केरल में सरेआम काटी गई गाय, हाय-हाय, हाय-हाय, हाय-हाय

लेकिन हिन्दू चुप रहेगा। क्योंकि ये साइंटिफ़िक नहीं है। गाय कट रही है, जानवर कट रहा है। मूर्ति पूजना मूर्खता है, पत्थर चूमना साइंटिफ़िक है।

सचिन: अ बिलियन ड्रीम्स: अपर क्लास हिन्दू मेल ब्राह्मण का फ़र्ज़ी ग्लोरिफिकेशन

मैं उनमें से नहीं हूँ जो हॉलीवुड डायरेक्टर का नाम या फ़िल्म का कंटेंट देखकर समीक्षा कर दूँ। समीक्षा तो पहले ही मेरे दिमाग़ में हो चुकी होती है, फ़िल्म तो बस टाइमपास होती है।

मुद्दा नंबर पाँच: रोजगार जिसके आँकड़े 2012 के बाद से अपडेट नहीं हुए

60% इंजीनियरों के पास नौकरी नहीं है। 93% एमबीए वाले नौकरी के लायक नहीं हैं। उनके पास बस डिग्री है, किसी काम के नहीं हैं।

मुद्दा नंबर चार: कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में नशाखोरी और गाँजा पीकर क्रिएटिव बनते छात्र

हर परेशान आदमी नहीं पीता, लेकिन हर परेशान छात्र को सिगरेट पकड़ाने वाले दस दोस्त लाइटर लेकर खड़े रहते हैं। ये एक तरह से कन्वर्जन टाइप का काम है। ये कम्यूनिटी बनाने का काम है कि अब ये भी हमारे ग्रुप में आ गया।

मुद्दा नंबर तीन: ऐसी शिक्षा व्यवस्था जहाँ स्टूडेण्ट काउन्सलिंग है ही नहीं!

तर्क है कि माँ-बाप अपने अनुभव से ये जानते हैं कि उनके लिए क्या ठीक रहेगा। अगर ऐसा है तो फिर उस प्रोसेस का हिस्सा छात्रों को भी तो बनाईए कि वो भी कह सके उसकी गणित में रूचि है या क्रिकेट में।

मुद्दा नंबर दो: भारत की शिक्षा व्यवस्था जहाँ जुगाड़ को आविष्कार कहा जाता है

सरकारें इस बात को प्रमोट करती है जब कोई बच्चा आलू से बिजली जला देता है। क्या आलू से बिजली बनेगा देश में?

‘असली मुद्दा क्या है’ शृंखला: नंबर एक: भारत के जनमानस में डाला गया ‘नव राष्ट्रवाद’

ये डिबेट भी मैनुफ़ैक्चर्ड ही है। ये इतनी बार दोहराया गया है कि लगता है कि सच में ये कोई इशू है।

रॉय बनाम रावल: द वायर की खोजी पत्रकारिता का मिसिंग लिंक

कुछ लोग द वायर का एक लिंक शेयर कर रहे हैं कि अरुँधति रॉय वाली ख़बर फ़र्ज़ी थी जिस पर परेश रावल ने ट्वीट किया। ये बात और है कि द वायर वालों ने उसी साइट पर, उसी से जुड़ी ख़बर में डाला गया विडियो नहीं दिखाया है। वो ख़बर भी पिछले तीन दिन से चर्चा […]

गोरी चमड़ी पर दाग दिखते हैं, काले-भूरों पर तो ख़ून भी खो जाता है

भारत वाले कहते रहे कि पाकिस्तान में गढ़ है लेकिन तुमने उसे ‘कॉन्फ्लिक्ट’ कहा और बदले में पाकिस्तान को अरबों डॉलर का ग्राँट देते रहे।

साहित्य और समाज: शुद्धता, व्याकरण, अच्छी भाषा, बुरी भाषा

साहित्य अपने आप में इतिहास है, मनोविज्ञान है, पत्रकारिता है, धर्मग्रंथ है। इस बात को समझिए और भाषा को सिर्फ कम्यूनिकेशन का माध्यम मत बनाईए, ये उससे कहीं ज़्यादा बड़ी बात है।