प्राइम टाइम: मुंबई ‘स्पिरिट’ से भीगीं मशालें फेसबुक पर ही जलती हैं!

स्पिरिट का नाम लेकर अपने काम पर निकल लेना बहादुरी नहीं, मजबूरी है। और मजबूर लोग आंदोलन नहीं करते। वो मेरी तरह फेसबुक पर पोस्ट लिखकर सो जाते हैं।

जश्न मनाइए क्योंकि मोदी के राज में एक और दुर्घटना हुई है! येय!

‘अरे बिजली का तार गिर गया’, इतना कहना भर ही काफ़ी होता है बाईस लोगों की जान लेने के लिए। इसमें सरकार कहाँ हैं?

दिशाहीन विपक्ष, प्रतिक्रियावादी मीडिया, बेकार बातों में उलझे बुद्धिजीवी भाजपा को जिताएँगे

आपकी हार का मतलब है कि आपने एक सशक्त विपक्ष, समझदार विरोधी और देशहित में सोचने वाले बुद्धिजीवी की भूमिका नहीं निभाई।

प्राइम टाइम: रवीश जी, वीकेंड का मुद्दा सोमवार का इंतजार नहीं करता!

लाइट लगवाना, गार्ड खड़े करने का मतलब है कि हमने मान लिया है कि बीएचयू में हरामी लौंडे तो घूमते रहेंगे, आप लाइट और गार्ड से बचाव करा लो! और लाइट में दुपट्टा खींचा गया तो? फब्तियाँ कसी गईं तो?

प्राइम टाइम (विडियो): मुद्दों को गौण करने का तंत्र

तुम्हारे इसी स्वभाव के कारण तुम्हारी ये दुर्दशा है कि तुम्हारे कॉमरेड अब कामरेड और बलात्कारी हो गए हैं, तुम्हारे ज़मीन से जुड़े नेता हवाई यात्रा में 65 लाख ख़र्च कर देते हैं, और तुम्हारे धर्मविरोधी नेता का नाम सीताराम है!

रोहिंग्या मुसलमानों का इतिहास उनके वर्तमान का ज़िम्मेदार है

जब तक रोहिंग्या का आतंक एकतरफ़ा था, किसी को कोई चिंता नहीं थी। लेकिन बौद्धों ने जब आत्मरक्षा में हिंसा की तो दुनिया को चिंता हो गई।

पुस्तक (साहित्य की विधाओं की) समीक्षा कैसे करें

समीक्षा कैसे करें जो कि किसी को पढ़ने या न पढ़ने के लिखे प्रेरित कर सके। क्या इसका कोई तरीक़ा है? कोई परिपाटी नहीं है जो कि बिन्दुवार रूप से अनुसरण किया जाना चाहिए। मतलब कोई फ़िक्स पैटर्न नहीं है, लेकिन कुछ बिन्दु हैं जिस पर आपको ध्यान देना चाहिए।

वर्षगाँठ की बधाई सैनिक स्कूल तिलैया!

फ़ंडामेंटल विजन ये था कि हर बच्चे में ख़ूबी होती है, उसको तलाशने और तराशने की ज़रूरत होती है। आपका एकेडमिक्स बहुत खराब हो तभी आपको आपके सीनियर और शिक्षक समझाएँगे, डाँटेंगे कि न्यूनतम स्तर तक होना भी ज़रूरी है। बाकी समय एक औसत बच्चे को भी कोई प्रेशर नहीं होता। उनके माता-पिता देते हों, तो वो अलग बात है।

दीवाली पर 50 लाख पटाखे: आख़िर सुप्रीम कोर्ट ऐसे वाहियात फ़ैसले/निर्देश जारी कैसे करता है?

जज साहब, इमेज बिल्डिंग मत कीजिए, जुडिशरी को सुधारिए क्योंकि लोकतंत्र के इस स्तंभ पर से भी लोगों का भरोसा उठता जा रहा है। ये फर्जी के जजमेंट मत पास कीजिए जो लागू ही नहीं हो सकते।