‘बकर पुराण’ – समकालीन संदर्भों और उनके अर्थपूर्ण अन्यथाकथन पर एक पाठ के रूप में

 

अजीत भारती रचित ‘बकर पुराण’ – समकालीन संदर्भों और उनके अर्थपूर्ण अन्यथाकथन पर एक पाठ के रूप में

पल्लवी मिश्रा
सहायक प्रोफ़ेसर
गवर्नमेंट पीजी कॉलेज, डोईवाला
देहरादून

इस शोधपत्र में मैं अजीत भारती द्वारा रचित ‘बकर पुराण’ को समकालीन परिदृश्य के एक ऐसे सामाजिक दस्तावेज़ हो जाने के ऊपर एक प्रभावशाली कटाक्ष के रूप में रखना चाहती हूँ जो कि अपने सांस्कृतिक संदर्भों से ऐसी सामाजिक ऊर्जा पैदा करता है जिससे आम जनजीवन एक जुड़ाव महसूस करता है। दूसरे कई व्यंग्यकारों से कहीं अलग, लेखक का मानवीय संवेदना से जुड़ा होना इस पाठ (किताब) को पठनीय और स्मरणीय बनाता है जहाँ व्यंग्यकार वृहद् समाज से दूर नहीं बल्कि उसी का हिस्सा है और जिसका व्यक्तित्व लक्षणालंकारिक (metonymic) है।

वह अपने माहौल और पात्रों से बिल्कुल सहज है, या यूँ कहें कि वो वहाँ से दूर दिखता हुआ, लेकिन आलोचनात्मक और निष्पक्ष रूप से, उस माहौल की हर अतिसूक्ष्म हलचल का आनंद लेता प्रतीत होता है। इनका कटाक्ष हास्य की ज़मीन से उठता है जहाँ सबको समान रूप से अपने हिसाब के सामाजिक वर्गों में होने या उन्हें बनाने की स्वतंत्रता है। इसी कारण से यहाँ पर हास्य लोगों की आवाज़ बन जाता है जो कि कई दृष्टांतों पर, कई संदर्भों में बोला जा सकता है। साथ ही, ये अनुभवों को संचारित करने तथा एकजुटता और सामाजिक वर्गों के साझा पहचान का ज़रिया भी बन जाता है।

हिन्द युग्म, नई दिल्ली, द्वारा 2016 में प्रकाशित अजीत भारती रचित ‘बकर-पुराण’ हास्य-लेखन की दुनिया में एक ताज़ा, चौंकाने वाले व्यंग्य के रूप में प्रवेश करती है जिसकी सामग्री (कंटेन्ट) और लेखन शैली में एक विशिष्ट नयापन है। ये किताब अपनी विधा के प्रचलित तरीक़ों से अलग होती दिखती है, पाठकों को ध्यान देने पर मजबूर करती है, उन्हें हँसाती है, रुककर लिखी बातों के उन मायनों पर सोचने को मजबूर करती है जो सीधे तौर पर तो नहीं कहे गए, पर उधर लेखक का इशारा जरूर है।

जब वार्तालाप साहित्य बन जाता है, तो साहित्य को इसका अंतिम अर्थ मिल जाता है क्योंकि यह सिर्फ पढ़ा नहीं जाता है बल्कि विचारों और शब्दों में जिया जाता है, उसे उत्साही और जीवंत बनने के लिए। यह लोगों के किताबों के रूप में कायापलट होने की प्रक्रिया है, एक परिवर्तन जहाँ जीवन और साहित्य की सीमाएँ गायब होती जाती हैं। चरित्रों का विषय में घुलते जाना ही इसकी थीम है; लेखों के पात्र ही लेखन सामग्री हैं और एक शैली है जो विशिष्ट, अनोखी, सरल और अपील करती है। विसंगतियाँ और प्रचुरता, संपूर्णता का एक हिस्सा बन जाती है जैसे कि तार्किकता, करुणा और विचार इसके थीम बन जाते हैं। घटनाओं और छवियों की मदद से लेखक उनकी अर्थहीनता, अप्रासंगिकता, और तुच्छता की कई परतों को उभारता दिखता है।

दूसरे व्यंग्यकारों के व्यंग्य-कटाक्ष आदि के विपरीत, इस किताब का हास्य चंचल और व्यंग्यात्मक है, क्योंकि लेखक यहाँ एक उदार और विचारशील दोस्त की तरह है जो निंदक तो है, लेकिन उसकी बातों में तिरस्कार का भाव नहीं, यहाँ लेखक खुद भीड़ का मूर्त रूप बन जाता है। वो अकेला नहीं रहना चाहता और कई जगहों पर अलग विचार रखने, वाद-विवाद करने की क्षमता रखने के बावजूद कहीं भी अपमानजनक नहीं, बल्कि सहानुभूतिपूर्ण ही दिखता है।

बैचलर लड़कों के सामान्य जीवन के छोटे क़िस्सों को कहना हास्य-लेखन की एक नई प्रयोगात्मक शैली है जहाँ जीवन और हास्य की सीमाएँ आज के युवाओं से उनकी छिपी ईमानदारी की बात खोजते हुए मिल जाती हैं जिनकी आशा और इच्छा आज की दुनिया को उनसे है।

शुरुआत में ही लेखक ने ये कह दिया है कि ये ‘बैचलर व्यंग्य’ है। आगे ये जोड़ा गया है कि भले ही किताब के नाम में ‘बकर’ शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है बकवास, लेकिन यहाँ बकवास कुछ भी नहीं। यह सचेत युवाओं की दुनिया है; हालाँकि जाहिर तौर पर वो बेपरवाह और स्वछंद दिखते हैं, लेकिन वो उस दुनिया को जानते-समझते हैं जो उनकी है, और उस दुनिया के बारे में भी जो शायद उनकी पहुँच से दूर है। ये वो युवा हैं जो एक तरफ तो अपनी दुनियावी जिंदगी के कैनवस पर हास्य के रंग भरते दिखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ अपनी इच्छाओं और सपनों की पूर्ति हेतु गम्भीरता से दौड़ लगा रहे होते हैं।

यह एक ऐसी दुनिया है जो बस उन्हीं की है, जहाँ की लगातार चलती बातचीत में आप कवियों और लेखकों, राजनीतिज्ञों, खिलाड़ियों, इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, चित्रकारों और धर्मविज्ञानियों समेत सभी को शामिल पाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण और गौर करने लायक बात ये है कि आलोचनाओं को समुचित स्थान देते हुए, यहाँ साहित्य स्वछंदता से साँस लेता है।

यह विरोधाभासों और स्थापित मानदंडों, अस्पष्टताओं और दुविधाओं, विशिष्टताओं और असहमतियों के साथ-साथ अतिक्रमण और क्षणभंगुरता की दुनिया है। 21वीं सदी के कमरे में रहने वाले इन युवाओं व्यक्तिपरक वास्तविकता उस उत्तर-आधुनिकतावादी संस्कृति का एक हिस्सा है जहाँ ऐसे करोड़ों लोग न सिर्फ उस जियो-पोलिटिकल वास्तविकता में रहते हैं बल्कि इन्टरनेट की आभासी दुनिया में भी उनकी उपस्थिति बराबर बनी रहती है। यहाँ वो अपने तमाम सांस्कृतिक परम्पराओं को एक साथ ही निभाता दिख जाता है। हर व्यक्ति अपने हिसाब की सांस्कृतिक पहचान के लिए अपने हिसाब के फ़ार्मूले बनाने को स्वतंत्र है जो कि विशिष्ट, संकर, उभयभावी है जिसमें क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय का एक समावेश है।

ऐसी दुनिया में एक संस्कृति कई तरह की बातों के मिश्रण का परिणाम है जिसे किसी एक तरह से वर्गीकरण में नहीं रखा जा सकता। ये किताब समकालीन सांस्कृतिक वास्तविकता का नमूना है जिसमें विचार-विमर्श की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है जो कि अपने आप में एक ‘सांस्कृतिक हस्ताक्षर’ कहा जा सकता है। अपनी सारी जटिलता, निरंतरता, सामंजस्य और सम्मेयता के बावजूद, मानवता के सामाजिक वास्तविकता को सिद्ध करने के लिए संस्कृति एक अपरिहार्य तत्व है, तथा पुस्तक के ज़रिए लेखक ने वर्तमान दुनिया को इन तमाम तरह की बहुलताओं से बना दिखाया है। इसे एक ठोस संरचना के रूप में बाँधने हेतु कोई मुख्य बिंदु नहीं दिखती, बल्कि ये एक खंडित दुनिया है जहाँ आभासी वास्तविकताएँ, यथार्थ से ज्यादा महत्व रखती हैं जहाँ प्रत्येक विचार या घटना के लिए एक छवि को विकल्प के तौर पर रख दिया जाता है।

कनाडा के टीवी तथा अख़बारों के समालोचक जॉन डॉयल का कहना है, “ऐसे विशिष्ट समय आते हैं जब व्यंग्य करना ज़रूरी हो जाता है। हम उस समय में प्रवेश कर चुके हैं।” (ग्लोब एण्ड मेल)

ऐसे अस्थिर समय में सांस्कृतिक मुद्दों, भाषा आदि के बदलते परिदृश्य पर आलोचना के माध्यम से आवाज उठाने की ज़रूरत है। बकर पुराण में हास्य को किसी एक ही तरीके से वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये पुस्तक कॉमेडी, साज़िश, वाक्पटुता, पश्चाताप, कष्ट और भावनाओं का मिश्रण है। और ये जो भी है, वो किसी भी तरह से भ्रामक तो नहीं ही है। यह मानव व्यवहार, उसके अवगुणों या कमियों की आलोचना है, जिसका मक़सद दर्शकों को इसे तिरस्कार से देखने के लिए प्रेरित करने के इरादे से एक सामाजिक परिवर्तन को प्रोत्साहित करना है।

यह पुस्तक युवाओं के दैनिक जीवन के क्रियाकलापों, व्यावहारिक मानदंडों का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दिखाती है। यहाँ उन मध्यवर्गीय युवकों की घबराहट से प्रस्फुटित व्यवहार का कुशलता से चित्रण किया गया है जो बाक़ियों के क़दम से क़दम मिलाकर चल सकने के लिए कॉस्मोपॉलिटन जिंदगी के अनुसरण के चक्कर में रहते हैं। और इसी सब के बीच इन युवाओं का मोहभंग भी दिखता है जबकि वो इस खोखलेपन से ऊबकर वापस अपनी जड़ों की तरफ जाने की मंशा दिखाता है। काल्पनिक प्रेम और लड़की के लिए बेकार घूमने को लेखक ने मैत्रीपूर्ण छेड़छाड़ और सहज हास्य के माध्यम से दर्शाया है।

भारती अपने विवरण में अत्यंत सरल हैं और इसमें न तो किसी भी प्रकार की निंदा का सहारा लेते हैं या फ़ैसले सुनाते दिखते हैं। इनका गद्य अलंकृत या सजावटी नहीं, बल्कि सादगी, ऊर्जा और उत्साह से भरा है। उपहास, ताने, मज़े लेना, हँसी-ठठ्ठा, चिढ़ाना, चुटकी लेना आदि संवाद का अभिन्न अंग बने दिखते हैं।

यहाँ हास्य छोटे-छोटे समूहों की आंतरिक और निजी भाषा बनकर सामाजिक एकजुटता का महत्वपूर्ण आधार बना दिखता है। इस बात को मानना कि बाकी लोग भी हमारी ही तरह से सोचते हैं, अपनी परेशानियों और अनुभवों को साझा करते हैं, विनोदपूर्ण आनंद का प्रमुख स्रोत है।

लेखक जीवन के बाह्यावरण को उसके फ़ैशन, मान्यताओं, शिष्टाचार के तरीक़ों, बोलचाल, रुचियों के माध्यम से सिनेमा हॉल, सड़कों, रेसिडेंशियल सोसाइटियों, हॉस्टलों जैसी सामाजिक जगहों को गौर से देखता है, और हम तक पहुँचाता है। जिन लोगों का चित्रण हुआ है वो सामाजिक सरोकार वाले, नम्र, रोमांटिक, दूसरों के प्रति संवेदनशील, और सबसे महत्वपूर्ण, ईमानदार हैं। भावनाओं और उसके प्रवाह से उत्पन्न होने वाली क्रिया की तरफ लेखक हमारा ध्यान ले जाना चाहता है, साथ ही कभी-कभार उनकी कठोरता को व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ नकार भी देता है।

समाज के व्यवहारिक पतन की अस्वीकृति जरूर दिखती है लेकिन लेखक सावधानीपूर्वक नैतिकता की वकालत करने से खुद को रोकता है। आदतों, सामाजिक व्यवहार के मिसालों, अनैतिकताओं को जिस तरह से वर्णित किया गया है वो बिल्कुल ही हानिरहित हैं क्योंकि जिस संसार में ये पात्र ज़िंदा हैं, वह आम लोगों की दुनिया है जिनका साझा अनुभव एक यथार्थ है, कपोल कल्पना नहीं। सिनेमा हॉल के भीतर, वैलेंटाइन डे पर, रेलयात्रा में, प्रेम में, त्योहारों को मनाने के तरीक़ों में, भोजन की विविधताओं, बचपन की यादों को जीते पात्रों के छोटे-छोटे क़िस्से मानव जीवन और समाज के अनौपचारिक चित्रण हैं जहाँ कठोरता या क्रूर निंदा नहीं है। जहाँ असंतोष है, वो भी बहुत ही सौम्य है; निर्दोष झूठों को मनोरम विनोद के साथ संरेखित किया गया है।

वर्तमान समय के गीतों के बोल और संगीत पर किया गया व्यंग्य एक मुख्य विषय है। संगीत को, जो लोकप्रिय है, उसकी विकृति के साथ जनमानस बड़े ही व्यापक तौर पर स्वीकारता है। आम जनता के इस विकृत संगीत से प्रेम पर प्रखरता से कटाक्ष किया गया है। गीत के बोल और संगीत के विरूपण तथा उसके गिरते स्तर के बावजूद सामान्य आबादी का उसको लेकर प्रेम को दिखाते हुए लेखक जनता के सोचने की क्षमता का ह्रास और उसके भावनाओं के छिछलेपन को प्रतिबिम्बित करता है।

साथ ही, यह एक सीमाओं से परे एक संस्कृति के विकास की और इशारा करती है जो धीरे-धीरे इस उत्तर-आधुनिकातावदी उपभोक्ता समाज में तथाकथित सांस्कृतिक प्रतिबंधों को ध्वस्त कर रही है जहाँ ‘स्व’ (self) को बिना कोई छूट दिए बिना ‘अन्य’ (other) को अनुमति दे दी जाती है।

इसे एक ऐसा अनुभव कहा जा सकता है जिसमें ‘स्व’ का निर्माण करने वाले अहंकार का त्याग किए बिना ‘अन्य’ के कट्टरपंथी प्रतिनिधित्व को शामिल किया जा सकता है। लेखक जानबूझकर ईमानदार भावनाओं की कमी की ओर इशारा करते हुए गीतों के हर वाक्य का वर्णन करता है, जो या तो भुलाने लायक हैं, या अवांछनीय। कटर, बटर, फेवीकॉल, डॉल, मिस कॉल, बैट-बॉल, सिनेमा हॉल, मैरिज हॉल, ओवरऑल, फोटो, फैंट, क्लोज़, शटर, डॉटर, क्वार्टर, वाटर जैसे शब्दों का प्रयोग पहली नज़र में सशंकित करता है क्योंकि इसमें गीत के शब्दों के साहित्यिक होने की सारी संभावना ख़त्म होती दिखती है, लेकिन इसके बावजूद गीत की ‘सप्रसंग व्याख्या’ करते हुए लेखक उसी स्तर की लापरवाही के साथ गीत के बोलों को जानबूझकर दार्शनिक अर्थ देता हुआ उसे हास्य पैदा करने वाला बना देता है।

लेखक इन लोकप्रिय गीतों की ‘व्याख्या’ के माध्यम से फ़िल्मों में महिलाओं के कमोडिफिकेशन, उनको पुरुषों के उपभोग की वस्तु के तौर पर चित्रित करने से लेकर, औरतों को लेकर सामान्य बातचीत की अपमानजनक भाषा के प्रयोग आदि पर बहुत ही बेरहमी से व्यंग्य करता है। गीतों और फ़िल्मों की विकृति, महिलाओं की विभिन्न मीडिया प्रस्तुतीकरण में उनके स्टीरियोटाइपिंग, अश्लील चित्रण और विचार के अभिन्न अंग हैं। आज मीडिया में औरतें जितनी और जिस तरह से दिखाई जाती हैं, उससे कहीं ज्यादा संख्या में कार्यरत हैं। लेकिन डेमोग्राफिक्स में बदलाव के बावजूद औरतों को लेकर समाज के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं दिखता। फ़िल्में और गीत इस बदलते डेमोग्राफिक्स का न तो प्रतिनिधित्व करते हैं न ही कार्यस्थल पर बदलते लिंगानुपात को दर्शाते हैं, बल्कि उसके विपरीत उनकी स्थिति को विकृत करते हुए एक पितृसत्तात्मक सोच का प्रदर्शन करते दिखते हैं।

फ़िल्मी गानों में औरत के शरीर को खंडित करते हुए, उन्हें वस्तुओं (लमेरेट्टा, तंदूरी मुर्ग़ी इत्यादि) के समकक्ष रखने की अनकही, और दुर्भाग्य से लोकप्रिय होती, एक अश्लील परम्परा पर भी लेखक ने कटाक्ष किया है कि औरतें महज़ उनकी बाहरी बनावट और देहयष्टि से कहीं ज्यादा हैं, पर उन्हें इन गीतों में उनकी लम्बाई, नाटापन, गोरापन, कालापन, मोटापे आदि से आगे देखा नहीं जाता। महिलाओं की शारीरिक बनावट को इस स्तर तक तोड़ना, औरतों के रूप और उपयोगिता को लेकर हमारी सासंकृतिक अवधारणा की पुष्टि करता है। साथ ही, एक औरत का खुद को किसी के द्वारा (ध्यान) योग्य पाए जाने के लिए बेक़रार होना, और वैसे होने के लिए अत्यधिक ध्यान देना उन्हें भी महज़ एक शरीर ही बना देता है। सिनेमा और गीतों में महिलाओं के शरीर का यह चित्रण हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति और राजनीतिक रूप से सक्रिय मध्यम वर्ग के उदय के समकालीन है।

सबसे महत्वपूर्ण बात, युवाओं का संगीत के प्रति संबंध किसी नए, या असामान्य तरह की बात को जानने समझने से कहीं ज्यादा एक उदासीन स्वीकृति का मामला होता है। ऐसे गीतों से मतलब निकाल पाना एक दुष्कर कार्य है और लेखक का इन्हीं गीतों को एक ‘गहरा’ अर्थ देने की कोशिश उन गीतों की निरर्थकता और अर्थहीनता, दोनों को, सफलतापूर्वक दिखाता है। लेखक आज के युवकों की इस मजबूरी को, जहाँ उनके पास बेहतर विकल्प नहीं हैं, इन शब्दों में बयाँ करता है, “जिस दुनिया में आधुनिकता कमोड पर बैठकर फ़ैशन मैगज़ीन पढ़ने को समझा जाता है वहाँ किसी बात को किसी भी बात का लाॅजिक बनाया जा सकता है।”

रैचल ड्वायर का कहना है, “बीसवीं शताब्दी के अंत का पुरुष… एक उपभोक्तावादी समाज के कपड़ों में एक सलीक़े से तैयार किया गया है, जहाँ उसके शरीर पर फ़िटनेस और व्यायाम का असर दिखता है। वो अपनी ही आत्ममुग्धता की एक वस्तु होते हुए, अपने ऊपर उस तरह की निगाहों को आमंत्रण देता है जो कि परम्परागत रूप से किसी नारी के संबंध में आता रहा है।” (ड्वायर एण्ड पटेल)

नारी शरीर को पुरुषों के दृश्यरतिक आनंद (voyeuristic pleasure) हेतु लगातार गीतों के फ़िल्मांकन में प्रयोग किया जाता रहा है। लॉरा मल्वी (1975) के मतानुसार इसी तरह का वॉयरिस्टिक प्लेज़र सिनेमा के हर तरह के प्रस्तुतीकरण तक पहुँचता है। मल्वी का तर्क यह है कि ‘देखना’ एक पुरुष-संबंधी गतिविधि (male activity) है, जबकि ‘देखा जाना’ ‘प्राकृतिक रूप से’ नारी-संबंधी निष्क्रियता (female passivity) है। (फ़िल्मों में) नारियों का होना मुख्य पुरुष पात्र के लिए एक कामुक वस्तु का होना भर है जिससे कि पुरुष दर्शक खुद को जोड़ सकें। अर्थात, पुरुष दर्शक वस्तु-समान नारी पात्र को पुरुष पात्र की आँखों से देखता है। यहाँ पर एक साथ वो खुद को पुरुष पात्र से जोड़ता भी है, और नारी शरीर को एक वस्तु की तरह देखता भी है। जबकि, सिनेमा महज़ फंतासी ही नहीं है: ये हमारे समाजिक संबंधों और परिस्थितियों की उपज है। भारती नारी शरीर के इसी स्टीरियोटाइप और उसके प्रस्तुतीकरण पर चोट करते हैं।

सिनेमा देखने वालों पर बात करते हुए भारती कभी भी दर्शक की भावनाओं (या उसके प्रदर्शन को) ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहकर चरित्र-चित्रण नहीं करते। दर्शकों के फ़िल्म देखने की इस प्रक्रिया को वो ‘जीवंत दर्शक’ कहते हैं जो कि फ़िल्म में डूब, या खो, जाता है। देखने वालों का इस पूरे उपक्रम में एक भावनात्मक जुड़ाव भी होता है। दर्शक, जो जानते हैं कि ये कल्पना है, अपनी भावनाओं का प्रदर्शन ऐसे करते हैं मानो वो वास्तविकता हो। एक फ़िल्म के, जो कि अपने आप में सबसे ज्यादा सार्वजनिक गतिविधि है, कई तरह के दर्शक होते हैं। दर्शकों के विविध रूप होते हैं और वो एक ही फ़िल्म को अलग-अलग तरह से देखते-समझते हैं जो कि बिल्कुल विरोधाभाषी हो सकते हैं।

जब मुखर्जीनगर में रहने वाले युवा छात्र, जो कि अलग-अलग राज्यों से आकर वहाँ रहते हैं, बत्रा सिनेमा पर एक फ़िल्म देखने जाते हैं तो वो एक तरह के अनुष्ठान में भाग लेते प्रतीत होते हैं। यहाँ दर्शक न सिर्फ दर्शक होता है बल्कि वो फ़िल्म का एक हिस्सा बन जाता है। लेखक लिखता है कि युवाओं की यह भीड़ मुख्यतः मनोरंजन के लिए ही यहाँ आती है। इनकी नज़र सामूहिक होती है। यूँ तो ये युवा हर समाजिक और आर्थिक वर्ग से जुड़े होते हैं, और टिकटों के मूल्य में भी भेदभाव का शिकार होते हैं, पर फ़िल्म को ये सब एक ही तरह के भावनात्मक अनुभव के साथ देखते हैं।

सिनेमा हॉल जैसे आम सार्वजनिक स्थान में समाज के विभिन्न स्तरों के लोगों के व्यवहार और रंग-ढंग में बदलाव में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ होता है, जिसपर लेखक ने उनके अपने ‘स्टेटस’ से चिपके रहकर अपनी नैसर्गिक भावनाओं को दबाने पर मजबूर होने को लेकर बख़ूबी कटाक्ष किया है। एक-रूप आधुनिकता (homogeneous modernity) का विचार स्वयं ही सवालों के दायरे में आता है। सिनेमा हॉल एक ऐसी जगह है जहाँ अर्थों को एक निरंतर प्रक्रिया में चुना, विकृत और पुनर्जीवित किया जाता है; यह सिविल सोसाइटी का एक ऐसा घटक है जो सामाजिक अर्थों और आनंदों का एक दायरा है, जिसमें हर तरह के लोग इस वैश्वीकृत, संकरित रिक्त स्थान में, चाहे वो अभिजात्य हों या गैर-अभिजात्य, शहरी हों या गैर-शहरी, महानगरीय हों या गँवई, आसानी से मिलते-जुलते हैं।

लेखक अनजाने में अलग-अलग सार्वजनिक स्थान, स्थितियों में लोगों के भेदभावपूर्ण और विवादास्पद स्थिति को इंगित करता है, “इस देश का दुर्भाग्य यही है कि सेंसिबल लोग रात का शो देखते हैं और भरी दोपहरी में कुछ लोग भरे बाज़ार में एक नवयुवक को इतना मारते हैं कि वो मर जाता है। क़सूर यही कि वो अरूणाचल का था, बाल अलग रंग से रंगे हुए था और आम जनता ने उसका मज़ाक उड़ाया था।” संभ्रांत, शिक्षित और अभिजात्य वर्ग की यही उदासीनता इस समाज के ताने-बाने को कमज़ोर करती है।

हिन्दी सिनेमा में बार-बार आने वाले स्टीरियोटिपिकल दृश्यों पर छोटे, किंतु तीक्ष्ण अवलोकन रखते हुए लेखक ने हिंदी फिल्मों में परिस्थितियों, घटनाओं, कल्पनाओं की कमी पर आलोचना की है जो उनमें बेहतर विषयों में कमी की ओर भी संकेत करता है। ऐसे ही छोटे-छोटे अनुभवों को ‘हिन्दी फ़िल्मों में ऐसा ही क्यों होता है’ अध्याय में शृंखलाबद्ध करते हुए लेखक ने हिन्दी फ़िल्मों में एक ही तरह के दृश्यों, कहानियों, विचारों की तरफ इशारा किया है जिसमें ‘गरीब प्रेमी-अमीर प्रेमिका का ससुर’, ‘ऊँचे आदर्शों वाले डाकू’ जो औरतों पर हाथ नहीं उठाते, ग़रीबों की मदद करते हैं आदि का ज़िक्र है।

फ़िल्मों में एक ज़मीन से उठे हुए हीरो का निर्माण होता है जो कि सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों के समाधान हेतु एक एजेंट बनकर निकलता है। ऐसे दोहराए जाने वाले विषयों में नायकों को अपने ही उच्च नैतिक मूल्यों के कारण सिस्टम, समाज, और कानून से लेकर अपने ही परिवार द्वारा भी पीड़ित होता दिखाया जाता है। हलाँकि उसका कानून की पहुँच से दूर होना भी गलत नहीं दिखता क्योंकि उसका वहाँ होना भी एक मजबूरी बताई जाती है। ऐसे विपत्ति के क्षणों का पूरा दृश्य किसी नारी चरित्र के इर्द-गिर्द घूमता नज़र आता है जहाँ उसकी कमज़ोरी, बलात्कार, या अपने पिता से किसी बात को लेकर झगड़ा आदि को आधार बनाया जाता है। यहाँ पर नायक का कार्य नायिका की रक्षा और उसका बचाव है। इस तरह से दर्शक किसी भी ऐसी फ़िल्म को पहली बार नहीं देख रहा होता क्योंकि वो इन्हीं दृश्यों को पहले भी कई बार देख चुका होता है। बड़े-बड़े स्टारों से फ़िल्मों की कमाई सीधी तौर पर जुड़ी होती है जिस कारण से फ़िल्मों को बेचने का तरीक़ा महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी भी फ़िल्म में किसी स्टार का होना उसकी कमाई और दर्शकों को हॉल तक लाना सुनिश्चित करता है।

संरचनात्मक विवरण (structural narratology) में, कई छोटी बातचीत के माध्यम से, बुद्ध को एक माध्यम या सहायक के तौर पर लाया गया है। इनमें मुख्य पात्र, आनंद, के समक्ष आई कई समस्याओं को बुद्ध सुलझाते नज़र आते हैं। बुद्ध की छवि को इन जगहों पर लाने से पारस्परिक मतांतर का सामाजिक संदर्भ निकल कर आत है जो ऐसी बातचीत का मुख्य हिस्सा है। बुद्ध इन लौकिक और अस्थायी संबंधों की आंतरिक जुड़ाव को कलात्मक बनाते हैं। स्थान और समय अपने तरलता के भाव के कारण जुड़ते दिखते हैं जब क्रोनोटोप्स (यक्ष, युधिष्ठिर आदि) के माध्यम से स्थानीय परिस्थितियों से जन्मी चिंताओं का आपसी मिलाप होता दिखता है।

एक स्थिर, सुसंगत प्लॉट का अभाव, नैरेटिव की खंडित प्रकृति जहाँ किसी भी तरह का रैखिक, ‘कारण और उसका प्रभाव’ सदृश प्लॉट नहीं दिखते, कई पौराणिक/धार्मिक कहानियों को नए तरीक़े से कहना और साथ ही चित्रों का सहारा लेना इसे एक उत्तर-आधुनिकतावादी विवरण (Postmodern narratology) बनाता है। उदाहरण के तौर पर, तरह-तरह के नामों वाली बीटेक जैसी तकनीकी शिक्षा की डिग्रियों के ऊपर युधिष्ठिर और यक्ष के प्रश्नोत्तरों के माध्यम से कटाक्ष किया गया है जहाँ ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनका कोई सही उत्तर नहीं दिखता। उच्च शिक्षा के बाज़ारीकरण और ऐसी डिग्रियों के बावजूद रोजगार के अवसरों के अभाव पर युधिष्ठिर को अपने भाइयों को मरा छोड़कर जाते दिखाना इस शिक्षा व्यवस्था पर ज़रूरी और कठिन सवाल पूछता है। ऐसी डिग्रियों की अनुपयोगिता को, जो कि आपको कहीं का नहीं छोड़ते, साथ ही उन्हें पाने के पीछे की जद्दोजहद को लेखक ने अपरिभाषित छोड़ दिया है।

युवकों की कल्चरल एन्जाइटी तब प्रबल होती दिखती है जब वो किसी युवती के दायरे में प्रवेश पाना चाहता है। ऐसे युवकों की युवतियों को लेकर दिखाई गई इस तरह की चिंता को बहुत ही नाज़ुक से दर्शाया गया है। सेक्स को लेकर एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या रखने वाले युवकों के स्टीरियोटाइप का भी हल्के-फुल्के शब्दों में मजाक उड़ाया गया है।

भौतिकवादी चुनावों का ओवरलैप निजी संबंधों के विकास में बाधा बनता है क्योंकि वहाँ एक दूसरे के लिए समय और जगह बनाने को, अन्य भौतिक चीज़ों पर प्राथमिकता नहीं मिलती। यहाँ प्रेम ने फर्जी वादे, गले मिलने, उपहार, चॉकलेट और टेडी बेयर आदि के आदान-प्रदान की स्थिति में ही फलने-फूलने की निराशाजनक सीमा देखी है।

बातचीत की एक अनौपचारिक शैली में, लेखक समकालीन सामाजिक जीवन, राजनीतिक परिदृश्य, बेरोजगारी की गंभीर समस्या, युवाओं के बीच लक्ष्यहीनता, टूटे रिश्ते और इससे उत्पन्न होने वाली पीड़ा आदि की समस्याओं की तरफ ध्यान खींचता है। यह पुस्तक कहीं भी चुप्पी साधे नहीं दिखती, न ही सुझाव देती है, बल्कि उसके उलट लगातार बोलती हुई, और सबकुछ बोलती हुई, ये एक आवाज़ बन जाती है। गिरते सामाजिक मूल्यों को लेकर लेखक एक चिंता जताता है, युवाओं से कई सवाल हैं उनके तथाकथित लक्ष्यों की प्राप्ति और उसकी प्रक्रिया को लेकर। ऐसे भागदौड़ वाले समय में स्थिरता को दोबारा खोज निकालने की ज़रूरत है क्योंकि मानवीय मूल्यों और आदर्शों की बाज़ी लगी हुई है। एक उपभोक्तावादी, वैश्वीकृत समाज में जहाँ मध्यम वर्ग अपने आप को संकेतों, ब्रांडों, स्टीरियोटाइप आदि का शिकार बनाता है, वहाँ वस्तुओं और संबंधों के अनुसरण की अर्थहीनता की दुविधा में खो जाने के प्रति एक अंतर्निहित चिंता और डर भी है।

उन युवाओं के लिए जो महानगरीय शहरों में एक उज्ज्वल कैरियर के लिए प्रयास कर रहे हैं, घर पर रहने की प्रबल इच्छा कभी दूर नहीं होती। वो अपने अंदर उस घर से दूर होने की बेचैनी, अपने गाँव में होने की इच्छा में घुटते हैं जहाँ माँ है, जो कि परम्पराओं, पारिवारिक मूल्यों और प्रेम की स्थिर भावना का प्रतीक है। अपने घर-परिवार को लेकर इस परेशानी में विस्थापन एक चुनाव की जगह मजबूरी के तौर पर दिखता है। यहाँ ‘घर’ उस संकेत-तंत्र का प्रतीक है जो कि महानगरों में रहने वाले, नब्बे के दशक में बढ़ते बच्चों के लिए अनुपलब्ध है। साथ ही, घरेलू अनुष्ठानों, त्योहारों, परम्पराओं का विस्तृत विश्लेषण आधुनिक युवाओं पर उनके सतत प्रभाव को दर्शाता है कि उन्हें इन परम्पराओं को महज़ निभाना भर नहीं है, बल्कि उन्हें अगली पीढ़ी तक के लिए एक मर्यादित तरीक़े से पहुँचाना भी है।

साथ ही साथ, लेखक ने महानगरों में पूजन, उपवास आदि की पद्धति के बाज़ारीकरण पर आधुनिकता के प्रभाव पर की बात भी की है कि किस तरह सांस्कृतिक परम्पराओं को निर्वहन के बोझ को ढोती नवयुवतियाँ एक तरह से उन्हें दिखावा और मजाक भर बनाकर छोड़ देती हैं।

लोकप्रिय साहित्य की श्रेणी में होने के बावजूद यह किताब व्यवहारिक और भावनात्मक समस्याओं पर बात करती है। लोकप्रिय साहित्य के बारे में ऐसा कहा जाता है कि उसकी विशेषता यही होती है कि उसमें किसी भी तरह के वैचारिक तत्व, या बौद्धिक सूचना का अभाव होता है, फिर भी, ‘बकर पुराण’ के अंतिम अध्याय में बुद्ध कहते हैं, “कलिकाल में पोर्नोग्राफ़ी को यथार्थवादी सिनेमा, गालीगलौज को संगीत, और अश्लील और कामोत्तेजक बातों को साहित्य मान लिया जाएगा। धीरे-धीरे समाज विनाश की ओर बढ़ता जाएगा और एक समय के बाद कालचक्र के घूमने से अच्छे साहित्य की रचना फिर से होगी।”

यह वो पुस्तक है जो अपनी अर्थपूर्ण अन्यथाकथन (meaningful misrepresentations) के कारण पढ़ी जाएगी; या यूँ कहें कि इसे एक सामाजिक दस्तावेज के रूप पढ़ा जाएगा जो सांस्कृतिक संदर्भों के भीतर है, जिसके परिणामस्वरूप एक सामाजिक ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे आम आदमी एक जुड़ाव महसूस करता है। दूसरे कई व्यंग्यकारों से कहीं अलग, लेखक का मानवीय संवेदना से जुड़ा होना इस पाठ (किताब) को पठनीय और स्मरणीय बनाता है जहाँ व्यंग्यकार वृहद् समाज से दूर नहीं बल्कि उसी का हिस्सा है और जिसका व्यक्तित्व लक्षणालंकारिक (metonymic) है।


Reference:
Nair Bindu “Female bodies and the male gaze: Laura Mulvey and Hindi Cinema”, in Jasbir Jain and Sudha Rai eds, Films and Feminism,pp.52-58, Jaipur 2002.
Nayar K Pramod, “ Reading Culture Theory, Praxis, Politics Sage Publications New Delhi 2006.
Nayar K Pramod, “Literary Theory Today” Prestige Books, New Delhi 2011.

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