प्रसून जोशी-मोदी इंटरव्यू: इंटरव्यू लेते वक़्त मीडिया वाले क्यों नहीं चिल्लाते

इंटरव्यू जिसका भी आप लेने वाले हैं, पहले तो उसकी सहमति होनी चाहिए। दूसरी बात आपको एक प्रीइंटरव्यू के तौर पर सारे सवाल अपने सामने वाले को बताने होते हैं। ये उसकी इच्छा है कि वो किस सवाल की आपको अनुमति दे, किसकी नहीं।

रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था।

भारत के हिन्दुओ, प्रोपेगेंडा का जवाब देना कब सीखोगे?

ये एक अघोषित युद्ध है, और मैं अपने धर्म को त्रिशूल में लिपटे कॉन्डोम और लिंग में घुसे भगवा झंडे के स्तर तक गिरता नहीं देखना चाहता।

काहे बे चूतिये, राम काहे शर्मिंदा होंगे?

अल्लाहु अकबर कहकर बम फोड़ने वालों पर अल्लाह को तो शर्मिंदा होते नहीं सुना! तुम जैसे लिब्रांडुओं को कहते और लिखते सुना और देखा कि ये असली मुसलमान नहीं है। फिर अभी कौन सा कीड़ा पिछवाड़े में घुस जाता है कि सौ लोगों की भीड़ पचासी करोड़ हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती दिख जाती है?

चुनावी दौर में खेल परसेप्शन मैनुफ़ैक्चरिंग का है

बाकी समय दलित, अल्पसंख्यक, दंगाई सब गाँव में घुइयाँ की खेती में व्यस्त रहते हैं। चुनाव आते ही अचानक से कोई किसी को पीट देता है, किसी को मार देता है, कहीं दंगा हो जाता है।

दलित अस्मिता का विरोधाभास: नौकरी में आरक्षण, सड़कों पर आगजनी

आरक्षण एक हक़ नहीं, कोढ़ है इस समाज का। वो इसलिए नहीं कि मैं इसका सताया हुआ हूँ, बल्कि इसलिए कि इसका सबसे बड़ा घाटा इन्हीं जातियों को हुआ है। अगर सामाजिक वैमनस्यता और भेदभाव आज भी पढ़े-लिखे छात्रों के मन में है तो उसका एक कारण आरक्षण है। आप कैसे ये समझा देंगे किसी बच्चे को कि उसके ज़्यादा नंबर, विषय की बेहतर समझ, किसी कम नंबर वाले बच्चे की तुलना में कम हैं?