बंगाल चुनावी हिंसा: रवीश जी ने नाक में काग़ज़ की सीक डालकर छींका, किया इज़ इक्वल टू

(आर्टिकल का विडियो यहाँ देखें)

आज मैंने तय किया था कि रवीश जी पर कुछ नहीं लिखूँगा। लेकिन जब उनका लिखा पढ़ लिया तो सोचा दो पैराग्राफ़ तो बनता है। जो लोग रवीश कुमार को जानते हैं, और लगातार पढ़ते हैं, उनको उस आर्टिकल में क्या करने की कोशिश हुई है, ये पता चल गया होगा। अमूमन, भाजपा शासित प्रदेशों में किसी भी तरह की चुनावी, राजनैतिक, ‘भतीजे के भाई के जीजा का बहनोई भाजपा से ताल्लुक़ रखता था’ आदि प्रकार की हिंसा होती है तो तमराज किलविस एनडीटीवी के सेटेलाइट अपलिंक वाली छतरी पर बैठकर लम्बे नाख़ून चलाने लगता है।

सपा, वामपंथी, कॉन्ग्रेस शासित प्रदेशों में दंगा हो तो भी भाजपा ज़िम्मेदार हो जाती है क्योंकि भाजपा ने ‘भय का माहौल’ बनाया है, और उसके समर्थक हिंसक होते जा रहे हैं क्योंकि उनको लगता है कि उनके फूफा प्रधानमंत्री के राइट हैंड हो गए हैं। भाजपा शासित प्रदेश में कोई हिंसा का शिकार हुआ तो उसे प्रदेश सरकार और पुलिस की असफलता माना जाता है। 

रवीश जी एक टर्म इस्तेमाल करते हुए ‘हें हें हें’ किया करते थे प्राइम टाइम डिबेटों में: ‘इज़ इक्वल टू हो गया।’ कहने का मतलब ये था कि भाजपा वाले अगर ये कहते थे कि ‘कॉन्ग्रेस वाले भी यही करते हैं, उनकी सरकारों में भी यही होता है’, तो रवीश जी ये लाइन लेते थे कि विपक्ष के ग़लत होने पर सत्ता की ग़लती सही नहीं कही जाएगी, दोनों ही ग़लत हैं, और पहले को दूसरे के जस्टिफिकेशन के रूप में नहीं रखा जा सकता। 

फिर बंगाल में बर्धमान में दंगे हुए, धूलागढ़ में दंगे हुए, दुर्गा पूजा के समय पंडालों पर मुसलमानों ने पत्थरबाज़ी की। इसी साल रामनवमी में लोगों ने दंगे किए और पाँच लोग बंगाल में मरे। उसी समय बिहार में भी छिटपुट झड़पें हुईं जिसमें मारपीट की वारदातें हुईं (कोई मरा नहीं) तो रवीश जी ने प्राइम टाइम और लेखों की झड़ी लगाकर बिहारियों को चिट्ठी लिख दी। जबकि पाँच लोगों की मौत वालें दंगे पर एक शब्द नहीं निकला। 

आज जब बंगाल के पंचायत चुनावों में हिंसक वारदातें हुईं और 13 लोग मारे गए, तथा तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद डेरेक ओब्रायन ने इसे ‘नॉर्मल’ बताया है क्योंकि नब्बे के दशक में 400 मरा करते थे, तो रवीश जी ने नाक में पन्ने की सीक बनाकर डाला और छींका है। जी, जो लिखा है, जैसे लिखा है उसको छींक ही कहा जा सकता है क्योंकि उसकी इंटेंसिटी और इम्पैक्ट छींक जितनी ही है। साथ ही, छींकने के बाद रवीश जी ने खानापूर्ति करके जो संतुष्टि पाई होगी वो छींक के बाद वाली ही है।

जो आदमी भाजपा नेताओं की रैली की स्पीच की समीक्षा (बाक़ियों की नहीं) लगभग हर साँस के साथ उतार-चढ़ाव के साथ करता रहा हो, और नेहरू की किताबों और पत्रों के स्कैन दिखाता रहा हो, उसने बंगाल में इस हिंसा की पृष्ठभूमि पर कुछ नहीं कहा। और तो और, पहले पैराग्राफ़ में इन मौतों का लगभग मजाक उड़ाते हुए ये लिखा है कि आमतौर पर हिंसा दोपहर से शुरु होती थी लेकिन आज सुबह ही हो गई! मने कह रहे हैं कि दोपहर में होती तो ठीक रहती, सुबह-सुबह उठकर कोई मरने थोड़े जाता है, दोपहर में आदमी सेंस में रहता है कि वोट देने जा रहे हैं, तृणमूल वाले गोली भी मार सकते हैं! है कि नहीं! 

पिछले छः-सात सालों में तृणमूल ने जिस हिंसा का सहारा लिया और मुसलमान बहुल इलाकों के दंगों को जिस अनकही मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के तहत दबाया, उसमें रवीश जी और उनके जैसों का गिरोह भी शामिल है। उस दिन वो कृषि दर्शन बनकर पता नहीं कौन-सा शो कर रहे होते थे। जो आदमी रैली के जुमलेबाज़ियों पर प्राइमटाइम डेडिकेट कर देता हो, फ़ेसबुक पर दिमाग में चिप चिपकाकर सोच को शब्द में कन्वर्ट करने की स्पीड से पोस्ट डालने का काम करता हो, उसको 13 लोगों की मौत जैसे मुद्दे पर प्रदेश सरकार को घेरने के लिए रामनवमी का ज़िक्र करना पड़ गया! 

जिस रामनवमी में दंगे हुए, उस वक्त प्रदेश सरकार और पुलिस को असफल नहीं बता पाए थे क्योंकि बिहार में भाजपा समर्थित सरकार थी, तो ‘मालिक का ख़ून ड्राइवर का पसीना, चलती है सड़क पर बनकर हसीना’ वाले अंदाज में छिटपुट हिंसा को ‘बिहार जल रहा है’ करके दिखाया गया था। सवाल तब भी उठाया था मैंने कि पाँच मौतें ज़्यादा हिंसक हैं, या फिर रामनवमी के दौरान बिहार में दो-तीन ज़िलों में दुर्गा जी की मूर्ति पर चप्पल फेंककर झगड़ा करना? 

जवाब नहीं आया था, क्योंकि उनके खुले पत्रों की ही तरह मेरे भी पत्र कहीं पहुँचते नहीं। वो भी गले फाड़कर सीधा मोदी को घेर लेते हैं, हम भी उनको घेर लेते हैं। फिर हमको रवीश भक्त घेर लेते हैं। उनको हमारे भक्त घेर लेते हैं। ये एक स्पाइरल है जो घूमता रहता है। 

आज जो रवीश जी ने लिखा है वो उन हजारों ट्रोलों के उत्पात से बचने का उपक्रम है जो बहुत ही नीचा गिरकर गरियाते हैं। इन ट्रोलों के पक्ष में मैं नहीं हूँ, पर उनके सवाल सही होते हैं। वो हर बार उनसे पूछते हैं कि एक तरह के मुद्दे पर, भाजपा शासित प्रदेश में होने पर, उनका हमला होता है, और दूसरे प्रदेशों/विचारधाराओं की बात आते ही वो मुखर से मौन हो जाते हैं। इसको ट्रोलों की भाषा में दोगलापन कहते हैं। 

मुझे ये जानना है कि अगर रामनवमी में भी कुछ लोग तलवार लेकर सड़कों पर आ जाते हैं तो तंत्र की असफलता का ज़िम्मा किसका है? मोदी का? फिर क्या ज़रूरत पड़ी कि आज के चुनावों में बूथ पर हुई हिंसा पर आपको रामनवमी की याद आ गई? पूरे आर्टिकल में प्रदेश की मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं लिया गया है। उस सांसद का नाम नहीं लिया गया है जिसने इस हिंसा के आँकड़े को सामान्य बताया है। क्यों? ट्रेन में बिकते जनरल नॉलेज की किताब में ‘कौन सी चिड़िया उड़ते हुए अंडे देती है’ के बाद वाले पन्ने पर ‘राज्य और मुख्यमंत्री’ वाले हिस्से में बंगाल की ममता का नाम नहीं छपा है क्या? 

‘ज़िम्मेदारी तृणमूल की है’ यह बताकर यह भी जोड़ दिया गया है कि जवाबदेही तो भाजपा और कम्यूनिस्टों की भी है! ‘भाजपा कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या हुई’ के साथ ‘तृणमूल कार्यकर्ता की हत्या’ भी लिख दी गई है। बस ये बताना भूल गए कि कौन आदमी कौन जात था, कौन धर्म का था। ये बताना भूल गए कि किस पार्टी के कितने कार्यकर्ताओं ने दूसरे पार्टी के लोगों की हत्या की। ‘भाजपा का भी मरा, तृणमूल का भी मरा’ एक ही लाइन में लिखना धूर्तता है और लोगों को भटकाने की बात है कि लगे दोनों के एक-एक मरे। 

जबकि ऐसा है नहीं। दंगों में ये कह देना कि ‘हिन्दुओं ने भी हिंसा की, मुसलमानों ने भी हिंसा की’ शातिर लोगों की पहचान है क्योंकि यहाँ वो इज़ इक्वल टू करने लगते हैं। इससे लगता है कि दोनों ही ज़िम्मेदार हैं, और दोनों को बराबर नुकसान हुआ है। जबकि हो सकता है रामनवमी में मरने वाले चार हिन्दू थे, एक मुसलमान! हो सकता है कि धूलागढ़ में जलने वाले घरों के लोग हिन्दू थे, जलाने वाले मुसलमान। हो सकता है कि बर्धमान की सड़कों पर ट्रॉलियों में मशाल, रॉड और तलवार लेकर सड़कों पर घूमने वाली भीड़ मुसलमान लड़कों की थी। हो सकता है कि जयपुर पुलिस स्टेशन को घेरकर कानून व्यवस्था को बंधक बनाने वाली भीड़ मुसलमानों की थी। 

लेकिन चालाक पत्रकार एक लाइन लिखकर सब पवित्तर कर देता है। वो अपनी ज़िम्मेदारी निभा लेता है।वो इतनी बार, इतने बुरे तरीक़े से सवालों के बीच में अपने दोहरे मापदंडों के आईने के सामने खड़ा कर दिया जाता है कि उसको एक समय के बाद खानापूर्ति करनी ही होती है। ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई बार यही पत्रकारों का गिरोह पहले मोदी से बयान माँगता है, फिर जब वो बयान देता है तो कहता है कि सिर्फ कड़ी निंदा से क्या होगा, ये क्यों नहीं बोला, ऐसे क्यों नहीं बोला…

तो मुझे भी आज के स्वघोषित मसीहाई की तासीर रखने वाले पत्रकार श्री रवीश कुमार से पूछना है कि ये जो छींक मारी है नाक में काग़ज़ डालकर, वो किस लिए? किससे डर गए? मोदी के ट्रोलों से? या फिर आपके ज़मीर ने धिक्कारना शुरु कर दिया और ‘मालिक की जिंदगी बिस्कुट और केक पर, ड्राइवर की ज़िंदगी एक्सलेरेटर और ब्रेक पर’ का अनुसरण करते हुए आपने नाम छुपा लिए? मोदी की तो बीवी, माँ और पता नहीं किस-किस का नाम ले आते हैं। आज ‘पान खाए सैंया हमार’ काहे हो गया? 

रवीश ब्रो, पान तो खा लिया है आपने लेकिन ‘मलमल के कुर्ते पे छींट लाल-लाल’ भी दिख रहा है। लाल माने ख़ून, और ख़ून का जात-धरम तो बस आप ही देख पाते हैं। हें हें हें…

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