घृणा की खेती करते फेसबुकिया बुद्धिजीवी की फ़र्ज़ी संवेदना

आप ये जताने की भरपूर कोशिश में हैं कि सरकारों ने ‘मॉब लिंचिंग’ का कोई कोर्स शुरु किया है जहाँ से प्लेसमेंट हो रहा है।

प्राइम टाइम: आखिर डर की खेती कौन कर रहा है? सरकार या पत्रकार?

आपने जो बाग़ बना दिया है ना, वहाँ लगता है कि कोई नमाज़ पढता मिलेगा तो दूसरा आदमी पीछे से छूरा मार देगा! आपके बाग़ में ख़ून की झील है, नंगी तलवारों वाले तिलकधारी हिन्दू हैं, ख़ून से लथपथ बुर्क़े में जाती मुसलमान लड़की है, हँसती हुई भीड़ है जो टोपीवालों पर तंज कस रही है… इस ख़्याल में एक ही लोचा है रवीश जी, वो ये कि ये आपके ख़्यालों में है, हक़ीक़त नहीं है।

सर्वहारा क्रांति में किस सर्वहारा को सत्ता मिली?

हर विचारधारा का एक समय होता है, उसके बाद वो मर जाती है, बीमार हो जाती है, या फिर नकार दी जाती है। समय बदलता है।

वामपंथी सूअरों, पिगलेट्स को पहचानिए, फिर कीचड़ में उतार कर भाग जाईए

ऐसे लोगों को लगता है कि गाँजा पीकर वो बॉब मारले हो जाएँगे, और सिगरेट (चूँकि सिगार पी नहीं सकते) पीकर चे ग्वेरा।

क्या एनडीटीवी मालिक पर छापा सेलेक्टिव विच-हंट है? बिल्कुल है, लेकिन ज़रूरी है

जितनी नफ़रत वामपंथियों ने बोई है उसकी धार को नाकाम करने के लिए उसी स्तर का दक्षिणपंथी विषवमन निहायत ही ज़रूरी है। ये गलत है, लेकिन ये ज़रूरी है। जैसे कि सेलेक्टिव टार्गेटिंग गलत है, लेकिन ज़रूरी है।

प्रणय रॉय चोरी काण्ड: चर्चा को चोरी से भटकाकर प्रेस स्वतंत्रता के हनन की ओर ले जाने की कोशिश

ये चिल्लाएँगे कि सरकार आवाज़ों को दबा रही है। ये चिल्लाएँगे कि पत्रकारिता के आदर्शों के चरम पर वो खड़े थे जिन्हें सरकार खींच कर नीचे लाना चाहती है। इस चर्चा को प्रणय रॉय की चोरी से हटाते हुए वहाँ पहुँचाने की कोशिश होगी जहाँ ये बताया जाएगा कि सरकार प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बोल रही है।

बिहार छात्र-दुर्दशा पर आश्चर्य क्यों?

ग़रीबी के कारण सरकारी स्कूलों में अटके बच्चे, जहाँ के शिक्षकों को सैलरी आठ महीने में मिलती है, क्या पढ़ाई करेंगे? उनके सिर्फ फ़ॉर्म भरे जाते हैं।

मुद्दा नंबर छः: स्वास्थ्य में हम वहाँ हैं जहाँ से हमको कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

जब तक नयी सोच के साथ रोडमैप बनाकर आगे नहीं बढ़ा जाएगा तब तक लोकलुभावन ‘जेनेरिक दवाई’ और फलाने दवाईयों के मूल्य कम कर देने वाली बातों के लॉलीपॉप से कुछ ख़ास नहीं होने वाला। नेशनल हेल्थ पॉलिसी एक जुमला बनकर रह जाएगी और देश का पैसा, समय और जानें बर्बाद होती रहेंगी।