‘अंधाधुन’ फ़िल्म रिव्यू: अच्छी फ़िल्म, अच्छी कहानी, अच्छा निर्देशन

कल रात ‘अंधाधुन’ देखी। नाम पर बहुत सोचने पर दो ही जस्टिफिकेशन मिले। पहला यह कि डायरेक्टर ने सोच लिया होगा कि यही नाम जाएगा, व्याकरण गया तेल लेने। दूसरा यह कि आदमी अंधा था और ‘धुन’ बनाना उसकी ज़िंदगी थी, इसलिए उसने सोचा होगा कि पुरुष अंधा है तो ‘अंधी धुन’ लिखने से मुख्य नायक की अहमियत गायब कर ‘धुन’ पर ही केन्द्रित हो जाएगी। 

बाहरहाल, सिनेमा देखी गई और अच्छी है। यूँ तो यह एक शॉर्ट फ़िल्म पर आधारित है, फिर भी बॉलीवुड में इस तरह की सस्पेन्स थ्रिलर कहानी को, अच्छे तरीके से बना लेना, अपने आप में एक उपलब्धि है। कहानी साधारण है, और ट्विस्ट बहुत सारे हैं, जो कि इसे रोचक बना देते हैं। कहानी में गीत और संगीत बड़ी हिस्सा है, लेकिन गीतों के लगातार होने पर भी आपको बोरियत नहीं होगी क्योंकि गीत कहानी में गुँथे हुए हैं। 

गीतों को ठूँस देने से आप उसकी उपयोगिता पर सवाल करने लगते हैं। बॉलीवुड की नब्बे प्रतिशत फ़िल्मों में गीतों का कोई औचित्य नहीं होता। आजकल प्रमोशन के लिए, यूट्यूब पर ‘इतने मिलियन’ लिखने के लिए भी गीत शूट कर लिए जाते हैं। साथ ही, सस्पेन्स थ्रिलर में बैकग्राउंड स्कोर का महत्व बहुत होता है, और संगीतकार नायक के होने से हमें फ़िल्म को उस नज़रिए से भी देखना होगा। 

इस फ़िल्म में गीत कहानी को आगे बढ़ाते हैं। उनका होना ज़रूरी है। वो नायक के मन की बात कहते हैं, और बहुत लम्बे समय तक खिंचते नहीं रहते। कहानी में अपने होने का महत्व बताकर वो गायब हो जाते हैं, घुल जाते हैं कथानक में। पियानो की धुन बहुत खूबसूरत है, और सिर्फ धुन के सहारे भी कई दृश्यों में नायक के ऊहापोह को बख़ूबी उकेरा गया है। 

कहानी एक पंक्ति में कही जाए तो सीधी है, लेकिन लगातार उतार-चढ़ाव और हर सीक्वेन्स में नई मोड़ लेती कहानी हमें बाँधे रखती है। आप सवाल नहीं कर पाते कि जो हो रहा है वो क्यों हो रहा है क्योंकि वो आपको विश्वसनीय लगता रहता है। ऑडियेन्स को लगातार ठगते रहना भी निर्देशक और लेखक की समझदारी की ओर इशारा करता है। 

आपको लगेगा कि अब यार इतना धोखा मिल गया इसको, अब नहीं मिलेगा। लेकिन आदमी की भीतरी प्रवृत्ति, उसका कमीनापन, उसकी नीचता कभी भी जाती नहीं। कम से कम, एक महीने के अंदर तो नहीं ही जाती। इस फ़िल्म के ज़रिए मनुष्य के व्यवहार और उसकी न बदलने वाली प्रकृति के बारे में भी बहुत कुछ देखने को मिलता है। आदमी रात भर में, एक संवाद सुनकर नहीं बदल सकता। ऐसा बहुत कम ही होता है। जब आप एक यथार्थवादी फ़िल्म बना रहे हों, तब तो ऐसा दिखाने के लिए ‘विलिंग स्सपेंशन ऑफ़ डिसबिलीफ़’ का ही आसरा लेना पड़ेगा। 

कहानी के कसाव को बनाए रखने के पीछे निर्देशक का विजन और एडिटर की रचनात्मकता का हाथ होता है। ऐसी कहानियों में एडिटर के हाथ में उतनी ही ज़िम्मेदारी होती है, जितनी निर्देशक के हाथ। कहाँ, कितना बताया जाए, कहाँ क्या दिखाया जाए कि दर्शक सोचता रह जाए, कहाँ कौन-सा हिस्सा बाद में, या पहले रखा जाए कि सस्पेन्स और बढ़ता रहे, ये सफलता से करने पर ही एक साधारण-सी कहानी, बेहतर कहानी बन जाती है। बेहतर एडिटिंग का नमूना यह भी है कि कहानी जहाँ से शुरु होती है, वहीं खत्म होती है लेकिन ट्रिगर के दबने तक हमें ये पता नहीं चलता कि गोली किसको लगेगी, और क्या होगा। 

संवाद जैसे होने चाहिए, वैसे हैं। ज़बरदस्ती के ज्ञान लिए वन लाइनर, गुंडे का हीरो को कूटने से पहले प्रवचन देना, मारपीट से पहले तड़पाकर अपने दिल की बात बताना, ये सब नहीं है। किसी को मारना है, तो भैया जो सामान पास में है उसका इस्तेमाल करके कूटो। किसी की जान लेनी है तो गोली चलाओ। किसी की आँख फोड़नी है, तो फोड़ दो। यहाँ निर्देशक कभी भी समाज के तय नियमों से बँधकर नहीं चलता कि लोग ये विश्वास करेंगे कि एक महिला, दूसरी महिला को बारहवीं फ़्लोर से फेंक देगी? 

उतना टाइम ही नहीं है। कहानी तेज है, और दौड़ती रहती है। आप भी दौड़ते हैं। बहुत लोगों को अंत समझ में नहीं आया, या ‘इन्सेप्शन’ टाइप क्नफ़्यूज्ड हैं कि आयुष्मान ने झूठी कहानी बताई या सच। आयुष्मान ने भी सच्चाई को स्वीकारा और उसने वही किया जो राधिका आप्टे ने उसे सलाह दी। अंतिम दृश्य में छड़ी से कोला/बीयर के केन को उतने ज़ोर से मारना, और शुरु में ही ये बताना कि संगीतकारों का अपना पागलपन होता है, ये बताता है कि उसने राधिका को जो कहा, वो कितना सच था।

सारे पात्रों ने अच्छा अभिनय किया है। अभिनय का दायरा सबके लिए कई भावों वाला था जिसमें आयुष्मान से लेकर तब्बू, और बाकी के कलाकारों ने ख़ूबसूरती से डर, मक्कारी, हरामखोरी, नीचता, घटियापने आदि को निभाया है। 

ऐसा भी नहीं है कि ये फ़िल्म इस साल की बेहतरीन फ़िल्म है क्योंकि मैंने कोई बुराई नहीं लिखी। बल्कि, बुराई न होना किसी चीज को बहुत अच्छा नहीं बना देता। कई बार कहानी का जितना स्कोप होता है, उतना ही दिखा सकते हैं, और निर्देशक उसे सही तरीके से प्रस्तुत कर देता है। ये कहानी अच्छी है, ट्रीटमेंट अच्छा है। 

ये फ़िल्म देखिए, और लोगों को बताइए कि देखने लायक है। वरना मीडियोकर से थोड़ी सही फ़िल्मों को यहाँ पाथब्रेकिंग, और न्यूटन जैसी बेकार फ़िल्म को देश का प्रतिनिधित्व करने भेज दिया जाता है। आयुष्मान खुराना की दाद देनी होगी कि ये अदाकार कहानियाँ कितनी शिद्दत से चुनता है। आज के दौर में, और पिछले तीन दशक में, मुझे इससे बेहतर कहानियाँ पकड़ने की कन्सिस्टेन्सी किसी भी और कलाकार में नहीं दिखी है।

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