बिहिया कांड: काश कि वो किसी हिजड़ों की बस्ती से निकलती, वो बचा ली जाती

 

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बिहार निराश नहीं करता। विष्णुगुप्त के ब्रिलिएंस से लेकर बिहिया की बेहयाई तक वो आपको अपने इतने रंग दिखाता है कि लगने लगता है कि हमारा पूरा इतिहास एक झूठ की बिना पर टिका हुआ है। अगर जीन जैसी कोई चीज होती है जो कि पूर्वजों से नीचे तक आती है तो मुझे लगता है कि हजार साल पहले ज़रूर कोई उल्कापात हुआ होगा जिसने बिहारियों की नस्ल को गायब कर दिया। ये जो हो रहा है वो चाणक्य, चंद्रगुप्त, अशोक, नालंदा, विक्रमशिला वालों के रहते तो संभव नहीं है। आधा प्रतिशत भी जीन पहुँचा हो, तो भी कोई ये कैसे सह लेता है? 

शर्मिंदगी भी कितनी बार होगी? लगता है शर्मिंदा करने की होड़ लगी हुई है कि कौन कितनी बार किसको शर्मिंदा कर सकता है। मैं ये भी मानता हूँ कि जब मैं ये बात आपसे कर रहा हूँ तो आप इन बातों के श्रोता नहीं हैं, क्योंकि आपके सामने ऐसा कुछ भी होता तो आप ये नहीं होने देते। ये तथाकथित मर्दों के बीच, बीच सड़क पर हुआ और एक भीड़ देखती रही जो भी होता रहा। हम आराम से ‘हिजड़ों’ के नाम कर देते हैं ऐसी क्रूर अकर्मण्यता! लेकिन किन्नर समाज की संवेदना को जहाँ तक मैं जानता हूँ, उनकी गली में ऐसा होना असंभव है। 

हम अब भीड़ भी नहीं रहे। हम न तो समूह हैं, न ही किसी तरह की संगठित भीड़। हम ऐसे अकेले लोगों की टोली हैं जो पड़ोसन को नंगा देखने की ताक में रहता है। और उसका पति भी इसी ताक में रहता है कब मेरी बीवी, माँ, बहन या बेटी सड़क पर नंगी कर दी जाए। ये एक सत्य है। संभवतः, अकेले लोगों की ऐसी भीड़ जिसमें नैतिकता अपने घर तक के लिए नहीं। वरना हर लड़की जिससे मैं मिला हूँ वो अपने बचपन से लेकर जवानी तक के बीस-तीस सालों में आठ दस जानकारों के घटिया स्पर्श और बलात्कार की कहानी दिल में बंद किए न रहती। 

ये लड़की वस्त्रहीन ज़रूर है, लेकिन नंगी नहीं। नंगा तो हर वो व्यक्ति है जो इस जुलूस का हिस्सा है। क्या अपराध रहा होगा उसका? किसी की हत्या कर दी? वेश्या थी? चोरनी थी? डायन थी? कुलच्छिनी थी? ऐसा क्या कर सकती है एक लड़की कि दस लड़के उसके कपड़े उतारकर जुलूस के सामने रखकर हँसते हुए चल रहे हैं? किसी बलात्कारी को तो नंगा करके उसका जुलूस आजतक नहीं निकाला गया, जो कि बिलकुल सटीक होता। 

बुद्ध और महावीर की धरती पर एक लड़की को वस्त्रहीन करके नंगा समाज हँसता हुआ पीछे चल लेता है। फिर कोई बिहारी को गाली बना दे, भारतीय को थर्ड वर्ल्ड कंट्री बोल दे तो क्या अतिशयोक्ति हो जाएगी? 

इसको किस नज़रिए से देखूँ? राजनैतिक से कि राजद के किसी नेता का नाम है तो लालू-तेज-तेजस्वी को गरिया लें? या फिर दूसरे पाले में जाकर नितिश को कोस लें कि उसके राज्य की कानून व्यवस्था कैसी है कि ये सब हो रहा है? या मोदी को गरिया लें कि वो क्या कर रहा है ऐसे पार्टनर के साथ? लोग तो फ़ौरन पाले तलाश लेते हैं, और फिर उसी हिसाब से तर्क तैयार हो जाते हैं। आपके पास शब्द हों तो आप किसी भी बात को सही या गलत ठहरा सकते हैं। एक ही बात पर आप मोदी की वाहवाही भी कर सकते हैं, और गरिया भी सकते हैं। 

और हाँ, जो लोग ऐसा करते हैं, उनकी प्रतिबद्धता कहाँ है ये भी जान लीजिए। उनकी प्रतिबद्धता न तो समाज से है, न स्त्री अस्मिता के मुद्दे से, न कानून व्यवस्था से, और न ही किसी बदलाव से। ये वो लोग हैं जो किसी भी मुद्दे से जुड़े निष्ठावान लोग नहीं हैं। ये असल में उसी भीड़ का हिस्सा हैं जो पीछे चल रही है। इनकी शक्लों को गौर से देखने पर लाल शर्ट वाले लड़के का चेहरा आप देख लेंगे। ये लोग वही हैं जो ये सोचते हैं कि लड़की की तस्वीर क्यों है, विडियो क्यों नहीं। आपको लगेगा कि मैं ज़्यादा बोल रहा हूँ, लेकिन ऐसा विचारकों को पढ़कर, जानकर, समझकर मैं ये कह सकता हूँ कि अगर समय में पीछे जाने की सुविधा होती तो ये आपको ये कहकर उसी भीड़ में चले जाते की वो ग्राउंड रिपोर्टिंग करने जा रहे हैं। 

कितने बोझ ले लेंगे आप इन अकेले लोगों का? इन लोगों का जो सामाजिक कोढ़ में सबसबाते कीड़े हैं, ये उसी सड़ाँध का हिस्सा भी हैं, और वहीं स्थापित हो चुके हैं। ये हमारे आपके बीच के वो लड़के हैं, वो मर्द हैं, जो चौक-चौराहे पर फब्तियाँ कसते हैं, और हँसते हैं। आप भी साथ में हँस लेते हैं। ये समाज वैसा हो गया है, क्योंकि इस समाज को हमने ऐसा होने दे दिया है। 

यही कारण है कि अपने आप में सिमटे इस समाज से ‘मदद’ शब्द का मतलब पेन ड्राइव में फ़ाइल शेयर करने भर रह गया है। यही कारण है कि हर दिन ये ख़बरें आती हैं जब कहीं रामपुर में चौदह लड़के किसी लड़की का दुपट्टा खींचते हैं, छेड़ते हैं, छूते हैं, बलात्कार करते हैं। यही कारण है कि दिल्ली की किसी व्यस्त सड़क पर कोई आवारा लड़का किसी लड़की की छाती में सत्रह बार छुरा मारता रहता है, और हमें वो विडियो मिलता है अपने ही किसी मित्र से। आख़िर अकर्मण्यता का ये कौन सा स्तर है कि मदद तो छोड़िए, कोई वहाँ विडियो बनाने लगता है! 

किस स्तर की संवेदनहीनता का दौर है यह कि कुतूहल ने सारे मानवीय मूल्यों को ढक लिया है! आख़िर हम ये कर कैसे पाते हैं कि किसी लड़की को वस्त्रहीन करके एक भीड़ चल रही है, और कोई विडियो बना रहा है? 

पुलिस ने पंद्रह लोगों को गिरफ़्तार कर लिया है। मैं इसमें कोई राजनीति नहीं देखता चाहे आरोपी राजद का हो या सरकार नितिश की हो। ये घटनाएँ सरकारों और पार्टियों से बहुत ज़्यादा मतलब नहीं रखतीं। ये घटनाएँ सामाजिक हैं, और वही रहेंगी। इस तरह की घटनाओं की जड़ में एक दर्शक समाज है जिसे लगता है कि जो हो रहा है वो किसी पर्दे पर हो रहा है, जिसे बदलने की न तो उसकी मंशा है, न ही क्षमता। 

फ़र्क़ यही है कि इसी ठहरे समय में किसी एक दिन इसी भीड़ के लाल शर्ट वाले लड़के की, या विडियो शेयर करने वाले व्यक्ति की, आपकी या हमारी कोई परिचित लड़की हो सकती है। इस पर मैं और किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हूँ। मैं एक व्यक्ति के स्तर पर ऐसे विषयों पर लिख भर सकता हूँ। ऐसे प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए बोल भर सरता हूँ। यही मेरा पेशा है, और योगदान भी इसी तरह से दे सकता हूँ। मैं चुप तो नहीं रह सकता। ऐसी बातों से कब तक अनभिज्ञ बना रहूँ, चुप रहूँ, जो हो रहा है उसे अंतिम मान लूँ? 

आप भी, जहाँ भी हैं, जो भी करते हैं, उसी के ज़रिए ऐसी घटनाओं पर अपना योगदान दीजिए। कुतूहलप्रिय समाज कब किसकी बेटी, बहन, पत्नी, माँ या दोस्त को लील जाएगा, कहा नहीं जा सकता। 

नमस्कार 

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