उत्तराखंड मेडिकल कॉलेज फीस कांड: क्या मेडिकल की पढ़ाई इतनी सस्ती है?

विरोध इस बात से है कि जब सरकारों को और भी सरकारी कॉलेज खोलना चाहिए तो वो वैसा न करके, स्वास्थ्य और शिक्षा का बजट घटाकर, निजी संस्थानों को बढ़ावा दे रहे हैं। हर व्यक्ति न तो इतना पैसा देने में सक्षम है, न ही लोन लेने में। लोन लेने की प्रक्रिया इतनी भयावह है कि ग़रीबों को शिक्षा संबंधित लोन मिल भी नहीं पाता।

असम में 50 लाख बंग्लादेशियों की शिनाख़्त पूरी, मीडिया के मातम का इंतज़ार करें

कहानी शुरु होगी कि नूर के छः बच्चे हैं, पति मर चुका है, और उसका कहना है कि वो हमेशा से असम में ही रहे हैं। उसके बेटे को ग़ालिब बहुत पसंद है, और वो कविता करता है।

दंगों का दौर शुरु हो गया है, कमर-पेटी बाँध लीजिए

ये सच्चाई है कि पहले जो समाज हिंसक नहीं था, उसे अब हिंसक बनाया जा रहा है, या वो खुद ही एक का तुष्टीकरण देखकर हिंसक प्रवृति दिखाने लगे हैं। इस हिंसा और वोटबैंक का सहारा एक तरह के लोग उठाते रहे, अब दूसरी तरह के लोग भी दंगे करा रहे हैं, और आगज़नी में शामिल हैं।

प्राइवेसी एक छलावा है ब्रो, नैतिकता की बात मत कीजिए

क्या इससे आपकी ज़ाती जिंदगी पर कोई फ़र्क़ पड़ा? क्या आपको टार्गेट किया गया किसी नकारात्मक उद्देश्य से? क्या आपका कुछ ऐसा चला गया जो आपने बचाने की कोशिश की थी, किसी को पता नहीं थी?

प्राइवेसी एक पब्लिक विषयवस्तु है, आप इंटरनेट पर हैं तो नंगे हैं

जब सारे नाइट टॉक शो होस्ट हर रात ट्रम्प के ख़िलाफ़ विषवमन कर रहे थे, और आज भी करते हैं, तब लोग प्रभावित नहीं हो रहे थे? क्यों? क्योंकि वो सोशल मीडिया नहीं है! जब फ़ॉक्स न्यूज़ को छोड़कर बाकी के अधिकतर न्यूज़ चैनल पैनल डिस्कशन और चर्चाओं में ट्रम्प को खुल्लमखुल्ला आड़े हाथों लेते थे तब क्या वोटर इन्फ्लूएन्स नहीं हो रहा था? मतलब मेमस्ट्रीम मीडिया स्टूडियो से कैम्पेनिंग करे तो ठीक, यहाँ आपकी पब्लिक में रखी बातें कोई ले रहा है तो आप बवाल कर रहे हैं!

प्रिय रवीश जी, पत्रकारिता के आलोकनाथ मत बनिए

आप स्टूडियो में बैठे वो दंगाई हैं जो शब्दों से दंगे करवा सकता है। आप बार-बार अपनी बातों को साबित न कर पाने की स्थिति में ऐसे तर्क रखते हैं जिन्हें सत्यापित करना नामुमकिन है। जैसे कि ‘भाजपा के राज में लोगों को बल मिल रहा है’। ये कैसे नाप लें कि लोगों को बल मिल रहा है? लोग पागल हो रहे हैं तो सरकार कैसे ज़िम्मेदार है?

नालायक वामपंथियों पर तर्क के हमले होते हैं तो वो ‘महान विचारों’ के पनाह में छुपता है

चूँकि ये सत्ता में नहीं हैं तो जो सत्ता में है वो हिटलर और ज़ार हो जाता है। चूँकि ये अपनी बातों से जनता को वोट करने के लिए प्रेरित नहीं कर पाते तो ‘आर्म्ड रेबेलियन’ जायज़ हो जाता है। चूँकि तुम्हारा मैनिफ़ेस्टो बकवास है इसलिए ग़रीबी एक हिंसा है, जो कि किसी दूसरे ग़रीब को काट देने के बराबर वाली हिंसा के समकक्ष हो जाती है।

अवनि जी, बाइसन-21 की बधाई, आप हम सबकी आदर्श हैं

तीनों बहनों को सलाम, आपको एक एक्सट्रा! राफ़ेल आ जाए तो उसको उड़ाइएगा, तब हम आप तीनों का पोस्टर रूम में लगा लेंगे।

प्राइम टाइम: नीरव मोदी कांड में फ़ेसबुकिया विश्लेषकों की गट फीलिंग का दम्भ देखने लायक है

आप ये किस बिना पर मान लेते हैं कि आप ही सही हैं, और आपके पास सिवाय चार आर्टिकल्स के कोट करने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो कम से कम जाँच एजेंसियों के बयान तो हैं? आपने कहाँ से जाँच करवाई? अंदेशे, संदेह, और इस बात पर कि आपको ऐसा लगता है? या इस बात पर इसमें मोदी शामिल न हो ये हो ही नहीं सकता?

‘टाइम्स अप’: दोस्ती, सेक्सटिंग, सेक्स, सेक्सुअल फ़ेवर्स और विक्टिमहुड

मैं सिर्फ उन महिलाओं के साथ हूँ जो अक्षम थीं, जिनके पास क़ानूनी सहायता का कोई विकल्प न था, जिन्हें क़ैद करके रखा गया, जिनके साथ ज़बरदस्ती हुई और पुलिस या समाज ने उन्हें चुप कर दिया।