अंकित की मौत ऑनर किलिंग नहीं, मुसलमानों द्वारा की गई नृशंस हत्या है

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अखलाख की हत्या के समय हर हिन्दू असहिष्णु हो गया था, बुद्धिजीवियों का हुजूम ट्विटर पर उपन्यास लिख रहा था कि भारत के सर्वसमावेशी सामाजिक ताने-बाने को एक सरकार और एक विचारधारा ने तोड़ दिया है। नज़्में और शाइरियों की एक खेप आती रही कि हम किस और कैसे देश में रह रहे हैं। हर आम आदमी ये सोचने पर मजबूर हुआ कि क्या मानव के जीवन का मूल्य किसी के गोमांस रखने की अफ़वाह मात्र तक सीमित है?

कोई भी संवेदनशील व्यक्ति विचलित हुआ होगा, मैं भी हुआ। लेकिन इसका फ़ायदा राजनैतिक रूप से उठाया गया। मुझे इसकी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि दुर्भाग्यवश राजनीति के हिसाब से जो भी घटित हुआ, एकदम सही हुआ। आपको एक मौक़ा मिलता है आप उसे भुना लेते हैं। इसमें मैंने पार्टियों को कोसना बंद कर दिया है।

दादरी के बाद भी साम्प्रदायिक घटनाएँ हुईं। कहीं दंगे हुए, कहीं एक हिन्दू लड़की को चौदह मुसलमान लड़कों ने ये पूछकर सरेराह छेड़ा, हाथ लगाया, दुपट्टा खींचा कि उसका बुर्क़ा कहाँ है। कहीं प्रशांत पुजारी को काट दिया गया क्योंकि वो आरएसएस का था। डॉक्टर नारंग को घर से खींचकर मुसलमानों की एक भीड़ ने मार दिया। जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन के पास एक हिन्दू ई-रिक्शाचालक के कुछ मुसलमान युवकों ने इतना मारा कि वो मर गया। कासगंज में चंदन को मुसलमानों ने मार दिया। अंकित को उसकी गर्लफ़्रेंड के मुसलमान परिवार वालों ने बीच सड़क पर गला रेत कर, चाकुओं से गोदकर मार दिया।

दादरी के बाद भी लोगों ने ट्वीट किया। लोगों ने ट्वीट किया कि गौरक्षकों ने कहाँ पहलू खान को मारा। लोगों ने बताया कि जुनैद की हत्या एक झड़प नहीं, बल्कि साम्प्रदायिक थी। लोगों ने मान लिया कि गौरी लंकेश को हिन्दू अतिवादियों ने मार दिया। इनमें से किसी में भी पुलिस अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँची। पुलिस के जो बयान आए उससे आपसी झड़प से लेकर तमाम निजी रंजिश की बात कही गई। गौरक्षकों ने कई जगह कानून हाथ में लिया, और उनपर कार्रवाई हुई, या हो रही है। हर ऐसी हत्या पर प्रधानमंत्री का बयान माँगने वाले आजकल चुप क्यों हैं?

लेकिन ये ट्वीट हिन्दुओं की मुसलमान द्वारा आईसिस वाले स्टाइल में मार देने पर कभी नहीं आया कि मुसलमान उपद्रवी हो गए हैं, उनसे हिन्दुओं को ख़ौफ़ हो गया है। ये किसी ने ट्वीट नहीं किया कि मुस्लिम बहुल इलाकों में हिन्दुओं का जीना इस क़दर दूभर हो गया है कि कभी वो कश्मीर से भगा दिए जाते हैं, कभी कैराना से।

एक पुलिस वाले द्वारा किसी मुसलमान दम्पति को ग़लती से छड़ी से छू जाने पर एक कॉलोनी सड़क पर आती है, आग लगा देती है, और फिर रात में नेगोशिएशन के बाद उनपर की जाने वाली कार्रवाई से मुसलमान भीड़ के चेहरों के नाम हटा लिए जाते हैं। इस पर कोई ट्वीट नहीं होता कि एक धर्म के लोग, एक संगठित तरीक़े से दंगा करके, पुलिस को मजबूर करते हैं कि वो केस भी न करे वरना वो और दंगा करेंगे! और ये जस्टिफाय किया जाता है कि माहौल को क़ाबू में करने के लिए ये ज़रूरी था।

ऐसा वो कहते हैं जिनका काम बस कुछ कहना ही है। जब आपका काम सीमित है, बुद्धिजीवी हैं, अंगूठे ही चलाने हैं, आपको सड़क पर नहीं उतरना है तो कम से कम निंदा तो कीजिए कि पुलिस को दंगाइयों के सामने नहीं झुकना चाहए। यही काम अगर गौरक्षकों की भीड़ करती है, और पुलिस कथित गौ-तस्करों पर कानून के मुताबिक़ चार्ज लगाकर केस दर्ज करती है तो आप रोने लगते हैं कि पीड़ित पर ही कार्रवाई हो गई! वाह! ये तो कमाल की बात है कि जब मुसलमान दंगाई हो जाएँ तो पुलिस ये सोचकर डर जाए कि अगर केस किया तो और दंगे होंगे; साथ ही, जब मुसलमान ग़ैरक़ानूनी काम कर रहा हो, और उस पर हमला हो जाए, तो पुलिस इसलिए केस दर्ज न करे क्योंकि उस पर हमला हुआ है। क़ायदे से विरोध तो तब होना चाहिए जब पहलू खान पर केस कर दिया जाए, और उसको मारने वाले हिन्दू गुंडों को ‘समझा-बुझाकर छोड़ दिया जाए।

ये तो हिन्दुओं के शक्तिपरीक्षण का दौर लग रहा है कि हमने तुम्हारे मंदिर तोड़े, तुमने क्या कर लिया? हमने तुम्हारे ऊपर इतने सौ साल राज किया तुमने क्या कर लिया? हमने दंगे किए, तुम्हें काटा, तुमने क्या कर लिया? हमने सरकारें बनवाईं, और आतंक मचाया, हम पर केस भी नहीं हुआ, तुमने क्या कर लिया? और अंततः, हम तुम्हारे घरों से तुम्हें खींचकर काटेंगे, देख लेंगे कि तुम क्या कर लेते हो! क्या हिन्दुओं को इसी समय के इंतज़ार के लिए तैयार किया जा रहा है कि कब उनका ख़ून खौले, और किसी राजनेता के एक हुंकार पर वो भी नंगी तलवारें लेकर सड़कों पर उतर जाएँ?

ये किन लोगों को छुपाने की कोशिश होती है जब आप ये कह देते हैं कि चंदन तो इसलिए मरा क्योंकि कोई उस गली में ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगा रहा था। फिर तो सारे दंगे ज़ायज हैं क्योंकि कोई उकसाता है तभी तो सामने वाला तलवार लेकर गर्भवती महिला के पेट को काटकर उसका बच्चा भी मार देता है। फिर तो हाथ जोड़ रहम की भीख माँगते गोधरा के उस मुसलमान को काटना भी ज़ायज है क्योंकि भीड़ को लगा कि उसे उकसाया गया है!

चंदन के हत्यारों के नाम में धर्म ही है, समाज नहीं। यहाँ मुसलमानों की भीड़ ने नारे का जवाब नारे से क्यों नहीं दिया? अगर हिन्दुओं की रैली से ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगे तो मुसलमानों की भीड़ में ज्यादा जोर से ‘हिन्दुस्तान ज़िंदाबाद’ कहकर उनका मुँह क्यों बंद नहीं किया? क्या नारे लगाते हुए सड़क पर चलने वालों को आप गोली मार देंगे और कहेंगे कि आपको उकसाया गया? क्या चंदन की हत्या से मुसलमानों के इलाके में जाने वाला हिन्दू भयभीत नहीं होगा?

आखिर मैं अपने बग़ल के मुसलमान से क्यों न डरूँ क्योंकि वो चंदन, नारंग, पुजारी, रवीन्द्र, अंकित की भीड़ हत्या पर चुप रहता है और अखलाख तथा जुनैद पर फेसबुक पर दिन में दस पोस्ट डालता है ये कहते हुए कि वो बहुत डरा हुआ है? अरे डरा हुआ तो हिन्दू है कि कमलेश तिवारी आज भी जेल में बंद है, और दुर्गा को वेश्या कहने वाले, सरस्वती की नंगी तस्वीरों को जेएनयू में चिपकाने वालों पर कोई केस दर्ज नहीं होता!

ये दोगले बुद्धिजीवी जो बीएचयू की घटना पर, जेएनयू की घटना पर, जाधवपुर की घटना पर कुकुरमुत्तों की तरह अपने बिके हुए ज़मीर के साथ दो लाइन के चुटकुले लिखकर पूछते हैं कि क्या फासीवाद का और भी कोई रूप है, उनसे पूछना चाहता हूँ कि ये दोगलापन लेकर सोते कैसे हो? ये जो इन साम्प्रदायिक मौतों पर तुम्हें नज़्म और शाइरी सूझ रही है, वैसी प्रतिभा कहाँ से लाते हो?

क्या मुसलमानों की भीड़ किसी हिन्दू को उसके हिन्दू होने के कारण मार देती है तो वो तुम्हारे किस तर्क पर फ़िट नहीं बैठता? अखलाख, चंदन और अंकित में क्या अंतर है? इनमें से हर एक अपने धर्म के कारण दूसरे धर्म द्वारा घेरकर मार दिया गया। फिर अखलाख की मौत पर काले प्रोफाइल वालो, आज क्या गूगल से काले रंग के बैकग्राउंड मिलने बंद हो गए? अपने बापों से पूछो कि क्या वही तुम्हारे बाप हैं, क्योंकि मेरी समझ में ये दोगलों का काम है।

तुम्हारी शिक्षा, तुम्हारी परवरिश, और तुम्हारी समाजिक समझ में बहुत बड़ा खोट है अगर तुम्हें मुसलमानों का मरना ही साम्प्रदायिक लगता है, और हिन्दुओं के मरने पर तुम चुप रहते हो।

साथ ही, आपलोग जो मुझे सुनते और पढ़ते हैं, आपसे एक अपील है। आप अपने प्रोफाइल पर, अपनी ही फ्रेंडलिस्ट से ऐसे दोगलों को पहचानना शुरु कीजिए। ये आपके कॉलेज का दोस्त होगा; नई-नई झोलाछाप सेलेक्टिव रिटेन्शन की शिकार वामपंथन होगी; आप जिनको ज्ञान के लिए पढ़ते हैं, वो ऊँघते साहित्यकार होंगे; आपके वो दोस्त होंगे जो मुसलमानों के हत्यारों का पता चलने से पहले ही पूरे हिन्दू समाज को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।

इन्हीं दोगलों के कारण, इन्हीं सड़े हुए बुद्धिजीवियों को कारण, एक आम झड़प साम्प्रदायिक हो जाती है, और सही में साम्प्रदायिक, घृणा और वैमनस्य की घटनाओं को चलता कर दिया जाता है। इसी सोच का परिणाम है कि हिन्दुओं ने अपने प्रोफाइल में ‘प्राउड हिन्दू’ लिखना शुरु कर दिया है और वो हर मुसलमान की मौत का जश्न मनाते हैं। यही कारण है कि राजसमंद की घटना को कुछ हिन्दू बड़े ही चाव से देखते हैं और कहते हैं कि सही किया।

यही कारण है कि एक सामान्य हिन्दू ऊब जाता है बार-बार एक ही तरह के विचार और चुप्पियों को देखकर। फिर वो धीरे-धीरे कट्टर होने लगता है। वो इसलिए कि उसे अपने सामने के लोगों का दोगलापन बहुत ही साफ दिखने लगता है कि ये तो उस वक़्त बहुत लिख रहा था, आज शाइरी कर रहा है! वो सोचता है कि आखिर क्या अजेंडा है इन विचारशील लोगों का जो अखलाख की हत्या पर पोस्ट लिखकर रुला देते हैं और चंदन की हत्या का इन्हें पता भी नहीं चलता?

इन दोगलों को पहचानिए जो चुप रहते हैं। इनके हाथों पर भी आने वाले मुसलमानों की लिंचिंग का ख़ून होगा जो कोई हिन्दू भीड़ करेगी। अपने से ज़्यादा समझ वाले लोग, जिनसे आप लिखने-बोलने की उम्मीद रखते हैं, वो जब दोगलई से निराश करते हैं तो उससे होनेवाले मोहभंग का नतीजा किसी कट्टर व्यक्ति के रूप में होता है। उसे सरकार की चुप्पी दिखती है क्योंकि उसे वोट चाहिए, उसे एक निष्क्रिय मीडियातंत्र दिखता है जहाँ अखलाख पर दस प्राइम टाइम होते हैं, और चंदन, अंकित, नारंग आदि के हत्यारों का नाम लेने में भी हिचक होती है।

इन दोगलों को पढ़कर अपनी राय मत बनाइए। ये आपको आदमी से हैवान बना देंगे, ये आपकी संवेदना को कुचल देंगे। ये आपको उस स्थिति में पहुँचा देंगे जहाँ से वापसी मुश्किल होगी। हर मौत गलत है, चाहे वो अखलाख की हो या चंदन की। हर मौत पर हत्यारों की निंदा ज़रूरी है। कोई भी आदमी प्रेम इसलिए नहीं करता कि वो सड़क पर चाकुओं से गोद दिया जाय। कोई भी आदमी अपने भोजन के माँस का चुनाव इसलिए नहीं करता कि सड़क की भीड़ उसे मार डालेगी।

आपके हाथ में एक चुनाव है कि आप किसे पढ़ना और सुनना चाहते हैं। उन लोगों को जो सही मायने में साम्प्रदायिक और कट्टर हैं, या फिर उन्हें जिसके लिए हर मौत बराबर है, हर दंगा हिंसक है, हर लाठी-पत्थर चलाने वाला अपराधी है। ऐसे लोगों से बचिए, ये आपको ज़िंदा ही मार देंगे।

इसी दोमुँहेपन और मीडिया एवम् बुद्धिजीवियों की सेलेक्टिव चुप्पी पर आनंद कुमार का लिखा एक लेख यहाँ पढ़ें। 

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