मी टू मूवमेंट: पीड़ितों की आवाज़ें हमेशा दब क्यों जाती हैं?

ये लड़ाई नारीवाद और नारीवादियों की ही है। इसमें आप वैसे लोगों से आशाएँ मत रखिए जिनके लिए हर चीज विशुद्ध व्यापार है, ट्रान्जेक्शन है।

राफ़ेल डील: डील के पहलू, निकम्मा विपक्ष और अनभिज्ञ जनता

HAL सिर्फ मिग फ्लीट के 200 पायलट्स की मौत और आधे एयरक्राफ्ट्स की दुर्घटनाओं के ज़िम्मेदार है। इनके हाथों पर मिग, सुखोई, हॉक जैसे विमानों में मरने वाले पायलट्स के ख़ून के धब्बे हैं, जिनसे ये मुक्ति नहीं पा सकते।

अच्छा, देश के युवा का मूड पता चल गया लेकिन आगे क्या?

ये तो हमारे, आपके डर को ज़ायज ठहराते हैं कि हाँ, यहाँ आतंकियों की नर्सरी है, और जो बम नहीं बना रहे, जो जंगलों में अपने ‘साथियों’ की लाशों के पेट में बम नहीं छोड़ रहे ताकि वो मरते हुए भी दस-पाँच आम सरकारी मुलाजिम को मार दे, जो अपने साथ की महिला काडरों को सेक्स स्लेव नहीं बना रहे, वो सब मानसिक समर्थन ज़रूर दे रहे कि जो वो कर रहे हैं वो सही कर रहे हैं।

फ़िल्म समीक्षा: विवेकशील निर्देशक बताता है कि ‘स्त्री’ की कहानी स्त्री की कहानी है

वेश्या के प्रेम की बात, उसकी शादी की बात और फिर गाँववालों द्वारा एक तरह की ऑनर किलिंग की बात को, उसी गाँव के कुछ बच्चे जो अगली पीढ़ी के हैं, संवेदना के साथ सुनते हैं और सकारात्मकता के साथ चर्चा करते हैं कि जो हुआ वो गलत था। ये एक अच्छी कहानी और निर्देशन का द्योतक है।

प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचनेवाले गिरोह और उनके साथियों के नाम

ज़रूरत है कि इन लोगों की शिनाख्त हो, और सरकार, चाहे जो भी रहे, इन्हें लगातार निगरानी में रखे। इनकी हरकतों पर निगाह होनी चाहिए क्योंकि ये लोग कब किसी आठ साल के बच्चे की छाती में बम बाँधकर किसी भीड़ में भेज देंगे, ये कोई नहीं जानता।

बिहिया कांड: काश कि वो किसी हिजड़ों की बस्ती से निकलती, वो बचा ली जाती

कुतूहल ने सारे मानवीय मूल्यों को ढक लिया है! आख़िर हम ये कर कैसे पाते हैं कि किसी लड़की को वस्त्रहीन करके एक भीड़ चल रही है, और कोई विडियो बना रहा है?

‘गोल्ड’ एक औसत दर्जे की फ़िल्म है

बात यह है कि हर फ़िल्म चालीस दिन में आप नहीं बना सकते। आपको एक बेहतर फ़िल्म के लिए शूटिंग पर जाने के पहले भी कई महीने लग सकते हैं। आप नकली मूँछ चिपकाकर और ‘एक’ को ‘ऐक’ बोलकर बंगाली नहीं बन सकते।

छात्रों के मुद्दे को मेरा समर्थन है, नेताओं को नहीं

छात्र एकता ज़िंदाबाद, लेकिन पिछले कुछ समय से किसी भी छात्र नेता ने खुद को साबित नहीं किया है कि वो क्यों नेता कहे जाने चाहिए, इसलिए, उनके लिए मेरा समर्थन नहीं है।

गौण मुद्दों के दौर में आपातकाल का हर रोज आना दोगलई का चरम है

जब मोदी इतना शक्तिशाली है ही, और वो मीडिया को दबा ही रहा है तो सबसे पहले तो ज़्यादा भौंकने वाले कुत्तों के मुँह पर जाली लगा देता, लेकिन कोई भारत में तो कोई वाशिंगटन पोस्ट में तमाम बातें लिख रहा है जो वो लिखना चाहता है।

स्त्री शरीर, नारी की देह, और सैनिटरी पैड्स

ये मसला स्वास्थ्य का है, बुनियादी है, स्त्री शरीर का है, ‘नारी की देह’ या आधुनिकता का नहीं। ‘नारी की देह’ कविता है, स्त्री शरीर स्वास्थ्य का मामला है। कविता और बेडशीट की तस्वीर इसे मॉडर्निटी से जोड़ने की बेकार कोशिशें हैं।