ब्रह्माँड के स्पेस-टाइम में मेरे न्यू इयर का प्लान

समय भी ब्रह्माँड में एक जगह से शुरू होकर कहीं खत्म हो जाता है लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई की तरह। वर्तमान कुछ नहीं होता। तुम पार्टी कर चुके हो, तुम्हें मज़ा आ चुका है, तुम अपनी ही उल्टी के ढेर में नाक रखे सो चुके हो। २०१७, १८, १९, २० सब बीत चुका है। तुम्हारे हाथ में बस गिनना ही रह गया है।

दंगल देखिए, और फ़र्ज़ी फ़ेमिनिज़्म की चरस मत बोईए

ये जीवटता और जुनून की कहानी है जो बाप के हृदय से उतर कर बेटियों की बाँहों के द्वारा जी ली जाती है। इसे देखिए क्योंकि इसे देखना चाहिए।

बेगूसराय और उसकी मशहूर गालियाँ, उनके प्रयोग के तरीक़े

वैसे अलग अलग भाव को प्रस्तुत करने हेतु ‘खौ बरगाही’ (आश्चर्य), ‘बर्रगाही’ (और अधिक आश्चर्य), ‘फर्रगाही’ (बहुत ज्यादा आश्चर्य या कूल लौंडे के आश्चर्य प्रकट करने का तरीक़ा)। ‘आय बरगाही’ का प्रयोग भी सामने वाले के द्वारा आपकी बात ना मानने पर किया जाता है एक आश्चर्य बोधक शब्द के रूप में।

फिर अविश्वास दिखाने के लिए ‘जो बरगाही’, और ज्यादा अविश्वास के लिए ‘भक् बरगाही’, जब सामने वाला एकदम झूठ बोल रहा हो तब ‘जा बरगाही की…’।

प्राइम टाइम १५: सेव एनर्जी, गो डार्क दिस क्रिसमस

और हाँ टर्कियों को मरते वक्त ईद के बकरे, यूलिन फ़ेस्टिवल के कुत्ते और नेपाल वाले भैंसा कटने वाले पर्व के विपरीत बिल्कुल भी कोई दर्द नहीं होगा क्योंकि ये फ़र्स्ट वर्ल्ड वालों का पर्व है ना।

क्यों ज़रूरी हो जाती है 3600 करोड़ की मूर्ति?

अगर नाम में मोहम्मद लगा होता तो शायद देश की भुखमरी ग़ायब हो जाती। नाम अगर अकबर होता तो कुपोषण और ग़रीबी की बात कोई नहीं करता।

टेलीपोर्टेशन: हम भगवानों की तरह तुरंत कैलाश से इन्द्रप्रस्थ क्यों नहीं पहुँच रहे?

अगर एक फोटोन या पार्टिकल एक जगह से दूसरी जगह ऐसे पहुँच सकता है जिसमें दूरी और समय का एंगल ग़ायब हो जाए, तो मानव शरीर जो कि ऐसे ही पार्टिकल्स का भंडार है, वो भी, थ्योरेटिकली, टेलीपोर्ट हो सकता है।

जब तुम्हारी दो किताब एक ही जैसी है तो काहे के लेखक हो तुम?

लेखक का हर पात्र, हर नई किताब में नई जगह होना चाहिए। उसकी आवाज़ अलग होनी चाहिए या फिर उसका द्वंद्व अलग होना चाहिए। पात्रों का गाँव, शहर, घर का कमरा, उसके माँ-बाप, उसके सर के बाल और उसकी महबूबा के चेहरे के रंग से लेकर मेनीक्योर किए उँगलियों तक में विविधता होनी चाहिए।

नई वाली हिन्दी में नया क्या है कि मैं फिर से सौ रुपए ख़र्च करूँ?

प्रेम-सेक्स-लिबरेशन-नारीवाद-फ़्रीडम की बातें छिछली लिखी जा रही हैं। कोई भी गहरे नहीं उतरना चाहता। वो सेक्स को सेक्स लिख देता है लेकिन उसे पता ही नहीं कि नंगा होना कपड़े उतारना नहीं है। उसे पता ही नहीं कि लिबरेशन फ़्राइडे की शाम पार्टी से लौटकर ‘थ्रीसम’ करने में नहीं है, उसके मायने अलग है।

साहित्य में अपशब्द, गाली आदि का प्रयोग कहाँ तक सही है

भाषा को मर्यादित होना चाहिए लेकिन सिर्फ मर्यादित ही होकर साहित्य नहीं बन सकता है। साहित्य में चोरी की घटना भी होती है, बलात्कार भी होता है, हत्या भी होती है तो फिर गाली या अपशब्द कैसे गलत हो जाते हैं, ये मेरी समझ से परे है।

नई हिन्दी या नई वाली हिन्दी क्या है?

एक अभिजात्यता हिन्दी पर थोपने की कोशिश हुई कि हिन्दी तो ऐसे ही लिखी जानी चाहिए। इसके कारण, और अंग्रेज़ी स्कूलों के हर गाँव में पहँचने के कारण हिन्दी में लेखन सिकुड़ता चला गया।