भाजपा, काँग्रेस आदि पार्टियाँ सारे दानदाताओं के नाम क्यों नहीं बताती?

भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है जिससे लोगों को आशा भी है कि इस मुद्दे पर पारदर्शिता की बात करे क्योंकि आजकल भ्रष्टाचार मिटाने का गर्भ धारण करने वाले गर्भपात कराते नज़र आ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट या तो खलिहर है या पगला गया है

इन गीतों, लोगों, प्रतीकों का सम्मान ज़रूरी है। लेकिन हाँ, ये आवाज हमारे अंदर से आए तब बेहतर है। सुप्रीम कोर्ट को आदेश देने की ना तो जरूरत है, ना ही ये उनका काम है।

कोर्ट, पुलिस, सरकार और बड़े लोग

बड़े लोगों को न्यायपालिका बड़ी रस्सी थमाती है जिसकी लंबाई वहाँ तक है जहाँ तक जज साहब चाहते हैं। पहले हजार करोड़ माँग रहे थे, अब छः सो करोड़ पर पहुँचे हैं। बाकी, आप लोगों ने कभी ना कभी वो ख़बर पढ़ी ही होगी कि दो रूपये के फ़्रॉड के केस में निलंबित बस कंडक्टर को साठ वर्ष की अवस्था में मिला न्याय।

(मोदी से) नाराजदीप-सोनिया सास-बहू-साड़ी इंटरव्यू; ft सगारिका

नमस्कार, आज के चतुर-चाटू पत्रकार के प्राइम टाइम इंटरव्यू “मैडम आप कुछ भी करें मैं खखोर कर चाटूँगा” में आपका स्वागत है। दर्शकों के लिए बता दूँ कि खखोरना का मतलब है जीभ से ऐसे चाटना कि चटवाने वाले में चाटने के लिए कुछ ना बचे। रविश से हिंदी सीख रहा हूँ। अर्णब ने इतना […]

गाँधी या गांधी: पंचमाक्षर, अनुस्वार और अनुनासिक का लॉजिक

जब शुरुआत में हिंदी के फॉन्ट कम्प्यूटर के लिए आए तो अनुनासिक का चिह्न था ही नहीं, ना ही पूर्णविराम था। तो पत्रकारिता के वेब पोर्टल पर सिर्फ बिंदी चलने लगी। कुछ ने इसको स्टाइलशीट ही बना लिया। अब जबकि अनुनासिक का चिह्न आ गया है, पूर्णविराम की डंडी आ गई है, फिर भी कई जगह इनका प्रयोग नहीं दिखता।

प्राइम टाइम: 500-1000 के नोट वाला आपातकाल

हमको अर्थशास्त्र का ज्ञान नहीं है। लेकिन हमको लगता है कि जो सेक्रेटरी लेवल का आईएस होगा, आरबीआई का जो गवर्नर होगा, उसकी जो टीम होगी, उसको हम से ज्यादा अर्थशास्त्र आता होगा।

प्राइम टाइम: मैं रवीश कुमार नहीं हूँ, मेरे लब आज़ाद हैं

आजकल आपने सुना होगा कि फासिज्म आ रहा है, आपातकाल हो गया है आदि आदि… चलिए आपको जेएनयू के एक हॉस्टल में हो रही दो संघियों की बातचीत सुनाता हूँ।