वामपंथी लम्पट गिरोह चुप रहता है जब ‘गलत’ भीड़ ‘गलत’ आदमी की हत्या करती है

यहाँ न तो दलित मरा, न मुसलमान। उल्टे तथाकथित दलितों ने पुलिस वाले की जान ले ली क्योंकि उन्हें लगा कि वो जान ले सकते हैं। ये मौत तो ‘दलितों/वंचितों’ का रोष है जो कि ‘पाँच हज़ार सालों से सताए जाने’ के विरोध में है।

NIA द्वारा पकड़े आतंकी 25 किलो बारूद से चिकन मैरिनेट करने वाले थे

मोदी-विरोध में ये पत्रकार गिरोह इतना गिर चुका है कि कल को मोदी कह दे कि बच्चे अपने माँ-बाप की पैदाइश होते हैं, तो ये कहने लगेंगे कि ‘नहीं, हम तो माओ के प्रीजर्व्ड सेमेन से जन्मे हैं’।

UGC NET द्वारा उमैया खान का हिजाब उतरवाना एहतियात है, भेदभाव नहीं

हो सकता है कि उमैया के कानों में कोई इयरफोन नहीं रहा हो, लेकिन ये कौन तय करेगा कि बिना देखे ही उसे सत्य मान लिया जाए? फिर अगले पेपर में दस लोग हिजाब और बुर्क़े में आ जाएँ, दस लोग बंदर-टोपी पहनकर आ जाएँ और कहें कि ‘उसे तो नहीं रोका, हमें क्यों रोक रहे’, तो यूजीसी क्या कहकर अपना पक्ष रखेगी?

‘अंधाधुन’ फ़िल्म रिव्यू: अच्छी फ़िल्म, अच्छी कहानी, अच्छा निर्देशन

आयुष्मान खुराना की दाद देनी होगी कि ये अदाकार कहानियाँ कितनी शिद्दत से चुनता है। आज के दौर में, और पिछले तीन दशक में, मुझे इससे बेहतर कहानियाँ पकड़ने की कन्सिस्टेन्सी किसी भी और कलाकार में नहीं दिखी है।

हारनेवालों के पुराने राग घिसकर फट चुके हैं

जहाँ कॉन्ग्रेस जीती है, और जहाँ सरकार बना रही है, वहाँ उसने सीधे सेंध मारी है। वो उसकी जीत कैसे नहीं है? जीतना किसको कहते हैं? यही जीत है। जीत जब अरुणाचल में सरकार बनाना है, जब कर्नाटक में सरकार बनाना है, ढाई साल बाद बिहार में सरकार बनाना है, पूरे नॉर्थ ईस्ट में सरकार बनाना है, तो फिर राजस्थान और मध्यप्रदेश भी जीत है।