अगम कुमार निगम आशावाद के चरमोत्कर्ष पर चढ़कर गाते हैं

यूँ तो मुझे ज्ञानियों में श्रेष्ठ और तत्वज्ञानियों में बुद्ध के समकक्ष माना गया है लेकिन मेरी बुद्धि अगम कुमार निगम के सामने चक्कर खाकर गिर जाती है। आशावाद की अगर कोई पराकाष्ठा है तो वो अगम कुमार निगम ही हैं। वो आशावाद इन्कारनेट हैं। जब-जब धरती पर बेवफ़ाई की बात होगी, उनके समय-काल-पात्रता आदि से परे दार्शनिक गीतों को बजा दिया जाएगा।

जीवटता इतनी कि ‘बेवफ़ाई’ अल्बम के बाद उन्होंने ‘फिर बेवफ़ाई – डिसीव्ड इन लऊ’ गा दिया। उनकी आवाज़ और व्यक्तित्व का क्लोजेस्ट कम्पैरिजन शास्त्रों में टीट्वंटी विश्वकप के सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल के अंतिम ओवर फेंकने वाले जोगिंदर से ही हो पाया है। उतना गिरा हुआ आत्मविश्वास फिर भी फ़ाइनल जीत गए। कंधे झुके, और इतने झुके हुए कि कप्तान ग्राउंड्समैन को गेंद फेंक दे लेकिन उसे ना दे। लेकिन धोनी तो धोनी… शिट् विषयांतर हो गया!

अगम कुमार निगम को आपने नहीं देखा हो, फिर भी जब आप उन्हें सुनेंगे तो लग जाएगा कि बहुत ही बेचारा आदमी है। लेकिन एक बात जो आपको नहीं लगेगी वो ये है कि देश के बेहतरीन गायकों में से एक सोनू निगम उनके सुपुत्र हैं। बात लगने की इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि एक तरफ बेवफ़ाई और फिर बेवफ़ाई से जूझता पिता है, और दूसरी तरफ सामाजिक मुद्दों पर स्टैंड लेकर खड़े होने वाले सोनू।

अगम कुमार निगम जी की आवाज़ में आप ज्योंहि ‘वो किसी और, किसी और, किसी और से मिलके आ रहे हैं’ सुनेंगे तो आपको लग जाएगा कि सनम कितना बेवफ़ा है! आपने गाना सुना होगा पर ये गौर नहीं किया होगा कि ‘वो’ तीन बार ‘किसी और’ से मिलकर आ रहे हैं। यानि कि तीन अलग लोगों से, या फिर एक ही से तीन बार। मुझे ऐसे लोगों से आपत्ति नहीं है क्योंकि मैं उन्मुक्त विचार का व्यक्ति हूँ और परमहंस की अवस्था को प्राप्त भी।

ज़ाहिर है कि कोई भी खुद्दार व्यक्ति इस बात पर दुःखी होगा। आप पहली लाइन का टोन, पिच और टिंबर सुनकर ही ज़ेहन में एक तस्वीर बनाना शुरु कर लेंगे कि हो न हो, अगम कुमार ऐसे ही होंगे। और मैं दावे के साथ कह देता हूँ कि आपकी तस्वीर उनकी तस्वीर से मेल खा जाएगी।

पहली लाइन में वो सिर्फ अपनी व्यथा कह रहे हैं, लेकिन अगली लाइन में, अगर आपके पास हृदय नाम की कोई वस्तु है, तो आप रो देंगे। ‘फिर भी हम उनका इंतज़ार कर रहे हैं’ सुनकर आपको लग जाएगा कि कितना प्रेम कर लिया होगा इसने, लेकिन सेक्स रह गया होगा जिसकी टीस इस लाइन में है। सेक्स बहुत ज़रूरी है, लेकिन हर लड़की को ऐसा नहीं लगता। जबकि फ़र्ज़ी नारीवादियों ने इसे मोक्ष का मार्ग बताया है। हो न हो इस गीत की नायिका ने ये समझ लिया होगा तभी तो ‘किसी और’ से तीन बार मिल आई!

अगली लाइन सुनकर आपका संवेदनशील हृदय टूटकर बिखर जाएगा जब अगम कुमार अपनी चाशनी में डूबी आवाज़ में कह देते हैं कि इतना होने के बावजूद, (सेक्स नहीं मिल पाया सो अलग) ‘एक बेवफ़ा से हम कितना प्यार कर रहे हैं’! मैं तो आज भी रो देता हूँ। फिर कोई पूछता है तो बता भी नहीं पाता। इतना सुनने के बाद अमूमन मैं इतना दुःखी हो जाता हूँ जैसे कि वियोगी होकर पहले कवि ने आह से कविता लिख दी थी कि “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्॥”

मैं सुन ही नहीं पाता, लेकिन परोपकार मेरे जीवन का यावज्जीवन ध्येय रहा है तो आगे की दो लाइनें लिख दे रहा हूँ। ‘रोते हैं दिल ही दिल में, खुद को सता रहे हैं’ वाली लाइन में पागलपन है इश्क़ का। ये चरम है। इतनी यातना पिछली बार किस प्रेमी ने खुद पर बुलाई होगी, मुझे ध्यान में नहीं है। इसलिए जब अगली प्रेम कहानी लिखी जाय तो अगम कुमार निगम की आवाज़ को ध्यान में रखा जाय। बताइए कि आदमी दिल ही दिल में रो रहा है, बग़ल में फेफड़ा होता है, उसमें अगर पानी चला गया तो घातक हो सकता है। टार इतना तो नहीं लेकिन बीमार तो कर ही सकता है।

और ‘आँसू भी आ रहे तो, आँसू छिपा रहे हैं’… जान ले लो! जान ही ले लो अगम कुमार जी! क्यों? व्हाय द हेल मैन! आगे की पंक्तियाँ सवाल करती हैं कि ‘दिन रात सोचते हैं, क्यूँ की ये बेवफ़ाई, मेरी वफ़ा क्यों तुझको, अब तक समझ न आई’। ये सवाल एकदम स्ट्रेट फ़ॉर्वर्ड है। लेकिन क्या नायिका ने ध्यान दिया इस पर? मुझे नहीं लगता क्योंकि अगम कुमार जी उसी लय और दर्द भरी आवाज़ में गा रहे हैं।

फिर अगली लाइन सुनकर मैं गाना बंद कर देता हूँ। मैं दुःखी हो जाता हूँ कि इतने सीधे आदमी के हिस्से में इतना दुःख क्यों दिया ईश्वर, अल्ला, वाहेगुरु, राम ने! क्यों! कहते हैं कि ‘वो कहीं और, कहीं और दिल देने जा रहे हैं’। अब इससे मैं गणित में कमज़ोर होने के बावजूद ये आइडिया लगा पा रहा हूँ कि तीन बार ‘किसी और’ तथा दो बार ‘कहीं और’ से तात्पर्य यह है कि बेवफ़ा लड़की बेवफ़ाई करने कम से कम दो अलग जगह, या दो अलग आदमी से तो मिलती ही है। और ये किसी को भी उदास कर देगा। स्पेशली उसको जिसको सेक्स ना मिल पा रहा हो।

मेरा दिमाग खराब हो गया कि ये आशावाद इन्सान आगे फिर एक अजीब लाइन गा देता है कि ‘फिर भी हम उन पर जाँ निसार कर रहे हैं’। द हेल डूड! ऐसी भी क्या बात है भाई? इतना सहने के बाद भी इंतज़ार से जाँ निसार तक किया जा रहा है। मैं प्रेमियों में कृष्ण माना जाता हूँ लेकिन ये लाइन और अंतर्द्वंद्व बियॉण्ड माय कॉम्प्रीहेनिस्व अबिलिटीज़ है। ये मुझसे बर्दाश्त नहीं हो पा रहा और मैं आगे लिख ही नहीं पाऊँगा।

दिस इज़ नॉट डन अगम कुमार जी! नॉट डन।….

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