‘अवेन्जर्स: इनफ़िनिटी वार’ एक दर वाहियात फ़िल्म है, पायरेटेड भी न देखें!

भारत में कमाई के रिकॉर्ड बनाने वाली इस फ़िल्म की जितनी चर्चा हो गई थी, और जैसे इन फ़िल्मों के फ़ैन्स इसे डिफ़ेंड करके हुए अप्रतिम मान रहे हैं, ये कुछ वैसा ही है जैसा जेएनयू में धोखे से वामपंथी बन जाने के बाद लोग हर मूर्खता को सही ठहराते दिखते हैं। 

इस फ़िल्म में कहानी के नाम पर कुछ नहीं है। अगर मैं तुलना करूँ तो ये ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ के किसी भी एपिसोड की तरह एक लाइन की कहानी वाला प्लॉट है जहाँ पूरे एपिसोड में कुछ खास नहीं होता। कहानी अगर बतानी ही पड़े तो वो यह है कि एक आदमी है जो ब्रह्मांड को तबाह कर देगा, उसे रोकना है। बाकी स्पेशल इफैक्ट्स है, उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। 

ये फ़िल्म समय की बर्बादी है क्योंकि इसमें होता कुछ भी नहीं है। फ़िल्म में इमोशन्स के नाम पर देने के लिए कुछ भी नहीं है। ये आपको भावनात्मक स्तर पर कहीं से नहीं छूती क्योंकि मानवों के होने के बावजूद ये देश, दुनिया, ग्रह, नक्षत्र, सौर परिवार, गेलेक्सी बचाते-बचाते मानवों की समझ के हद से बाहर चले गए हैं। 

वही घिसी हुई कहानी जिसमें एक गुंडा होता है जो हमेशा ऐसी शक्ति तलाशता है जो सबकुछ तबाह कर देगा। शुरुआत में ही ये दिख जाता है कि मुख्य गुंडे थैनोस को तो छोड़िए, वो अपने नौकरों को भेजकर ही सारे अवेन्जर्स को कुत्तों की तरह पीट सकता है। वो सिर्फ खड़ा रहकर हाथ हिलाता है, और चीज़ें उड़ती हैं, और लोगों को लगती हैं। वो परम शक्तिशाली है। पूरी फ़िल्म में थैनोस नहीं भी आता तो भी कोई बात नहीं थी। उससे बेहतर जल्वे उसके नौकरों ने काटे। 

चार-पाँच उलूल-जुलूल से ग्रहों के नाम, बहत्तर सुपरहीरो जो अलग-अलग ग्रहों पर पिटते रहते हैं, और कहानी को कहीं भी नहीं ले जाते। आप इस सारे सुपरहीरोज़ को अलग-अलग ग्रह से निकाल दीजिए, फिर भी कहानी में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मतलब, आईरनमैन को हटा दीजिए, फिर भी कुछ नहीं होगा। डॉक्टर स्ट्रैंज को एक बार हटा दीजिए, कहानी बिलकुल वही रहेगी। 

मतलब ये कि पहले जो बैकग्राउंड में सैनिक बनकर लड़ते थे, उनकी जगह अब कैप्टन अमेरिका, ब्लैक पैंथर, और पता नहीं कौन-कौन बनकर आ गए। पहले एक हीरो के पीछे ‘कुछ लोग’ होते थे, अब वो ‘कुछ लोग’ सीन से हटाकर हीरो बना दिए गए हैं। इतने की जगह एक आइरन मैन ही होता तो भी ये फ़िल्म बर्दाश्त करने लायक हो सकती थी। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि एक हीरो से काम चल सकता था। 

क्रेडिट रोल में डिजिटल आर्टिस्टों का नाम था। उन्होंने काम तो किया है लेकिन वो भी कुछ आउट-ऑफ़-द-वर्ल्ड टाइप नहीं है। इससे बेहतरीन लैंडस्केप आपको ‘अवतार’ और ‘इंटरस्टेलर’ में देखने को मिल जाएगा। कॉमिक्स की किताबों में कल्पना की उड़ान से मुक्त दस-पचास लाइनों को थ्रीडी में कम्पोज किया गया है। हर ग्रह इतना वृहद् और सब एक ही जैसे! सारे डार्क मोड में, क्योंकि वहाँ तबाही फैलाई गई थी।

मैंने पहले भी मारवल की कई फ़िल्में देखी हैं। ये सबसे वाहियात है। फ़िल्मों में लगता था कि कोई समस्या है, जिसके लिए काम किया जा रहा है। यहाँ समस्या के बड़ी होने की लिमिट हास्यास्पद अनुपातों में बढ़ा दी गई है। और उसको बाँधने के लिए बहत्तर लोगों को कॉस्ट्यूम्स में तीन-तीन मिनट के रोल दे दिए गए हैं। किसी की कोई पर्सनल ट्रैजडी तीन सेकेंड से लम्बी नहीं। आप एक की कहानी में घुसना चाहते हैं कि थैनोस वहाँ आँधी लेकर पहुँच जाता है। दो की समस्या प्रेमी से अलग होने की ही है, वो भी कन्विन्स नहीं कर पाती। 

संवादों में मजाक का पुट था जिससे लोग हँसते रहे। लेकिन सिर्फ हँसा पाना एक सुपरहीरो फ़िल्म की नाकामयाबी है क्योंकि इसमें इतने ग्रैंड लैंडस्केप और फ़ाइट सिक्वेन्स के बाद भी थ्रिल या रोमांच के नाम पर कुछ नहीं है। इसका एक्शन आपको बोर करेगा। आपको अगले डायलॉग का इंतज़ार रहेगा कि अगला चुटकुला कौन सुनाएगा।

इसमें कोई दोराय नहीं कि फ़िल्म बनाने में बहुत मेहनत लगी होगी, लेकिन वही मेहनत कहानी लिखने में भी की जा सकती थी। बहुत ज़्यादा मेहनत के बाद एक बकवास फ़िल्म कैसे बनती है, वो इनफ़िनिटी वार देखकर पता चल जाता है। जिन्हें बेहतरीन लगी वो सिर्फ नीली-पीली-हरी-लाल एनर्जी-ब्लास्ट वाली लाइटों की कलाकारियाँ देखने जाते हैं। किसी ने उधर हाथ घुमाया तो कुछ हो गया, थोड़ा ज़्यादा हाथ घुमाया तो ज़्यादा डैमेज हो गया। 

कुल मिलाकर ये एक बेकार फ़िल्म है। इस फ़िल्म को लैपटॉप पर भी, अगर आपके पास अनलिमिटेड ब्रॉडबैंड नहीं है, डेटा ख़र्च करके डाउनलोड करना मूर्खता है। ये आपको लो-एनर्जी ब्लूटूथ से फोन पर किसी के द्वारा दिए जाने पर ही देखनी चाहिए। खुद डाउनलोड मत कीजिए, निराशा होगी। अख़बारों की रेटिंग पर मत जाइए, उनको पीआर वाले पैसे देते हैं। 

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