फट के फ्लावर होते ही वॉलीवुड कितना क्यूट हो जाता है!

आदमी की आस्था और उससे होने वाले रिएक्शन के लिए भी आपको तैयार रहना चाहिए क्योंकि भीड़ की अभिव्यक्ति बड़ी ही निराली होती है, इनोवेटिव भी।

मैं फ़ेडरर को रोता देखना चाहता हूँ, एक बार फिर से

फ़ेडरर एक ख़ूबसूरत कविता है जिसका मीटर, तुक, भाव, शब्द और अर्थ सब एकदम सही तरह से सहज स्वभाव में है। फ़ेडरर जब अपने बेहतर दिनों में होता है तो वो बहता है। उसके बैकहैंड में एक बहाव है, जो आप देखते हो और सचिन के कवर ड्राइव की तरह देखकर ख़ुश हो जाते हो।

आसान है गाली देना देश, सरकार और समाज को

संविधान के अधिकारों पर अपना हक़ जताकर हो हल्ला करते हैं पर कर्तव्य भूल जाते हैं, वैसे देश के लिए अड़सठ साल का गणतंत्र हो जाना अपने आप में एक मिसाल ही है।

गाली विमर्श: बज्जरखसौना, बजरखसुआ (बहुब्रीहि समास)

तो इस गाली का पूरा (बहुब्रीहि) समास विग्रह ये है कि वह जिसपर वज्र गिरना चाहिए। मतलब सामने वाला जब आपको इतना परेशान कर दे कि आप उसकी एक्जिसटेन्स से भी नाराज़ हो जाते हैं, तब आप इस गाली का प्रयोग करते हैं।

प्राइम टाइम २२: सेल्फ़ी खिंचाने वाले प्रोटेस्टर का कोई माय-बाप नहीं होता

अगर आप किसी चीज़ से असहमति रखते हैं तो आप फ़ौरन विद्वान समझ लिए जाएँगे। जहाँ आपने ये कहा कि ‘मेरा इस विषय पर अलग विचार है’, आप बुद्धिजीवी होंगे उस सभा में।

लिप्सटिक नारीवाद: फ़ैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना करें

क्या पूरे नारीवाद का विमर्श अब इतने पर आकर गिर गया है कि कोई सिंदूर क्यों लगाती है, बिंदी क्यों चिपकाती है, ब्रा क्यों पहनती है?

प्राइम टाइम २०: चुनावी मौसम में वेमुला, नजीब, मनु स्मृति की वापसी

एक सर्वे कीजिए। सड़क पर जाईए और हिन्दुओं से पूछिए कि क्या उन्होंने मनु स्मृति का नाम भी सुना है? पूछिए कि क्या उसका एक श्लोक भी जानते हैं? पूछिए कि क्या वो अपनी ज़िन्दगी मनु स्मृति के हिसाब से चलाते हैं?