जेएनयू चुनाव: ‘ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा’ से ‘रंग दे तू मोहे गेरूआ’

लेफ़्ट यूनिटी अपनी लालिमा के साथ अस्तगामी है। ये बात और है कि एक मज़बूत विपक्ष की कमी इस देश को तीन साल से खल रही है।

प्रिय पत्रकारो, क्या गौरी को न्याय मिलने तक रोज लिख सकोगे?

आपको किसी खास क़िस्म की लाश का इंतज़ार क्यों रहता है? आपके लिए कैसे बीच के तमाम दिन ठीक से गुज़रते हैं? आप कैसे तमाम बेकार के मुद्दों में उलझकर गाय-गोबर करते रहते हैं?

प्राइम टाइम: गौरी लंकेश की हत्या पर पत्रकारों का त्वरित फ़ैसला

आपको कितने बाकी रंजनों, कुमारों, पाठकों, यादवों की ख़बर मिली थी? कितनी बार आधे घंटे के अंदर ये तय हो गया कि किस विचारधारा के लोग थे उन्हें मारने वाले? कितनी बार पुलिस ने वैसे लोगों को पकड़ा?

कंगना रणौत: जुनूनी, हिम्मती, स्वाभिमानी लड़की जो हर लड़की को होना चाहिए

जब एक स्त्री किसी पुरुषप्रधान समाज में टूटी, जर्जर सीढ़ियों को छोड़ते हुए अपनी अलग सीढ़ी बना लेती है तो बहुत दर्द होता है। ईगो हर्ट हो जाता है पुरुष का कि इसे तो मेरे बिस्तर में होना चाहिए था, ये कहाँ लक्ष्मीबाई बनकर घूम रही है!

आप गलत को गलत कहिए, हम ज़रा धर्म-जात-राज्य पता कर लें…

ग़लती किसने की है, क्या इस भीड़ के सर पर टोपी है, क्या इस भीड़ के खड़े होने की जगह बंगाल या कश्मीर तो नहीं, अगर चुनाव है तो उसकी जाति निचली है कि नहीं। उसके बाद इनकी संवेदनाएँ जगती हैं।

प्रिय ट्विंकल खन्ना जी, खुले में शौच करते व्यक्ति का उपहास मत कीजिए

बहुतों के लिए बाहर में शौच करना चुनाव नहीं, अभाव है। किसी को भी बदबूदार पब्लिक टॉयलेट की लाइन में खड़ा होना आनंददायक नहीं लगता।

बस इसलिए शराब में मेरी दिलचस्पी नहीं रही

अपने दो घंटे के मज़े के लिए किसी घर में एक पिटती पत्नी, इस हिंसा से त्रस्त होकर खुद को मारने की योजना बनाते किसी बेटे और जिंदगी भर के लिए सहमी हुई किसी बेटी को छोड़ दिया है।

प्राइम टाइम: बाढ़ आती है तो आए, लेकिन सरकारों को फ़र्क़ क्यों नहीं पड़ता?

समाधान क्या है? हर साल क्यों? तैयारी क्यों नहीं है? बाढ़ आती है तो आए, जानें क्यों ले जाती है?

उनके नाम जिन्होंने नारीवाद को पीरियड्स के धब्बों के फोटो तक सीमित कर दिया है

ऐसे लोग ज़मीनी हक़ीक़त से बहुत दूर, फेसबुक आदि पर ही कैम्पेन चलाते हैं और उनके लिए वो रास्ता सबसे सही होता है जो सबसे छोटा होता है।