नया नैरेटिव: 3500 VVPAT मशीन टेस्ट में फ़ेल

 

3500 VVPAT मशीन प्रथम चरण के टेस्ट में फ़ेल हो गई। इसको लेकर अब तैयार रहिए। आने वाले कुछ दिनों का अजेंडा यही होगा कि ‘हमने तो कहा ही था कि मशीन में ख़राबी है, भाजपा ऐसे ही चुनाव जीतती है’।

जबकि आपको ये नहीं बताया जाएगा कि 70,000 में 3500 मशीनों का पहले टेस्ट में खराब होना बहुत ही सामान्य बात है। चुनाव आयोग 3-4% त्रुटि दर को नॉर्मल मानता है, यहाँ 5% हुआ है क्योंकि इससे पहले इस स्तर पर इतने वीवीपैट मशीन इस्तेमाल ही नहीं हुए।

दूसरी बात जो आपको न तो कही जाएगी, न ही आप गौर करेंगे कि यही तो प्रक्रिया है कि हर मशीन की कई स्तरों पर जाँच होती है, और सही मशीनों को ही काम में लाया जाता है। ये पहला चरण है जिससे खराब मशीनों को अलग किया जाएगा और बचे हुए को दूसरे टेस्ट में लगाया जाएगा। ऐसे ही कई स्तर की जाँच आदि के बाद उसे सील कर के बूथ तक पहुँचाया जाएगा।

आपको लोग ये सवाल उठाते मिल जाएँगे कि ‘इतनी मशीनों का खराब होना चुनाव आयोग पर सवाल खड़े करता है’।

भाई मेरे, सवाल तो तब खड़ा होता ना जब वही मशीन चुनाव आयोग चुनावों में इस्तेमाल होने के लिए भेज देता। जब सारी पार्टियों के लोग खड़े होकर, हर मशीन को जाँचते हैं, फ़ॉर्म पर दस्तखत करते हैं कि हर मशीन सही है, तभी वो मशीनें चुनाव में प्रयोग के अगले चरण के टेस्ट के लिए आगे जाती हैं। मतलब ये कि खराब मशीन हैं, तो उन्हें बदल दिया जाता है।

इसी धूर्तता से संवैधानिक संस्थाओं पर से विश्वास तोड़ने का नैरेटिव बनाया जाता है। आपको आधी बात बताकर लोग निकल लेंगे कि अब सोचते रहो कि कौन सी मशीन इस्तेमाल होगी और ये भी कि चुनावों में भी इस तरह की धाँधली हो रही है। ऐसे ही पिछली बार हवा उड़ी, ज्ञानी पत्रकार बिना पूरी बात जाने ही आयोग पर सवाल उठाने लगे कि हैक हो जाता है, चिप बदल दी जाती है आदि। लेकिन जब चुनाव आयोग ने कहा कि हैक करके दिखा दो कोई, तो एक भी पार्टी उस दिन नहीं पहुँची।

उसी कड़ी में, जबकि ये पता है कि हार्दिक पटेल जैसे लम्पट लोग अपनी ज़मानत भी बताने में असमर्थ रहेंगे, और डूबती काँग्रेस के साथ खड़े हो रहे हैं तो वो अपने सेक्स सीडी की भी बात करेंगे, वीवीपैट के खराब होने की भी बात करेंगे। कोई ये नहीं कहेगा कि फेक सीडी का आइडिया कहाँ से मिला? कोई ये नहीं पूछेगा कि पहले से ही हार क्यों मान रहे हो ये मानकर कि भाजपा वीवीपैट को मैनेज कर रही है?

कोई ये नहीं पूछेगा कि वीवीपैट की ख़राबी में क्या 3500 मशीनों में बटन और प्रिंट स्लिप के मिसमैच में सिर्फ भाजपा का ही चिह्न छप रहा था, या फिर ये हर मशीन पर अलग था?

शनिवार है वर्ना लोग प्राइम टाइम करते हुए एक बार फिर से ये कहते नज़र आते कि सवाल करने में क्या बुराई है। बुराई ये है कि पत्रकार सवाल नहीं पूछते, वो बताते हैं कि ऐसा हो रहा है। सवाल आप चुनाव आयोग के अधिकारियों से पूछेंगे कि वैसे तथाकथित एक्सपर्ट से जिसे ये भी मालूम नहीं है कि ईवीएम के अंदर की चिप न तो इंटरनेट, ब्लूटूथ आदि से कनेक्टेड होती है, न ही दोबारा उस पर कुछ भी प्रोग्रामिंग हो सकती है।

बस ये लोग ये रट लगाकर बैठ जाएँगे कि चुनाव आयोग एक बार उन्हें मशीन क्यों नहीं दे देती घर ले जाने? ईवीएम पर जब सबका मुँह बंद हो चुका है तो अब ज्ञानपुँज वीवीपैट पर सवाल उठा रहे हैं। जबकि वीवीपैट सिर्फ स्लिप देती है, आँकड़े ईवीएम में ही रहते हैं। अगर दोनों के योग में अंतर दिखा तो उस बूथ पर गणना दोबारा होगी, अगर गणना में वाक़ई अंतर रहा तो चुनाव दोबारा होंगे।

इसलिए, तैयार रहिए इस नए नैरेटिव के लिए। ये चालू हो चुका है। क्योंकि इन्हें पता है कि राहुल गाँधी कितना भी आइटी सेल बना लें और ट्विटर पर आई-टू-आई करते रहें, कुत्ते टहलाने वाले नेताओं को जो साल में एक बार नशे से बाहर आते हैं, उन्हें तो जनता पहचानने से रही। ये चुनावों से पहले ही हार मानना है, और ज़मीन तैयार करने की जुगत है कि हारने पर क्या कहा जाएगा कार्यकर्ताओं को।

यही कि चुनाव आयोग वाली मशीन ही खराब थी तो वोट तो भाजपा को चला गया!….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *