बीएचयू में छेड़छाड़: हर वो लड़की जो आपकी कोई नहीं है, आपकी सगी है

नमस्कार!
मैं दिल्ली का पत्रकार।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में क्या हुआ, मुझे पता नहीं। क्योंकि पत्रकारों को बहुत ज्यादा पता होने पर या तो मार दिया जाता है, या वो खुद ही एक्सोटॉर्शन में व्यस्त हो जाते हैं। जितना पता है वो ये है कि किसी लड़की के साथ, बीएचयू कैम्पस में छेड़छाड़ (या शायद ज्यादा ही) हुआ।

मैं सोचता हूँ, जो कि नायाब बात है कि एक पत्रकार सोचता भी है आज के दौर में, कि काश! बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय दिल्ली में होता तो कितना अच्छा होता!

सारी लड़कियाँ दिल्ली में होतीं, और बड़े घरों की बेटियाँ होतीं तो कितना अच्छा होता! इन्हें बेवजह छूने, छेड़ने पर दिल्ली की मीडिया कितना बवाल काट सकती! कितने कैंडल खप जाते और मेक इन इंडिया भी चल पड़ता! प्रोफाइलें काली हो जातीं, युवाओं का जोश उफान पर आता और देश को युवा शक्ति का पता तुरंत चल जाता।

काश! कि बीएचयू की वो लड़की हनीप्रीत होती फिर हमें सब कुछ सूत्रों के हवाले से पता चलता रहता कि वो लड़की आखिर है कहाँ, क्या कर रही है, क्या रही होती, क्या कर रही होगी? ये तब भी पता होता जब वो कहाँ है ये भी किसी को पता नहीं होता! काश कि वो लड़की मेरी बहन होती, फिर मैं दुःखी होता और समाज में आग लगाने को तत्पर हो जाता! काश कि वो आप सबकी बहन होती!

मैं जो ये कह रहा हूँ, मैं जो ये कर रहा हूँ, आप जो ये सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं, इसे मैं बेहतरीन शब्दों में सजाकर आपकी संवेदनाओं को दूह सकता हूँ। मैं वैसी-वैसी संवेदनशील बातें कह दूँगा कि आप अपने अस्तित्व को लेकर सवाल पूछने लगेंगे कि आप हैं ही क्यों? यही सवाल आपसे हर पत्रकार शाम में पूछता है, हर व्हाट्सएप्प का फ़ॉर्वर्ड पूछता है, और आप उद्विग्न हो जाते हैं! लेकिन सवाल ये नहीं है कि शब्दों से संवेदनाओं का व्यापार हो जाय। सवाल ये है कि आप जानकर भी चुप क्यों रहते हैं?

मैं इस पर लिख और बोलकर थका नहीं हूँ। ये चलता रहेगा। ये तब तक चलेगा जब तक कि आपका गूँगापन आपकी बहनों के बलात्कार होने का इंतज़ार न करे। आपको बीएचयू का छात्र न होना पड़े ये लिखने के लिए कि क्या हो रहा है। आपको उसमें उस इलाके के सांसद, और विधायक का नाम न ढूँढना पड़े कि आप संवंदवनशील बनें कि राजनीति करें इस विषय पर।

ये तब तक लिखूँगा, और बोलूँगा जब तक कि हर हॉस्टल, सोसाइटी, समाज, सड़क और घर की लड़कियाँ अपने अधिकारों को लेकर, अपनी सुरक्षा की माँग के साथ लंका की तरफ मार्च करती न निकले। ये तब तक लिखूँगा जब तक समाज वैसा न हो जाए कि आपकी बहन को सात बजे के बाद घर लौटने पर पाबंदी न हो, हॉस्टलों में ताले न लगे मिलें।

इसीलिए, आपको भी लिखना होगा, बोलना होगा। हर वो लड़की जो आपकी कोई नहीं है, वो आपकी सगी है क्योंकि इन्हीं के नाम पर आप रोहिंग्या को घुसने से रोकते हैं, इन्हीं की दलीलें सुनाकर आप सरकारें पलट देते हैं, इन्हीं की चर्चा करके आप अंतरराष्ट्रीय ख्याति पा जाते हैं।

हर लड़की मेरी सगी है। और हर ऐसी घटना पर आपका रिएक्शन तो होना ही चाहिए। और ये रिएक्शन धर्म, जाति, जगह, सत्ताधीशों को देखकर नहीं, बल्कि आपकी अंतरात्मा से स्वतः आनी चाहिए। अपने आपको वैसा बनाइए, नहीं बनेंगे तो गारंटी नहीं है कि आपके अकेले होने पर आपके साथ कोई और होगा।

दिल्ली देश की राजधानी है। दिल्ली में देश की बात होनी चाहिए। देश, दिल्ली की राजधानी नहीं है, और देश में दिल्ली की ही बात नहीं होनी चाहिए। लंका जाती लड़कियों को मेरा प्रणाम। मैं तुम सबके साथ हूँ। तुम्हारी वेदना का पूर्ण अहसास मुझे न हो, पर मैं उसे समझने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं हमेशा तुम्हारे पक्ष में खड़ा रहूँगा।

नमस्कार!

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