आने लगे, ना ही दाल के भाव कम हो गए, ना ही सड़कों के गड्ढे भर गए, ना ही दंगे बंद हुए, ना ही निचली जातियों के दिन फिर गए…

इंटेलेक्चुअल लेजिटिमेसी की राह वन-वे होती है

ये अपनी फ़र्ज़ी बुद्धिजीविता में इतने धँस चुके हैं कि मोदी की राजनीति और हिंदू धर्म के प्रति घृणा को खुलकर घृणा कहने में हिचकिचाते हैं। इससे इनको ये डर लगता है कि ये ‘ऑब्जेक्टिव’ नहीं रह जाएँगे। जबकि इन्हें अच्छे से पता है कि इनकी ये ‘आलोचना’ कितनी बायस्ड और मौक़ापरस्त है।