ऐ दिल है मुश्किल: अनुराग कश्यप जी आपसे बेहतर तर्क की उम्मीद थी

आजकल ये फ़ैशन में है कि पूरे देश में जो भी कुछ, चाहे निजी स्तर पर हो, आपको किसी संस्था से नोटिस मिला हो, चाहे किसी ने कोई पोस्टर लगा दिया हो, सब बात के लिए मोदी को ट्वीट कर दिया जाता है। डिजिटल इंडिया की ये एक बहुत बड़ी कामयाबी है। ट्वीट सिर्फ ट्वीट नहीं होता, वो मोदी को लताड़ना होता है कि जो भी गलत है सब तुम्हारी करनी है।

अनुराग कश्यप देश की अगली पंक्ति के विचारकों में एक माने जाते हैं। उनकी फ़िल्मों का व्याकरण, निर्देशन और कहानी कई मुद्दे उठाती है और एक नए तरह से दिखाती है। वो आज के नए दौर की फ़िल्मों की आवाज़ हैं। वो कई बार फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन पर अपनी आवाज़ बुलंद कर चुके हैं जो कि सराहनीय है। लोगों ने सच बोलना बंद कर दिया है और उनके विचार निष्पक्षता से सरकते हुए पॉलिटिकली मोटिवेटेड लगने लगते हैं। ऐसे में अनुराग जी की बोली गाहे-बगाहे सुनाई देती रहती है।

इस विषय से इतर, तथाकथित लिबरल-सेकुलर द्वारा मोदी को गरियाना फ़ैशन में है। आपको याद होगा कि दंगे सपा-शासित प्रदेश में होते हैं और गाली मोदी को पड़ती है। अखलाख उत्तरप्रदेश में मरता है और दोषी मोदी हो जाते हैं। कलबुर्गी, दभोलकर आदि ऐसे राज्यों में, वैसे समयमें, मौत के घाट उतारे गए हैं जहाँ भाजपा का शासन नहीं था। लेकिन ये एक अवधारणा बना ली गई है कि देश में कुछ भी ऐसा हो तो ज़िम्मेदार मोदी है।

ये एक अच्छी बात है क्योंकि प्रधानमंत्री तो पूरे देश का होता है। लेकिन मोदी को गरियाने के लगे हाथों कोई दभोलकर-कलबुर्गी की मौत के लिए दो लाइन काँग्रेस को भी कह देता तो अच्छा रहता। कोई दो आँसू डॉक्टर नारंग, प्रशांत पुजारी या केरल में आए दिन मरते भाजपाइयों के लिए भी बहाता तो अच्छा लगता। कोई दो वाक्य अखलाख की मौत, मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के लिए अखिलेश सरकार की लचड़ क़ानून व्यवस्था पर बोल देता तो भी ठीक लगता।

मोमबत्तियाँ उनके नाम भी जलाई जाती स्क्रीन पर जो मुसलमान नहीं थे लेकिन मार दिए गए थे। रवीश काली स्क्रीन दिखाते हुए इन तमाम राज्य सरकारों की बिखरी क़ानून व्यवस्था पर बोल देते तो लगता है कि अभी भी निष्पक्ष हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता। ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि मीडिया और आम इंटेलिजेन्सिया में ग़लती कहीं भी हो ट्वीट मोदी को ही जाना चाहिए, ऐसा इनके संविधान की प्रस्तावना में लिखा है।

ख़ैर, याद हो कि करण जौहर की फ़िल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में पाकिस्तानी कलाकार फवाद खान के होने के कारण सिनेमा मालिकों के संगठन ने चार राज्यों में इस फ़िल्म का प्रदर्शन करने से मना कर दिया है। ये लोग अनुराग जी की ही इंडस्ट्री के हैं जहाँ भाजपा चुनाव नहीं लड़ती। इस बात पर उन्होंने मोदी की पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ से मिलने को फवाद खान के भारतीय फ़िल्म में होने के बराबर मानते हुए ट्वीटों की एक शृंखला लिख दी।

उनके हिसाब से मोदी जब नवाज़ शरीफ़ से मिल रहे थे, उसी वक़्त करण जौहर की फ़िल्म में फवाद खान की शूटिंग हो रही थी। उसके लिए अनुराग कश्यप मोदी को देश से माफ़ी माँगने कह रहे हैं क्योंकि वो पाकिस्तान गए थे।

हमें अनुराग कश्यप से बेहतर तर्क की उम्मीद थी। हमें अनुराग कश्यप से ये उम्मीद थी कि वो पहले सिनेमा मालिकों से पूछेंगे और समझेंगे कि ऐसा क्यों हुआ? हमें अनुराग से उम्मीद थी कि उन्हें एक फ़िल्म और एक प्रधानमंत्री के शांति प्रयासों के लिए किए दौरे में अंतर का पता होगा। क्योंकि मुझे नहीं लगता अनुराग कश्यप इतने मूर्ख हैं कि वो ये कहकर बच लें कि ‘मैं तो मूर्ख हूँ, मुझे ये समझ में नहीं आता’।

अनुराग जी, सिनेमा मालिकों को मोदी ने फोन नहीं किया है। ना ही ये राजनैतिक लग रहा क्योंकि भाजपा की सरकार सिर्फ चार राज्यों में नहीं है। मोदी पूरे देश के प्रधानमंत्री जरूर हैं लेकिन किसी फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगवाना या हटवाना उनकी ज़िम्मेदारी नहीं है। वैसे ही जैसे कि कपिल शर्मा को घूस माँगने के बाद काम कराने की ज़िम्मेदारी मोदी की नहीं है।

आप उतने मूर्ख या अराजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं। आपने अपनी फ़िल्म ‘उड़ता पंजाब’ के प्रदर्शन पर प्रेस कॉन्फ़्रेंस की तो अच्छा लगा कि कोई तो स्टैंड ले रहा है। आपने सेंसरशिप पर बोला तो भी लगा कि चलो एक बंदा सिर्फ ट्वीट या इधर उधर दो लाइन ना बोल कर ढंग से अपनी बात कह रहा है।

पर यहाँ पर आपके ट्वीट तर्क से अलग अपने नए मित्र करण जौहर के प्रति हमदर्दी से प्रेरित दिखते हैं। वैसे इससे भी आपत्ति नहीं क्योंकि यही तो दोस्ती है। लेकिन दोस्ती निभाने में तर्क से दूर क्यों भाग रहे हैं। आपसे तो ये भी नहीं पूछा किसी ने कि आपने एक फ़िल्म के प्रदर्शन के रोक को प्रधानमंत्री के डिप्लोमैटिक दौरे के बराबर बता दिया पर उरी हमले या आतंकवाद पर आपकी मुखरता कहाँ चली गई। मैं भी ये नहीं पूछूँगा। क्योंकि ये तार्किक नहीं है।

कहना ये है कि आपसे बेहतर उम्मीद थी। विचारक दोनों तरफ पर बोलते हैं। विचारक मित्र का पक्ष जरूर लेते हैं पर तर्क का पक्ष नहीं छोड़ते। क्या आपको सही में लगता है कि मोदी या केंद्र सरकार के पास इतना समय है कि करण जौहर की फ़िल्म का प्रदर्शन रुकवाती फिरे? वो भी बस चार राज्यों में! आपके पीछे पड़ना ही होगा तो बढ़िया से पड़ लेगी और पूरे देश में जहाँ जहाँ उनकी सरकार है वहाँ वहाँ प्रतिबंध लगा देगी।

सरकारों के पास दलीलें भी होती हैं। सरकार कह देगी कि ‘क़ानून व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने ये फ़ैसला लिया है, आप चाहें तो अगले महीने अपनी फ़िल्म लगा लें।’ और आप इस पर कुछ नहीं कर पाते। बात ये है कि देश की जनता का माहौल देखते हुए (जो कि गलत या सही हो सकता है) सिनेमा वालों ने अपने भविष्य में होने वाले नुक़सान से बचने के लिए ये निर्णय लिया है।

ये शायद उनका फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन है। ये उनका मौलिक अधिकार है कि वो आपके मित्र के साथ व्यापार नहीं करना चाहते। आपको उनकी आमदनी, उनके कर्मचारियों के भविष्य की चिंता नहीं है कि अगर कल को पागल भीड़ उनके मॉल, सिनेमा घर तोड़ दें तो क्या करण जौहर भरपाई करेंगे? करण जौहर की एक फ़िल्म दिखा कर एक सिनेमाघर का मालिक ज्यादा से ज्यादा एक करोड़ कमाएगा लेकिन अगर उसमें पगलाई भीड़ आग लगा दे कितने करोड़ जाएँगे, उसका आपको बख़ूबी अंदाज़ा होगा।

बीमा होने के बावजूद उतने दिन सिनेमा हॉल बंद रहने का नुक़सान कौन झेलेगा? ट्वीट करना बहुत आसान है अनुराग जी, आवाज़ बुलंद करना भी आसान है, फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन की दुहाई देना भी सही है लेकिन आपको अपने मित्र के व्यवसाय में घाटे की सोच ने सिनेमाघरों को (अगर हो गया तो) होने वाले घाटे की बात से बहुत दूर कर दिया है। आपको उनके परिवार के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि कल को आपकी भी फ़िल्म वहीं दिखाएँगे।….

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