काला धन से कैशलेस इकॉनमी की तरफ… ये तो पहले नहीं बताया था!

नमस्कार,

ख़बरों में आज है डिमोनेटाइजेशन और कैशलेस इकॉनमी। इन दोनों ही चीज़ों के बारे में मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता। काँग्रेस वाले बहुत ज्यादा जानते हैं। लिहाज़ा उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल, चिदंबरम उतारे हैं और द हिन्दू के सम्पादकीय पन्नों में मनमोहन सिंह। सबका एक्के मक़सद है डीमोनेटाइज़ेशन पर सरकार को नोचना।

राहुल गाँधी कह रहे हैं कि वो बोले तो भूकम्प आ जाएगा। फाइन क्वालिटी वीड की बात ही अलग होती है। आदमी सर्रियलिस्ट बातें करने लगता है।

सरकार भी कहाँ से शुरू करते हुए कहाँ जा रही है ये पता नहीं चल रहा। या फिर उनके मंत्रियों को पूरी बात बोलकर जनता को समझाना पड़ेगा। उलूल-जुलूल बयान देकर कि निगम चुनाव में मोदी की जीत राष्ट्रीय स्तर पर डीमोनेटाइजेशन के बारे में समर्थन है और टाइम के पॉपुलर पोल में पर्सन ऑफ द ईयर बनना इंटरनेशनल समर्थन है।

जहाँ तक टाइम के पोल की बात है, तो वहाँ दो बातें हैं। पहली ये कि विदेशी पत्रिकाओं से सर्टिफ़िकेट लेना बंद कीजिए। उनके चुनने या ना चुनने से ना तो कोई महान होगा, ना ही खराब। और दूसरी बात ये भारत में ऐसे पोल पर वोट करने वाली जनता इतनी ज्यादा है कि कोई भी पोल करा लो, भारतीय आदमी जीत जाएगा।

खैर, जब पाँच सौ और हजार के नोट बंद हुए थे तो बात काले धन को सिस्टम में वापस लाने की थी। याद होगा कि जब स्विस बैंक की बात चलती थी तब विपक्ष ये कहता था कि जो काला धन देश में है उसका क्या। और अब वो ये कहते हैं कि जो विदेश में है उसका क्या। जहाँ तक विदेशों में पड़े काले धन की बात है तो चुपचाप कुछ सालों के लिए भूल जाइए।

वो बैंक हैं, उनकी इच्छा होगी तो वो सूचना देंगे। आपको संधियाँ करने में ही सालों लग जाएँगे। उसके बाद भी आपको सिर्फ नए खुलने वाले अकाऊँट की सूचना दी जाएगी। और अगर पुरानी की भी दी जाएगी, तब तक जिनका पैसा वहाँ है वो किसी ना किसी तरह से उसको किसी और जगह पर लगा चुके होंगे। जो इतना शातिर है वो रुपए बनाने से लेकर बचाने के रास्ते जानता है।

मैं अर्थशास्त्री नहीं हूँ। जो थे उनके काल में देश का अर्थशास्त्र बहुत गड़बड़ा गया था, ख़ासकर बैंकिंग। मैं आशावादी हूँ क्योंकि मुझे ना तो राजनीति की बहुत ज्यादा समझ है, ना ही ऑक्सफ़ोर्ड के अर्थशास्त्र की। ज़ाहिर है मैं रिज़र्व बैंक के गवर्नर, उनकी टीम के अर्थशास्त्रियों की बात पर विश्वास करूँगा।

हाँ, ये बात और है कि पूरी चर्चा काले धन से कैशलेस पर शिफ्ट हो गई है। लगभग अस्सी प्रतिशत पैसा जो घरों में पड़ा था, वो वापस बैंकों में पहुँच गया है। इससे क्या होगा, मुझे नहीं पता। लोन का ब्याज दर घटेगा, फिस्कल डेफिसिट घटेगा, सबके खाते में जुमले वाले पंद्रह लाख आएँगे… मुझे नहीं पता।

इस पूरे प्रक्रम में कैशलेस और डिजिटल पेमेन्ट की जो बात अब डिबेट में मंत्रीगण ठूँस रहे हैं, वो डीमोनेटाइजेशन का बाय-प्रोडक्ट है। जैसे कच्चे तेल से पेट्रोल निकाला जाता है, डीज़ल निकाला जाता है और साथ में वैसलीन वाली पेट्रोलियम जेली भी निकल आती है। तो इस पूरे व्यायाम का हिस्सा वज़न घटाना है, पसीना निकालना नहीं।

कैशलेस तो जनता होगी ही। उसकी जरूरत है लेकिन उतनी भी नहीं। अभी तो फोकस काला धन ही होना चाहिए। छापे मारो, और पैसा पकड़ो। सोना पकड़ो। बैंक मैनेजरों को पकड़ो जो फ़र्ज़ी अकाउँट में सौ-सौ करोड़ जमा कर रहे हैं। प्रॉपर्टी के दाम गिराओ। इतना पैसा सिस्टम में वापस आया तो रूपया-डॉलर का कुछ करो।

हम लोगों को जो बाग़ दिखाया गया था और कहा गया था कि उसमें बहार नहीं है लेकिन लाओगे, तो वो दिखाओ। बाग़ों में बैंच होना चाहिए, लाइट होना चाहिए ये सब मत करो। लोगों ने घरों में लैंडलाइन की जगह मोबाइल ख़ुद ही लगवाए, इसके लिए सरकार को ऐलान नहीं करना पड़ा।

धीरे धीरे इकॉनमी कैशलेस हो जाएगी। हाँ आपके इस दुःसाहस से ये तो फ़ायदा हो गया कि सबकुछ आँकड़ों के रूप में क़ैद है। सबकुछ नहीं भी तो बहुत कुछ तो है ही। अब यहाँ से हेराफेरी करने वाले थोड़ा ध्यान रखेंगे। और हाँ कालाधन पूरी तरह किसी भी सिस्टम से नहीं जा सकता। भ्रष्टाचार पूर्णतः खत्म नहीं हो सकता।

इन दोनों का अपना स्वतंत्र तंत्र है जहाँ लोगों को, लेने वाले को भी, देने वाले को भी, ये विश्वास होता है कि अगर सामने वाले ने पैसे लिए हैं तो काम हो जाएगा। भ्रष्टतंत्र सरकारी तंत्र से ज्यादा ईमानदार होता है। पुलिस आपको घुमाती रहेगी, बाबू आपको भटकाता रहेगा… पैसा दो कि काम तुरंत हो जाएगा।

ये क्यों होता है, मैं नहीं जानता। शायद हमारे डीएनए में भ्रष्टाचार है। चोरों को हम नेता बना देते हैं। गाँव का मुखिया उसको चुनते हैं जो सबसे दबंग हो, रंगबाज़ आदमी को सरपंच बना देते हैं। फिर यही छोटे लोग, आम इन्सान, जो हमारे आपके जैसे हैं, पचास रूपये का घूस लेकर दस्तखत करने से शुरुआत करते हैं और फिर टूजी, कॉमनवेल्थ, कोलगेट, अगस्टा वैस्टलैंड आदि तक पहुँचते हुए सौ करोड़, हजार करोड़ और लाख करोड़ का चूना लगाते हैं।

तो प्रधानमंत्री जी, और तमाम मंत्री जी, फोकस शिफ्ट मत कीजिए। भ्रष्टाचार और काला धन के ख़िलाफ़ ये लड़ाई है। हो सकता है आप लड़ भी रहे होंगे, जनता आपके लिए लाइन में खड़ी भी है, वाह वाह भी कर रही है लेकिन अचानक से ये कैशलेस राग मत अलापिए।

कैशलेस होना पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था का नैसर्गिक क़दम है जो कि स्वयं ही आएगा। इसको आप सरकार होने के नाते धक्का दे सकते हैं, लेकिन ठेलिए मत ज़बरदस्ती। गाँव में स्वाइप मशीन नहीं पहुँचा है और मेरे पापा आज भी एटीएम कार्ड लेने से घबराते हैं। उनसे स्टार नाइन नाइन हैश कैसे डायल करवाऊँगा, वो एक अलग लेवल की समस्या है।….

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