अमरनाथ यात्रा: ड्राइवर सलीम आदमी है, उसको मुसलमान और हीरो मत बनाओ

अमरनाथ यात्रा वाली बस पर हुए हमले में ड्राइवर सलीम का नाम आ रहा है कि कैसे उसने पचास लोगों को सुरक्षित पहुँचाया। कोई उसे सिर्फ इसलिए हीरो बना रहा है कि वो मुसलमान होते हुए भी हिन्दू यात्रियों के बचा लाया, तो कुछ उसके बस के खराब होने पर ये सवाल कर रहे हैं कि उसी की बस क्यों खराब हुई। आप जो उसे हीरो बना रहे हैं, तो आप ये मानकर चल रहे हैं कि मुसलमान है तो उसको तो हिन्दुओं को मार ही देना चाहिए था, वो बचा लाया तो कुछ असाधारण कर गया! हद है! कितनी घटिया सोच है आपकी?

दूसरे तरह के लोगों, यानि मेरी कॉन्सपिरेसी थ्योरी वालों से गुज़ारिश है कि वाहियात तर्क देने बंद करें। मुझे ऐसे बेहूदे तर्कों से घिन आती है कि ड्राइवर मिला हुआ था, बस के टायर बदलने में इतना टाइम क्यों लगा, बस वहीं पंक्चर क्यों हुई?

कभी चढ़े हो बस पर? जब वो बस आपके बैठने पर पंक्चर होती है तो आपको लगता है कि ‘साला आज ही पंक्चर होनी थी, मेरे ही बैठने पर?’ वैसे ही जब आप कहीं जाते हैं और जाम में फँसते हैं, जो कि वैसे वक़्त हो जब जाम ना लगता हो, तो भी आपको लगता है कि आप ही स्पेशल खराब भाग्य लेकर आए हैं। आपको लगता है कि जिस दिन आप बस पर बैठे, जबकि आप आम दिन नहीं बैठते, उसी दिन जाम लगता है, टायर पंक्चर हो जाता है।

आप इन हज़ार घटनाओं की अनदेखी कर देते हैं कि किसी दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन में आप नहीं थे, उड़ते हाइजैक जहाज़ में आप नहीं थे, दंगों में काट दिये जाने वाले आप नहीं थे। जब तक घटना आपके साथ नहीं होती आपको आपका सौभाग्य याद नहीं आता।

सलीम एक ड्राइवर था। बहादुर आदमी था, मैं ये मानता हूँ। मैं ये इसलिए मानता हूँ क्योंकि अगर वो जिहादी होता तो बस से कूदकर भाग जाता और बस को घाटी में गिरने को छोड़ देता। उससे तो ज्यादा हिन्दू मरते, और आतंकियों की गोली भी कम ख़र्च होती। जन्नत में बहत्तर गुणा सत्तावन हूरें मिलती पैकेज डील में सो अलग!

टायर किसी भी बस का, कभी भी पंक्चर हो सकता है। रात में उसको ठीक करने में तीन क्या, पाँच घंटे भी लग सकते हैं। वो बस वहाँ गई क्यों? क्योंकि बहुत बसें हर रोज़ वहाँ से ऐसे ही जाती हैं। वो उस इलाके में, उस समय पर पहुँची जब आतंकी पुलिस के बंकर को उड़ाने में नाकाम हुए और टार्गेट बदलकर बस पर गोलीबारी करने लगे। ये शायद फ़्रस्ट्रेशन में किया गया हो। वो फोन से जानकारी मिलते ही कन्फर्म बता दूँगा।

बस का ड्राइवर आदमी था, जो कि किसी तरह बस के बाकी लोगों को सुरक्षित ले आया। वो मुसलमान नहीं था, वो आदमी था। जैसे कि आतंकी मुसलमान नहीं, आदमी होते हैं जो अल्लाहु अकबर चिल्लाते हैं। सलीम ने जान बचाते वक़्त मन में अल्लाहु अकबर जरूर किया होगा जिस कारण इतनी जानें बच गईं। दोनों का नारा एक ही है, नीयत अलग है।

इतनी घृणा लेकर कहाँ जाओगे? मैं जानता हूँ ऐसे आतंक का धर्म है, और वो है इस्लाम। कम से कम आतंकी तो यही मानते हैं। लेकिन हर मुसलमान आतंकी नहीं है, ये मैं तब तक मानूँगा जब तक धरती पर का अंतिम मुसलमान आतंक का रास्ता ना अपना ले। वो जरूर अल्लाहु अकबर करता है, लेकिन हर अल्लाहु अकबर करने वाला एके सैंतालीस लेकर नहीं घूमता। उनको उस निगाह से देखना बंद कीजिए। फायदा आप ही का होगा।

भागती बस का ड्राइवर अगर मुखबिर था आतंकियों का, तो आपको ये नहीं लगता कि दौड़ती बस पर एक गोली उसको भी लग सकती थी? उसके लिए तो सबसे अच्छा उपाय था कि ‘फलाने जगह तक मैं बस ला दूँगा, आप लोग फिर देख लेना’। ये कहकर सलीम को कूद कर भाग जाना था। लेकिन उसने गोलीबारी के बीच बस को भगाते रहना बेहतर समझा और जानें बचाईं।

कॉन्सपिरेसी थ्योरिस्ट कृपया मेरे कमेंट में बहस करने ना आएँ क्योंकि ऐसे तर्कों पर मेरा ज़ीरो टॉलरेंस है। इस पर मैं आपकी बात सुनूँगा ही नहीं क्योंकि मैं पहले ही मान चुका हूँ कि बस कहीं भी खराब हो सकती है, और आतंकी हमला कहीं भी हो सकता है। जब ये रिपोर्ट आपको कहीं से मिले कि सलीम आतंकियों से मिला हुआ था, ऐसा पुलिस ने बताया, तब मुझे दिखाना। मैं सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँग लूँगा। अभी मैं इस चक्कर में नहीं पड़ने वाला।

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