मजाक कंगना रनौत का नहीं बॉलीवुड की नपुंसक सोच का उड़ा है

बॉलीवुड को आमतौर पर लोग बुद्धिजीवियों का समूह मानते हैं जो कि इस समाज की दिशा और दशा तय करने में सहायक हो सकते हैं। चूँकि क्रिएटिव लोगों की जगह है तो उनसे उम्मीद की जाती है कि वो सामाजिक बातों पर, समसामयिक मुद्दों पर अगर समूह में ना सही, तो एकाकी आवाज़ में भी कहते रहें। इससे आम लोगों को संबल मिलता है कि देखो ज्ञानी आदमी कुछ कह रहा है।

ऐसी ही जगह पर, आम तमाम जगहों की तरह, वो लोग भी होते हैं जो चुटकुलेबाजी करते हैं, खेमे में रहने लगते हैं, खूँटे पकड़ लेते हैं और निशानची बन जाते हैं। आईफ़ा अवार्ड्स में हुए टुचपने की बात कर रहा हूँ। वहाँ पर कंगना रनौत का इस तरह से मजाक उड़ाया गया मानो उसने कुछ गलत कर दिया हो।

करण जौहर, आमिताभ बच्चन, सैफ़ अली खान, शाहरूख, आमिर जैसे लोग सलमान के सारे केसों में कोर्ट का सम्मान करते दिखते हैं, और सलमान के पीछे खड़े हो जाते हैं ये कहकर कि वो तो फ़िल्म इंडस्ट्री का एक हिस्सा है जो परिवार की तरह है। और परिवार में लोग तो साथ देते ही हैं।

मेरा पूछना है कि क्या इस इंडस्ट्री में परिवारवाद नहीं है? क्या सिर्फ ये कहकर सैफ़ बच जाएँगे कि उन्होंने तो बस एक मजाक किया था और ऐसा नहीं है कि स्टार्स के बच्चों को संघर्ष नहीं करना पड़ता। संघर्ष करते हैं, जरूर करते हैं, लेकिन ये बात भी तय है कि कंगना ने जो बात उठाई वो भी सही है, और स्टार्स के बच्चों को उनके माँ-बाप अपने पैसों पर भी लॉन्च करते हैं। उनको ज्यादा मौक़े मिलते हैं, घुसना आसान होता है।

करन जौहर को अगर शो करना है तो वो सिर्फ उन्हें ही बुलाएँ जो उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं। उनको क्यों बुलाते हैं जो उनके शो में जाकर उनकी बातों को तार्किक तरीक़े से काटता है? मत कीजिए ऐसे लोगों के साथ शो जब आपको अपना ही चलाना है तो। वैसे भी हर सीज़न में तो वही लोग आते हैं, वही घटिया सवाल, वही खोखली हँसी और गाल सटाकर पप्पियाँ लेना।

सबसे ग़ज़ब बात तो ये लगी कि वरुण धवन, सैफ़ और करन ने अपने तथाकथित मजाक के बाद माफ़ी माँगी। माफ़ी के शब्द बहुत बेहतरीन थे कि माफ करना मगर किसी को बुरा लगा हो तो; मैं मोमेंट में बह गया था; ये तो एक मजाक था जो किसी घटिया स्क्रिप्ट राइटर ने लिखा था।

वाह! तमाम तरह के मुद्दों पर विचार रखने वाले वॉलीवुड के पुरोधा, और प्रकाशपुंज ट्विटर पर नहीं दिख रहे। अपने क्लीवेज को डिफ़ेंड करने वाली माय च्वाइस गर्ल दीपिका ने इस पर ट्वीट नहीं किया। हर समय मुखर रहने वाली प्रियंका ने इस पर कुछ नहीं कहा। बाकी के ज्ञानी लोग चुप्पी साधे बैठे हैं।

कंगना को जो कहना था वो कह चुकी है और इस तरह से उसके ना होने के बावजूद उसके नाम और बातों का मजाक उड़ाना, और अगले दिन माफ़ी माँग लेना बॉलीवुड के खोखलेपन के बारे में बहुत कुछ कहता है। कंगना ने सेंध मारी है। आइटम सॉन्ग पर ‘माह लाइफ माह रूल्ज’ का नारा लगाते हुए खुद को एक प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल करने वाली तारिकाओं की, जो वूमनिया के ऑब्जेक्टिफिकेशन पर आख्यान कहती हैं, थिरकती कमर और वक्षस्थल के कसाव के बीच की जगह दिखाने की ‘कला’ को अपनी अदाकारी के दम पर चुनौती देने वाली कंगना शायद उनके लीग की नहीं है। वो उस इंडस्ट्री की नहीं है जहाँ उसके पक्ष में नारीवाद का झंडा लेकर बाकी की हिरोइनें कूद पड़ें।

कंगना की लड़ाई अपनी थी, अपनी ही रहेगी। बॉलीवुड के दिग्गजों द्वारा कहा गया ये चुटकुला कंगना का नहीं बॉलीवुड की नपुंसक सोच का मजाक उड़ाता है।….

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