प्राइम टाइम: 500-1000 के नोट वाला आपातकाल

अभी फेसबुक खोले ही थे कि पता चला कि साला! आपातकाल नहीं गया है अभी तक। एक दो ज्ञानी साइट कह रहा है कि ५००-१००० का नोट वाला क़दम ‘विटलेस’ और ‘एंटी पीपल’ है एण्ड इट रीक्स ऑफ इमर्जेंसी। एंटी पीपल तो नहीं हो सकता, पीपल को तो हिन्दू लोग पूजता है! और इमर्जेंसी का इस्तेमाल तो साला ऐसे हो रहा है जैसे बिहार में लाइट जाने पर इमर्जेंसी लाइट माँगते हैं लोग!

वैसे एक बात तो है कि अर्थ शास्त्र का सारा ज्ञान, इन फैक्ट हर विषय का सारा ज्ञान, हम पत्रकारों के ही पास है। हमें सिर्फ ये कह दो, “यार! सब तो यही लिख रहे हैं कि काला धन के ख़िलाफ़ ठोस क़दम है, कोई नया एंगल ढूँढों…”

एडिटर साहब बोल कर चले गए और यहाँ कॉलम लिखने वाला पत्रकार जो कल तक ‘लाल चड्डी पहनने पर आकर्षित होती हैं महिलाएँ’ वाले कॉलम लिखता था, या फिर ख़ुद से ही, ख़ुद को ही मेल किए सेक्स रिलेटेड सवाल, “डॉक्टर साहब मैं हस्तमैथुन बहुत करता हूँ, क्या ये सही है?” का जवाब ख़ुद ही सेक्सोलोजिस्ट बनकर देते रहते थे, वो अब नेट पर बैठकर नया एंगल ढूँढ रहे हैं।

हमको अर्थशास्त्र का ज्ञान नहीं है। लेकिन हमको लगता है कि जो सेक्रेटरी लेवल का आईएस होगा, आरबीआई का जो गवर्नर होगा, उसकी जो टीम होगी, उसको हम से ज्यादा अर्थशास्त्र आता होगा। और हाँ उस पत्रकार से भी थोड़ा ज्यादा। जैसे कि सुप्रीम कोर्ट के जज को ‘एण्ड दे हैंग्ड याकूब’ लिखने वाले एडिटर से थोड़ा ज्यादा लॉ आता है।

फिर क्या होता है कि ऐसे पत्रकार, मार्च में होने वाले इन्क्रीमेंट के मद्देनज़र एक आर्टिकल लिखते हैं, जिसमें गधे को घोड़ा बता दिया जाता है क्योंकि उसके चार पैर हैं, चारों में खुर है और खुर में इन्होंने खुद ही नाल ठुकवा रखे हैं। और शक्ल की बात मत कीजिए वरना स्पीशिज्म का ठप्पा लग जाएगा। स्पीशिज्म मैंने अभी अभी बनाया है जो कि रेसिज्म का बाप कहा जा सकता है।

मतलब सरकार ने अनाउंस किया नहीं कि ये ‘नया एंगल’ को प्रूव करके बैठ गए कि ये एंटी पीपल है। कैसे है? पीपल से तो मैं भी मिलता रहता हूँ। एक आदमी नहीं मिला रियल लाइफ में आज दिन भर जो ख़ुश नहीं है। उसके लिए सीधी बात यही है कि सरकार ने सही किया। रीयल लाइफ में मिलने वाला आदमी इंटेलेक्चुअल वेबसाइट की टट्टी कम पढता है। ख़ासकर वैसे वेबसाइट की जो सिर्फ फेसबुक पर ही शेयर की जाती है।

ऐसे आँटू-झाँटू वेबसाइट, भोकाली वाला नाम रखे हुए, आपको कोई भी आदमी फेसबुक-ट्विटर के अलावा कहीं नहीं पढता मिलेगा। इनको कुछ चिरकुट गूगल में सर्च करके, चौदहवीं पेज से निकालते हैं और फिर उसी वेबसाइट के लेख का दो पैराग्राफ़ अपने स्टेटस में पेस्ट करके पोस्ट कर देते हैं।

बात ये है कि ये ख़ुद ऐसे आर्टिकल के हेडलाइन के अलावा कुछ नहीं पढ़ते। कूलत्व की चाह रखने वाले डूड और इंटेलेक्चुअली-अवेयर दिखने की कोशिश करने वाली चिक्स ऐसे लिंक पर अपने विचार तक नहीं रख पाते। ये उसको डिफ़ेंड भी नहीं कर पाएँगे। इनको नीचे में सवाल पूछ दो तो फिर एक लिंक चिपका देंगे कि ये देखो इस साइट पर भी ये लिखा है।

मतलब पाँच साइट पर लिखा है तो सही हो गया। “और नीं तो क्या यॉर… इतनी जगह झूठ थोड़े ना लिखेंगे…”

“वेल! सॉरी बेब्स, लिखने वाले तो क्या क्या लिखते हैं… यू बी कूल… आँ-आँ-आँ…”

“हे! डोन्ट डू लाइक दैट…”

“आई विल डू दैट टू यू, ऐज अ मैटर ऑफ फैक्ट, आई एम डूइंग इट राइट नाव, इवन नाव… आँ-आँ-आँ”

“हे! हे! हे! यू सक!”

गुडनाइट….

2 thoughts on “प्राइम टाइम: 500-1000 के नोट वाला आपातकाल

  1. Bhai lekin government nei sarkari mulaazim ko IT raid ke daayre se baahar nahi karna chahiye tha. Ye bahut galat kiya hai. Seriously very bad step !!!!

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