‘बकर पुराण’ – समकालीन संदर्भों और उनके अर्थपूर्ण अन्यथाकथन पर एक पाठ के रूप में

दूसरे कई व्यंग्यकारों से कहीं अलग, लेखक का मानवीय संवेदना से जुड़ा होना इस पाठ (किताब) को पठनीय और स्मरणीय बनाता है जहाँ व्यंग्यकार वृहद् समाज से दूर नहीं बल्कि उसी का हिस्सा है और जिसका व्यक्तित्व लक्षणालंकारिक (metonymic) है।