आसिफ़ा-कांड दूसरा निर्भया-कांड नहीं बन पाएगा

(इस आर्टिकल को विडियो रूप में यहाँ देखें)

शब्दों पर ग़ौर कीजिएगा: हिन्दुओं ने, मुसलमान बच्ची को, क्रूर तरीक़े से, मंदिर के भीतर, देवस्थान ले जाकर, बलात्कार किया, ताकि मुसलमानों में डर फैलाया जा सके, और उन्हें खदेड़ा जा सके, आसिफ़ा का परिवार गाँव छोड़ चुका है, तिरंगे वाली आतंकी भीड़, वंदे मातरम् का नारा लगाती हिंसक भीड़, जय श्री बोलने वाले रामभक्त बलात्कारियों के समर्थन में उतरे…

ये सामान्य शब्दावली नहीं है। तीन महीने पहले बलात्कार जैसी जघन्य घटना हुई, बच्ची को मार दिया गया। इसमें आठ लोग शामिल थे, जिनमें पुलिस और सरकारी अधिकारी समेत दो माइनर भी थे। ये एक क्रूर अपराध है। इसकी सजा उसी हिसाब से मिलनी चाहिए। किसकी मंशा क्या थी, वो कोर्ट में तय हो जाएगा। अगर कम्यूनल एंगल है तो वो भी देखा जाएगा, देखा जाना चाहिए।

लेकिन मीडिया ट्रायल शुरु हो चुका है। बलात्कार हमेशा क्रूर ही होते हैं, इसमें डिग्री नहीं होती कि ये ज़्यादा जघन्य है। जो पीड़िता है उसकी ज़िंदगी एक तरीक़े से बर्बाद हो चुकी होती है। कुछ को मार दिया जाता है। हम उसे क्रूरतम कहते हैं। कथुआ में जो हुआ वो सामूहिक बलात्कार था, ‘कुछ’ हिन्दुओं ने किया। फिर ‘कुछ’ हिन्दुओं की भीड़ ने बलात्कारियों (या आरोपियों) पर केस दर्ज न हो इसके समर्थन में ‘हिन्दू एकता मंच’ के बैनर तले रैली निकाल दी जिसमें ‘कुछ’ लोग तिरंगा के साथ थे, ‘कुछ’ लोग ‘जय श्री राम’, ‘वंदे मातरम्’ आदि का नारा लगा रहे थे।

मैंने हर जगह ‘कुछ’ शब्द पर जोड़ दिया है। अब शुरुआत पर वापस जाकर देखिए कि कैसे एक घटना को चलाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर एक तंत्र है इसके लिए जो बिना पैसों के मज़दूरी करता रहता है, चाहे सत्ता के पक्ष में हो या विरोध में। ऐसा तंत्र इस तरह की ख़बरों को खोजता रहता है। ऐसा तंत्र ‘कुछ’ शब्द को ग़ायब कर देता है। 

फिर इसे ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो ‘कुछ’ लोगों की भीड़, पूरे हिन्दू समाज, देशभक्तों का, वंदे मातरम् बोलने वाले हर व्यक्ति का, हर रामभक्त का प्रतिनिधित्व करती है। इस तंत्र की मंशा संवेदना नहीं है। नहीं, बिलकुल नहीं, दूर-दूर तक नहीं। ये जब ऐसी संवेदनशील दिखने वाली बातें कहते हैं, उसी के दो मिनट बात एक स्त्री-विरोधी सेक्सिस्ट चुटकुले पर हँस लेते हैं, या अपनी कलीग की छाती के आकार पर बातें करके खिलखिला उठते हैं। 

ये संवेदना के लिए आपको नहीं बताते। ये सूचना और इस तरह के विश्लेषण का मक़सद किसी भी सूरत में किसी आठ साल की बच्ची की वकालत नहीं होता, वो ‘एक मुसलमान बच्ची का हिन्दुओं द्वारा मंदिर के देवस्थान में रेप हुआ’ ये बताना होता है। फिर इस तंत्र के लोग इन शब्दों पर खेलने लगते हैं। फिर उसे ‘राष्ट्रवादी’ सरकार के सर पर दे मारते हैं कि तिरंगा लेकर उसमें तो तुम्हारे ही लोग थे ना? 

दो मंत्री गए थे उसमें। इन दोनों को पार्टी और सरकार से निकाल कर, राष्ट्रद्रोह, कानून को काम करने से रोकने के चार्ज के साथ केस दर्ज होना चाहिए। अब मेरा सवाल ये है कि क्या ये विधायक और मंत्री सरकार की अनुमति से वहाँ गए थे, या फिर उन्हें ये लगा कि हिन्दू वोट को पास रखने का ये बेहतर मौक़ा है? अगर बात दूसरी है तो फिर ये निजी तौर पर गए थे, और उनके वहाँ होने पर सरकार का प्रतिनिधित्व दिखाना कुटिलता है। 

ख़ैर, बात वो नहीं है। बात है कि चुनावों से पहले एक बड़ा मुद्दा चाहिए होता है। तंत्र के सिपाही घात लगाकर बैठे होते हैं कि कब मोहन भागवत बोले कि रिज़र्वेशन हटना चाहिए; कि कब पता चले कि अखलाख को एक भीड़ ने मार दिया; कि कब ऊना में दलितों को पीट दिया गया; कि कब रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली; कि कब मुसलमान बच्ची का हिन्दुओं ने बलात्कार कर दिया… और इन सब पर मोदी का ट्वीट नहीं आया! 

इस देश के अपराध के आँकड़े उठाइए श्रीमान्! देखिए कि कितने बलात्कार हर रोज होते हैं, और क्या ये संभव है कि मोदी हर बलात्कार पर ट्वीट करे। क्या आप ये दावा कर सकते हैं कि मोदी ने स्त्री सुरक्षा और गर्ल चाइल्ड सेफ़्टी पर बयान नहीं दिया है? तंत्र के सिपहसलार (जिनके सौ-दो सौ लाइक्स कहीं नहीं जाते) लिख देते हैं कि ट्वीट किया लेकिन रोया नहीं इस बार! तब आपको मंशा का पता चल जाना चाहिए कि आदमी को बच्ची की मौत से कुछ खास लेना देना नहीं है और अगर इसकी अपनी बेटी के साथ भी ऐसा हो जाए तो भी उसे ये अपनी राजनैतिक अंधविरोध और दो सौ लाइक के लिए भुना लेगा। साथ ही, मेरे पिछले वाक्य का ये मतलब न लिया जाए कि मैं किसी की बेटी के बलात्कार की कामना करता हूँ। 

बहुत स्पिन किया गया, बहुत नायाब कीवर्ड गढ़े गए, लेकिन इंडिया गेट के कैंडिल मार्च में निर्भया वाली भीड़ नहीं दिखी। वहाँ बलात्कार के विरोध में जुटी भीड़ कॉन्ग्रेस राज परिवार की राजकुमारी समेत कई एक्टिविस्टों को मोलेस्ट करती नज़र आई। ये अंतर है दोनों भीड़ों में। 

और ये अंतर क्यों है कभी सोचा है? 2013 में सोशल मीडिया पर लोग एक साथ थे क्योंकि निर्भया कांड में को ज़बरदस्ती का एंगल नहीं था। वहाँ एक क्रूर बलात्कार के बाद ज़िंदगी और मौत से जूझती वो लड़की थी जो कोई भी लड़की हो सकती थी। वहाँ हिन्दू लड़की नहीं थी जिसका बलात्कार किसी राम नाम के आदमी ने किसी मुसलमान के साथ मिलकर कर दिया था। उस वक्त लड़ाई एक तंत्र के ख़िलाफ़ थी कि लड़कियों को दिल्ली जैसे शहर में सुरक्षा क्यों नहीं है? 

लेकिन 2018 की अप्रैल में समय बदल चुका है। अब लोग पहचान गए हैं कि सिपहसलार और धूर्त तंत्र कैसे काम करता है। अब इंटरनेट और सूचना हर आदमी के पास है इसीलिए वो ये सवाल पूछ लेता है कि मुसलमान का बलात्कार हिन्दुओं ने किया तो आप कीवर्ड स्टफिंग खेल रहे हैं, लेकिन रोहतास में छः साल की हिन्दू लड़की का बलात्कार जब मुसलमान करता है तब तो आप उसे स्वीकार भी नहीं करते कि कुछ हुआ है। जब सालों से घुटा हुआ और भरा पड़ा राइट विंग, संसाधनों का प्रयोग आपके झूठ को पकड़ने के लिए करने लगता है तब आप संवेदनहीनता का आरोप नहीं लगा सकते। 

तब ये सिपहसलार ‘संघी साला’, ‘भक्त’ आदि कहकर भागने के फेर में रहता है लेकिन हर दिन डेढ़ जीबी इंटरनेट उपलब्ध है भाई साहब, वो भी साढ़े छः रूपए प्रतिदिन के भाव पर। आपको तो दौड़ा-दौड़ाकर, घुस-घुसकर सवाल पूछेंगे। आपको इस बार असहिष्णुता की नौटंकी करने का मौक़ा नहीं देंगे क्योंकि ड्राइविंग सीट भी हमारी है, और सड़क भी हमने बहुत सही बना दी है।

ये लिब्रांडु, माओवंशी, लेनिन जैसे आतंकियों से सहानूभूति रखने वाले कामभक्त वामपंथियों की फ़ौज, जिसे राहुल गाँधी में भी देश का भविष्य दिख रहा है, वो तो क़ायदे से खदेड़े जाएँगे। तुम्हारा हर दोगलापन तुम्हारे सामने रख दिया जाएगा कि याकूब, बुरहान के जनाज़े में दस हजार मुसलमानों की भीड़ ‘लाश के सम्मान’ में जाती है न कि आतंकी के प्रति सहानुभूति दिखाने, लेकिन सौ हिन्दुओं की भीड़ पचासी करोड़ हिन्दुओं और उसके आराध्य को आतंकी और बलात्कारियों का समर्थक बना देती है! 

सुधर जाओ, नहीं तो अभी इंटरनेट पर लतियाए जा रहे हो, कल को सड़क पर आते-जाते कोई भी थप्पड़ मार देगा काहे कि फ़ेस रिकग्निशन फेसबुक में आ रहा है और चेहरा देखकर तुम्हारे पोस्ट दिखेंगे, और वहीं चप्पल खोलकर बिना कुछ कहे तुम जैसे घृणा फैलाने वालों, और समाज को हिन्दू-मुसलमान के नाम पर तोड़ने वालों को सूत दिया जाएगा।

तब तुम रोने लगोगे कि भक्त लोग कैसे बिहेव कर रहे हैं! कहोगे क्या यही हैं अच्छे दिन? हम कहेंगे हाँ रे चम्पू, तुम्हारे नाजायज़ बाप अब सत्ता में नहीं है इसलिए अजेंडाबाज़ी बंद करो। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *