मानव और कहानियों की कहानी

जीने के लिए पेट को अन्न चाहिए, पानी चाहिए, हवा चाहिए। इसमें हमारे पूर्वजों ने कहानियाँ जोड़ दी। लेकिन ये नहीं बताया कि रोटी कपड़ा और मकान के साथ कहानी भी ज़रूरी है। बता देते तो भाँडा फूट जाता और हम आराम से पचास-सौ की टोलियों में रहते, दिन में तीन घंटे काम (शिकार) करते और आराम से रहते।

ब्राह्मण, ब्राह्मणवाद और अब ब्राह्मणवादी पितृसत्ता

जिस समाज को आप नहीं समझते, वहाँ बस अपनी विचारधारा से मिलते लोगों को साथ मिल लेने से आप ज्ञानी नहीं हो जाएँगे, न ही इन्क्लूसिव और प्लूरलिस्ट। आप वहाँ अपनी अज्ञानता के कारण जैक से जैकऐस बन जाएँगे।

डियर थरूर जी, मोदी के कपड़े खींचते हुए आप मोर बन जाते हैं

ऐसी बातें फ़्रस्ट्रेशन हैं, छटपटाहट है, अभिजात्यता की ऐंठ से जनित सोच है। ये अगर बाहर नहीं आएगा तो ये लोग सड़कों पर कुत्तों की तरह आते-जाते भाजपाइयों या उनके समर्थकों को दाँत काटने लगेंगे। दाँत काटने से बेहतर है कि अंग्रेज़ी में ऐसे बयान दो कि आदमी को समझने में दो मिनट लगे कि क्या बोल गया।

अपूर्वानंद की काल्पनिक योग्यता लाजवाब है

अरे प्रोफेसर साहब, इस्लामी और ईसाई आक्रांताओं ने ही इस धरती के सांस्कृतिक नरसंहारों की शुरुआत की थी। उसके बाद लगातार आप ही के तर्क के अनुसार इतिहास, धार्मिक प्रतीक, सामाजिक ताना-बाना, शिक्षा पद्धति सब बर्बाद की। इसी को भौतिक विध्वंस कहा जाता है।

3000 करोड़ एक मूर्ति के लिए, 3600 करोड़ दूसरी के लिए! कितना ज़रूरी है ये सब?

भुलाए गए हर नायक और नायिकाओं की मूर्तियाँ, उनके नाम पर इतिहास के पन्ने और उनके योगदान की गाथाएँ हर भारतीय को जाननी चाहिए। न कि उनकी जिन्होंने यहाँ रहकर यहाँ की लड़कियों का बलात्कार किया, मंदिरों को बर्बाद किया, पुस्तकालयों में आग लगाए, और गाँवों में सामूहिक नरसंहार किए।

मुद्दों को मारने का सबसे सही तरीक़ा: हैशटैग

मुद्दों को ट्रेंडिंग बनाते ही उसकी अहमियत घट जाती है, और नज़दीकी इतिहास ये बताता है कि मुद्दा गौण हो जाता है। इसकी कैजुअल्टी बनती है वो तमाम लड़कियाँ जिन्हें वर्कप्लेस पर इसका शिकार बनाया जाता रहा है।

हम बिहारी हैं, दूब, कुचले और पतित भी क्योंकि क्रांति के नाम पर जाति पकड़ते हैं

हमें इसी बात में मज़ा आने लगा है कि हम किसी भी कारखाने को बंद कर सकते हैं जबकि हँसनेवाली बात यह है कि हम वहाँ के मज़दूर हैं, मालिक नहीं। फिर ये गौरव किस बात का?

अनुष्का को निकाल दें तो ‘सुई-धागा’ एक सपाट फ़िल्म है

इसके औसत होने की ज़िम्मेदारी पटकथा लिखने वाले और निर्देशक को लेनी चाहिए। इन दोनों जगहों पर फ़िल्म औंधे मुँह गिरी। इस फ़िल्म में पति-पत्नी के इस संघर्ष को दर्शक हिस्सों में, कहीं-कहीं, महसूस कर पाता है, जब कहानी भावनात्मक स्तर पर कभी-कभार आपको छू जाती हो।

सबरीमाला पर फ़ैसला: जेंडर इक्वालिटी, धार्मिक परम्पराएँ और धर्म

समाज और धर्म को एक ही मानकर, मंदिर को पूर्णतः पर्यटन स्थल मानकर उसमें जेंडर इक्वालिटी का तड़का मत लगाइए। हर बात, हर जगह लागू नहीं होती। अगर हो पाती तो मुस्लिम महिलाएँ भी हर मस्जिद में नमाज़ पढ़ पातीं और एक एनजीओ इसी सुप्रीम कोर्ट में इसे लागू करने के लिए लगातार प्रयत्न करती रहती।