3000 करोड़ एक मूर्ति के लिए, 3600 करोड़ दूसरी के लिए! कितना ज़रूरी है ये सब?

भुलाए गए हर नायक और नायिकाओं की मूर्तियाँ, उनके नाम पर इतिहास के पन्ने और उनके योगदान की गाथाएँ हर भारतीय को जाननी चाहिए। न कि उनकी जिन्होंने यहाँ रहकर यहाँ की लड़कियों का बलात्कार किया, मंदिरों को बर्बाद किया, पुस्तकालयों में आग लगाए, और गाँवों में सामूहिक नरसंहार किए।

मुद्दों को मारने का सबसे सही तरीक़ा: हैशटैग

मुद्दों को ट्रेंडिंग बनाते ही उसकी अहमियत घट जाती है, और नज़दीकी इतिहास ये बताता है कि मुद्दा गौण हो जाता है। इसकी कैजुअल्टी बनती है वो तमाम लड़कियाँ जिन्हें वर्कप्लेस पर इसका शिकार बनाया जाता रहा है।

हम बिहारी हैं, दूब, कुचले और पतित भी क्योंकि क्रांति के नाम पर जाति पकड़ते हैं

हमें इसी बात में मज़ा आने लगा है कि हम किसी भी कारखाने को बंद कर सकते हैं जबकि हँसनेवाली बात यह है कि हम वहाँ के मज़दूर हैं, मालिक नहीं। फिर ये गौरव किस बात का?

अनुष्का को निकाल दें तो ‘सुई-धागा’ एक सपाट फ़िल्म है

इसके औसत होने की ज़िम्मेदारी पटकथा लिखने वाले और निर्देशक को लेनी चाहिए। इन दोनों जगहों पर फ़िल्म औंधे मुँह गिरी। इस फ़िल्म में पति-पत्नी के इस संघर्ष को दर्शक हिस्सों में, कहीं-कहीं, महसूस कर पाता है, जब कहानी भावनात्मक स्तर पर कभी-कभार आपको छू जाती हो।