कहानी समीक्षा: निर्मल वर्मा रचित ‘डेढ़ इंच ऊपर’

अपनी ईमानदारी का भी हम एक अलग वर्जन बनाकर रखते हैं जो कि दुनिया को दिखाने के लिए होता है। हम स्वयं क्या हैं, हमारी परतों के बाद क्या बचता है, उस शून्यता को बहुत कम लोग बाहर ला सकने की कूवत रखते हैं। क्योंकि हम जो होते हैं, वो हम जानते हैं, लेकिन सोते वक़्त खुद से होती बातचीत में भी इस जानने को मानते नहीं।