दिशाहीन विपक्ष, प्रतिक्रियावादी मीडिया, बेकार बातों में उलझे बुद्धिजीवी भाजपा को जिताएँगे

भाजपा ने ‘किरांतिकारियों’ और ‘कामरेडों’ के मुद्दे अपना लिए हैं और काँग्रेस भाजपा बनने की ओर चल पड़ी है। भाजपा को नया वोटबैंक ग़रीबों और दलितों में दिख रहा है जिसके लिए लगातार ये मिडिल क्लास के बल पर नई-नई योजनाएँ ला रही है। वहीं राहुल गाँधी ललाट पर तिलक लगाकर अपनी हिन्दू-विरोधी, मुस्लिम तुष्टीकरण वाली पार्टी की छवि तोड़ने के लिए तत्पर हैं।

लेफ़्ट तो खैर बूट लाधने जा चुका है और चार यूनिवर्सिटी में चुनाव जीतकर ही खुश है। उसको लग रहा है कि ये ‘होप’ है, जबकि ये ‘होपलेस’ है और यहाँ से भी आने वाले दिनों में ये पूर्णतः गायब हो जाएगी, या इसे अपना अजेंडा बदलना होगा। निरक्षर राष्ट्र में वन-वे नैरेटिव फेंक कर इन्होंने कई साल लोगों को उल्लू बनाया, लेकिन बढ़ती शिक्षा और मल्टी-वे कम्यूनिकेशन के दौर में फिसलते नैरेटिव के कारण अब इनकी चिरकुटई तुरंत सामने आ जाती है।

भाजपा ने राम मंदिर को हाशिए पर फेंक दिया है और दलित-गरीब इक्वेशन पर अगले दो साल काम करेगी जिसका आग़ाज़ कल शाम ग़रीबों को मुफ़्त बिजली के वायदे से हो चुका है। कहने वाले तो बहुत कुछ कहेंगे पर मेरे गाँव में जहाँ दो घंटे बिजली रहती थी, अब अठारह से बाईस घंटे रहती है। इसमें राज्य सरकार का भी हाथ हो सकता है, जिससे मुझे इनकार नहीं है।

मेरी राजनीति की समझ बहुत ही लिमिटेड है लेकिन इतना दिखता है कि भाजपा अभी वोटबैंक के गेम में बाक़ियों से आगे है। उसके पास ‘सत्तर साल से आपको गरीब बनाए रखा’ कहने के लिए दो साल और है, क्योंकि ये मैसेज, चाहे कितना भी मिसलीडिंग हो, हर गरीब तक नहीं पहुँचा। जहाँ विपक्ष इस चक्कर में है कि भाजपा की ‘छवि खराब’ कर दी जाय, और गाय-गोबर से खेल रहे हैं, भाजपा वहाँ भी पहुँच रही है जहाँ कभी पहुँचना ख़्वाब में भी मुश्किल था।

मिडिल क्लास हमेशा ही पिसता है, इसीलिए वो मिडिल क्लास कहा जाता है। मिडिल क्लास मँझले संतान की तरह होता है जो कि न तो माता का प्रिय होता है, न ही पिता का। उसको हमेशा उपेक्षा मिलती है। ये भारत ही नहीं, हर जगह होता है। प्रजातंत्र का प्राकृतिक स्वरूप है कि ग़रीबों के कल्याण की बातें मिडिल क्लास के जेब के बल पर ही की जाती है। बड़े उद्योगपति और अमीर लोग हमेशा कानून आदि से खेलते हुए बच निकलते हैं, और टैक्स का भार मिडिल क्लास ही उठाता है।

हलाँकि, लोग कहते रहते हैं कि मिडिल क्लास भाजपा को वोट नहीं करेगी, लेकिन ऐसा होता नहीं है। एक बात तो तय है कि जिन मुद्दों को कभी मुद्दा समझा ही नहीं गया, भाजपा ने उसे पहचाना और प्रोजेक्ट किया। जहाँ बाकी लोग जीडीपी गिन रहे थे, हवा-हवाई योजनाओं में गाँधी परिवार ठूँस रहे थे, मोदी ने उन बातों की बात की जिसका सीधा असर एक गृहणी पर पड़ता है: शौचालय, चूल्हा, बिजली। ये बिल्कुल ही मूलभूत आवश्यकताएँ हैं जिन्हें किसी सरकार ने इतना जोर देकर नहीं समझा जितना भाजपा ने। महिला वोटबैंक भी, जो वोटबैंक कभी समझा न गया, भाजपा की तरफ खिंचती आ रही है।

बाकी पार्टियाँ इक्के-दुक्के घटनाओं को उठाकर हमेशा ‘रिएक्शन’ देती है, जबकि भाजपा ये दिखाती है कि वो ‘एक्शन’ ले रही है। बाकी पार्टियाँ ऐसी बातें करती है जो कि एक बहुत ही छोटे, लिमिटेड सर्कल के डिबेट का हिस्सा होता है, और आम आदमी तक उस डिबेट का एक शब्द भी न तो पहुँचता है, न ही समझ में आता है। उनके लिए मूलभूत समस्याएँ ‘फासीवाद’, चुनावों के समय ‘दलित हिंसा’ की कवरेज, ‘असहिष्णुता’ आदि नहीं है। उसको आप डिबेट में घुमाते रहिए, होगा कुछ नहीं।

आम जनता के विचारों पर ट्विटर का असर अभी नहीं होगा। अभी उसमें शायद पाँच-सात साल और लगेंगे। नैरेटिव वहाँ से नहीं बनेगा। गाँवों में लोग मोदी के ‘मन की बात’ ही सुनते हैं, वो प्राइम टाइम नहीं देखते। प्राइम टाइम देखने वाले पहले से ही खेमों में बँटे हैं, जिन्हें मोदी न तो तोड़ सकता है, न जोड़ सकता है। इसीलिए, भाजपा का फ़ोकस वहाँ है, जिसको बाक़ियों ने भुला दिया।

भाजपा उनके लिए ज़मीन पर क्या करेगी, क्या कर रही है, ये तो आँकड़े बताएँगे। और आँकड़ों से तो आप अपने मन की बात क़बूल करवा सकते हैं। इलेक्ट्रिफिकेशन का मतलब गाँवों में पोल पहुँचाना है, या घरों में बत्तियाँ जलाना? क्या गाँव के लोग दो सौ रूपए हर महीने भी देने को राज़ी हैं? क्या गाँव का मर्द शौचालय को लेकर अभी भी जागरूक है या जिले खुले में शौच से मुक्त काग़ज़ों पर ही हो रहे हैं? बहुत सारी बातें हैं जिनपर आपको जैसा आर्टिकल चाहिए, नेट पर मिल जाएगा। दोनों तरफ के आर्गुमेंट, आँकड़ें और वहाँ के लोगों की बातें।

काँग्रेस को चिंतन करना पड़ेगा कि आखिर कब तक वो लोग भाजपा-विरोधी होकर काम करेंगे। देश को एक बेहतर विपक्ष की ज़रूरत है, और वो सिर्फ काँग्रेस ही दे सकती है। लेकिन इसको किसी के अंधविरोधी होने से ज्यादा अपने में विश्वास दिखाने की ज़रूरत है। एंटी-बीजेपी होने से बात भाजपा की होगी, उससे लोग इस लाइन पर सोचते हैं कि काँग्रेस वालों को और कोई काम नहीं है। काँग्रेस को अपनी बात कहनी चाहिए कि उसका विजन क्या है? और वो कार्य अमेरिका की यूनिवर्सिटी में सरकार की कमियाँ गिनाने से नहीं होगा।

भाजपा इन मामलों में बहुत आगे है। उसने मीडिया को मैनेज करने के लिए न सिर्फ चैनल मैनेज किया हुआ है बल्कि एक तय योजना के तहत वो अपने विरोधी चैनलों, जो कि काफ़ी हैं, उनकी बातों पर ध्यान ही नहीं देता। उसे पता है कि इन चैनलों को उनका वोटबैंक नहीं सुनता। या तो इसलिए नहीं कि वो गरीब हैं, या फिर इसलिए कि भाजपा ने समझा दिया है कि ये ‘देशद्रोही’ हैं। रही-सही कसर दिग्विजय, मनीष तिवारी जैसे नेता बेहूदे ट्वीट करके पूरा कर देते हैं जिसको हर मीडिया में जगह मिलती है। साथ ही, मीडिया का वो गिरोह जो आजतक सरकार की ख़ामियाँ ही गिनाता रहा है और चुनाव के समय में भाजपा के विरोध में एक तरह की कैम्पेनिंग करता नज़र आता है, उसको लोग नकार चुके हैं।

इनमें से अधिकतर तो अंग्रेज़ी वाले हैं जिनको देखने वालों की सम्मिलित संख्या भोजपुरी के चैनल ‘दंगल’ के बराबर भी नहीं है। जो हिन्दी वाले हैं उनकी दुर्दशा भाजपा का आईटी विंग करता रहता है। बाकी पार्टियों से इस मामले में भाजपा आगे है जो कि नैरेटिव को उतने ही ज़हरीले तरीक़े से काउंटर करता है जितने से वो बनाए जाते हैं। अब टूल दोनों के पास है, और भाजपा समर्थक प्रोफाइल, हैंडल, पेज, व्हाट्सएप्प ग्रुप आदि फ़ुल थ्रॉटल जाने में संकोच नहीं करते। जब काँग्रेस के दिग्गज नेता मोदी को गरिया सकते हैं ट्वीट में, वो भी बार-बार, तो फिर उनको ये ‘ट्रोल विक्टिमाइजेशन’ वाला कोरस नहीं गाना चाहिए।

लेफ़्ट तो खैर जोकर की भूमिका निभा रहा है और हर रोज खुद को एक्सपोज़ करता है जब वो कन्हैया, उमर ख़ालिद जैसो को चुनाव के समय शह देता है, और उनकी उन बातों को डिफ़ेंड करता है जो किसी भी नज़रिए से बचाव करने योग्य नहीं है। जब आप सेना पर सवाल उठाते हैं, झंडे फहराने को चुटकुला समझकर उसके विरोध में जाते हैं, राष्ट्रगान पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता याद आती है कि आप चुप रहने, खड़े ना होने से लेकर उसके अपमान तक को जस्टिफाई करने के फेर में रहते हैं तो फिर आम जनता, जिसने संविधान नहीं पढ़ा, और न ही पढ़ेगी, जो न तो अंग्रेज़ी डिबेट देखती है, न ही ट्वीट पढ़ती है, उसकी नज़रों में आप देशद्रोही हैं। और इसे धोने में काफ़ी समय लगेगा। खासकर तब जबकि आपकी मंशा उसको धोने में बिल्कुल भी नहीं हो।

इन बातों पर हमारे-आपके जैसे पढ़े लोग एक बारगी डिबेट कर भी लेते हैं, लेकिन अभी भी गाँवों के लोग जिनके लिए झंडा और राष्ट्र दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण है, उनके लिए आप देशद्रोही हैं। इन बातों से आपके ख़िलाफ़ ही लोग होंगे, साथ तो नहीं होंगे क्योंकि क्षेत्रीय भाषाओं की मीडिया में इन बातों को ख़ूब तूल दी जाती है, और आपको पता ही होगा कि हिन्दी के सबसे ज्यादा बिकने वाले अख़बार की कतरन मोदी भी ट्वीट करता है।

काँग्रेस को अगर 2024 में कुछ उखाड़ना है तो उसको नए सिरे से सोचना पड़ेगा। ये राजनीति फ़्लॉप हो चुकी है। उसको बाउंड्री पर खड़े वोटरों को समझाना होगा कि वो बेहतर है। क्योंकि भाजपा जब डिमोनेटाइजेशन को भुना ले जा सकती है तो वो फिर गिरती अर्थव्यवस्था को भी ये कहकर बता लेगी कि देशहित में ये छः तिमाही गए हैं, और अच्छे दिन बिल्कुल आएँगे। एक बात जान लीजिए कि आपको ‘मन की बात’ आदि मजाक लगते होंगे, लेकिन लोग उसे सुनते हैं और उन्हें ये लगता है कि बहुत कुछ हो रहा है। ये उनके जीवन में बदलाव लाए या न लाए, उन्हें ये विश्वास दिलाया जा रहा है कि बहुत कुछ हो रहा है, और उनकी भी बारी आएगी।

विरोधी लोग अभी तक ‘पंद्रह लाख कब आएँगे’, ‘मंदिर भी तो नहीं बन रहा’ से लेकर ‘गौमाँस ईटिंग फेस्टिवल’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ पर ही अटका हुआ है। मोदी हर रोज अपनी नई योजनाओं के बारे में लिखवाता और कहलवाता रहता है। विरोधी बस प्रतिक्रिया की राजनीति कर रहे हैं। उनकी राजनीति इसी बात पर अटकी हुई है कि ‘भाजपा कुछ करे तो हम ऐसे कहें’। उनका अपना मुद्दा है ही नहीं। ज़रूरी मुद्दे पर ना तो वो बोल पा रहे हैं, न ही मीडिया में बैठे उनके प्रवक्ता चैनल टीआरपी और निजी घृणा से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के मुद्दों पर भाजपा को घेर पा रहे हैं।

ये दो साल भाजपा, मेरे लिमिटेड समझ के हिसाब से, लगातार लोकलुभावन योजनाएँ लाएगी। कई योजनाओं का प्रतिफल भी दिखने लगा है। जिनको पूरा भारत अभी भी अंधेरे में दिख रहा है, उनको आँख और नज़रिया बदलने की ज़रूरत है। जिनको कहीं भी विकास नहीं दिख रहा है। वो भी सो ही रहे हैं। विकास इस देश में हर सरकार में अपनी गति से होता रहा है, होता रहेगा। बहुत कुछ हो रहा है। आप लाख कह लें कि काँग्रेस की योजना का नाम बदल कर भाजपा चला रही है, उससे कुछ साबित नहीं होता। योजना काँग्रेस ने बनाई और अमल भाजपा कर रही है, और उसको प्रचारित कर रही है।

गरीब के खाते में सीधा पैसा पहुँचना बहुत बड़ी बात है। आपके लिए नहीं होगी क्योंकि आपको तो कोई आँकड़ा पकड़ा देगा कि इतने खाते में तो ज़ीरो रूपए हैं, लेकिन आप ये भूल जाते हैं कि करोड़ों खातों में पैसे भी पहुँच रहे हैं। आपको सिर्फ पोल और तार दिखेंगे गाँवों में, जबकि बहुतों के घर बिजली पहुँच रही है। आपको टूटी सड़कें दिखेंगी, और हाइवेज़ अपनी द्रुत गति से लगातार बढ़ते जा रहे हैं। आपको फलाने गाँव की गृहणी चूल्हा फूँकती नज़र आएगी, लेकिन हजारों परिवार ऐसे हैं जहाँ सिलिंडर पहुँच गया है।

बहुत से मामलों में भाजपा बहुत पीछे है, रिग्रेसिव है लेकिन विपक्ष और विरोधी मीडिया गैंग उस पर कभी बात करता ही नहीं। उस पर एक सस्टेंड तरीक़े से कैम्पेन की ज़रूरत है ताकि लोगों तक ये बात पहुँचे और अगले बजट से पहले सरकार पर इतना जवाब बने कि वो शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ ही रेल आदि पर बहुत ज्यादा ध्यान दे पाए। ये तीन मुद्दे हर सामान्य आदमी को प्रभावित करते हैं और इस पर सरकार को आप जब चाहें घेर कर तबाह कर सकते हैं। अगर इस पर लगातार बात करके एक माहौल बनाया जाय तो सरकार इस पर काम करने को मजबूर होगी।

अगर विपक्ष और विरोधी लोग ऐसा करने में असफल रहते हैं तो वो भाजपा की जीत है। भले ही ये जीत करोड़ों ग़रीबों की लाशों, हर साल मरते बारह लाख कुपोषित बच्चों, घटिया शिक्षा के कारण बेरोज़गारों की फ़ौज और लगातार बढ़ती महँगाई से घुटते परिवारों को रौंदकर होगी, लेकिन ये जीत तो होगी ही। और ये जीत आपकी हार है। आपकी हार का मतलब है कि आपने एक सशक्त विपक्ष, समझदार विरोधी और देशहित में सोचने वाले बुद्धिजीवी की भूमिका नहीं निभाई।

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