बजट 2018: मिडिल क्लास वालो, ऊपर उठो मुफ़्तख़ोरी की आदत से

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मैं कोई बजट विश्लेषक नहीं हूँ, न ही अर्थशास्त्र की समझ है, लेकिन जो लोग ‘मिडिल क्लास’ वाला राग अलाप रहे हैं, उससे मुझे भारतीय जनता का एक ही सर्वप्रिय गुण दिखता है: मुफ़्तख़ोरी!

जब बजट में कृषि, इन्फ़्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, और शिक्षा पर पैसे बाँटे जाते हैं तो वो किस क्लास के लिए होते हैं? क्या बजट में मिडिल क्लास को फ्रिज और टीवी मुफ़्त में बाँट दिया जाय?

ये किस तरह की आशाएँ हैं? क्या किसान मिडिल क्लास नहीं है? आखिर मिडिल क्लास की क्या आशाएँ हैं? और जो ग़रीबी और भुखमरी से मर रहे हैं, उनके लिए सरकार कुछ न करे? बीमा किस के लिए है? उज्जवला और विद्युतीकरण का लाभ किस क्लास को मिल रहा है?

आपको जीडीपी की दर भी आठ चाहिए, आपको सड़कें भी चाहिए, पाकिस्तान को जवाब देने के लिए डिफ़ेंस का बजट भी भयंकर चाहिए, हॉस्पिटल और स्कूल भी चाहिए, रेलवे का आधुनिकीकरण भी चाहिए, हर घर में बिजली भी और फिर आपको टैक्स में छूट भी चाहिए!

मिडिल क्लास से पहले, मेरे हिसाब से, ग़रीबों का हक़ है जो सत्तर साल बाद भी रोटी-कपड़ा-मकान के लिए तरस रहे हैं। मिडिल क्लास हर अर्थव्यवस्था में रौंदा जाता है। वो काम करता है, टैक्स देता है। कंपनियाँ कंपनी टैक्स देती हैं। लेकिन उन्हें टैक्स में रियायत दी जाती है ताकि वो बिज़नेस का विस्तार कर सकें। बिज़नेस बढ़ेंगे, तो इसी मिडिल क्लास को रोजगार मिलेगा। सड़के बनेंगी तो मज़दूरों को काम मिलेगा।

आपको मेक इन इंडिया का मजाक भी उड़ाना है, विदेश यात्रा पर गए मोदी द्वारा साइन किए एमओयू का प्रतिफल भी उसके भारत लैंड करने से पहले देखना है, और जीएसटी जैसे रिफ़ॉर्म से इकट्ठे हो रहे आँकड़ों पर भी त्वरित रिज़ल्ट चाहिए। आपको सरकार बदलते ही देश भी बदला हुआ चाहिए।

अब आप कहेंगे कि मोदी सरकार का बजट है, चार साल हो गया, मैं भाजपा समर्थक हूँ इसलिए लिख रहा हूँ। मुझे बजट की समझ नहीं है, कॉमन सेन्स से चलता हूँ। आप लोग बहुत बड़े अर्थशास्त्री होंगे, और आपको बिलकुल पता होगा कि फिस्कल डेफिसिट से लेकर मुद्रास्फीति तक सरकारों को कैसे बैंक के लैंडिंग रेट घटाते हुए, इंटेरेस्ट में वृद्धि करके देश का कायाकल्प कर देना चाहिए। मैं उतना स्मार्ट नहीं हूँ।

मैंने बजट बस घंटे भर के लिए सुना, बाकी पता था कि आप लोगों का रायता मिल जाएगा फेसबुक पर। मिडिल क्लास की परिभाषा बताने में, और उसको क्यों रियायत दी जाए, ये बताने में आपके पसीने छूट जाएँगे। अगर आपको लगता है कि आप अपनी मुफ़्तख़ोरी के लिए, और इस बात के लिए कि आपको टैक्स में छूट नहीं दी गई, तो आप सरकार पलट देंगे, तो बेशक पलट दीजिए।

क्या लगता है कि बजट का पैसा आकाश से आता है? फिस्कल डेफिसिट और सरप्लस के बारे में पता कीजिए कि क्या होता है। बजट एक बड़ा टोकरा है, लेकिन वो अंतहीन आकार का नहीं है। उसी सौ रूपए में से सात रक्षा पर, दो शिक्षा पर, पचास इन्फ़्रा पर, तीन स्वास्थ्य पर, दस कृषि पर, बारह इस पर, और तेरह उस पर ख़र्च होगा।

ये ख़र्च कहाँ से आएगा? टैक्स से। आपको तो जीएसटी से भी दिक्कत है! जो नौकरी कर रहे हैं, वो मिडिल क्लास ही हैं सब के सब, और उनको भी टैक्स में छूट चाहिए। रोजगार का सृजन नहीं हो रहा तो वहाँ भी आपको सरकार को गरियाना है। रोजगार लगाने को लिए विदेशी या देसी कंपनियों को रियायत नहीं मिलेगी तो वो आपकी जगह चीन में क्यों फ़ैक्टरी नहीं लगाएगा? फिर जो रोजगार आपको मिलेगा तो आप टैक्स क्यों नहीं देंगे? आपको तीन लाख की आमदनी पर टैक्स देने में दिक्कत है, लेकिन जिसकी साल भर की ज़िंदगी बत्तीस रुपये प्रतिदिन पर बीत रही है, उसके लिए कुछ नहीं। वो क्यों सामानों पर टैक्स देता है? वो पैदा ही क्यों हो गया?

जीएसटी का रेट बढ़ता है तो कहते हैं कि सामान के दाम बढ़ गए, और टैक्स में छूट चाहिए। एक बात तो पता है न कि सरकार पैसा छापती ज़रूर है लेकिन मनमर्ज़ी से नहीं छाप सकती? चूँकि हर सरकार मुफ़्त और लोकलुभावन बजट फैला देती है, तो वही आदत लेकर हम जी रहे हैं कि हमको छूट नहीं मिली, हमको छूट नहीं मिली!

आपको छूट क्यों चाहिए? आपसे टैक्स क्यों नहीं लिया जाय? जो कमा ही नहीं रहा उससे कमाने का टैक्स तो नहीं लिया जाएगा ना? वो तो साबुन-तेल ख़रीदकर अपने हिस्से की कच्ची सड़क का टैक्स देते हैं। आपको टीवी का दाम भी कम चाहिए, हॉलमार्क ज्वैलरी भी सस्ती चाहिए, टमाटर वाले शाही पनीर पर जीएसटी कम चाहिए, रेडलाइट के ग्रीन होने के इंतजार में आप सरकार को कोसते हैं कि फ्लाइओवर क्यों नहीं बना देती और आपको टैक्स में भी रियायत चाहिए!

घूम-फिरकर वही बात है कि आपको लगता है कि पहले यात्री किराया नहीं बढ़ा, तो कभी न बढ़े! ये बात और है कि किराया बढ़ाकर सुविधाओं में कटौती हो जाती है, वो ग़लत है। कई लोगों को तो सरकार गिराने तक का माद्दा है! आजतक वोट नहीं दिया और कह रहे हैं कि सरकार गिरा देंगे! गिरा दो भाई। गिरा ही दो, तभी तो पता चलेगा कि मेरे टैक्स स्लैब को तीन से पाँच नहीं किया इसके लिए हमने पहले से साबित चोरों को पुनः सत्ता दे दी है जो कि ग़रीबों को सिर्फ ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दे, और मुसलमानों को मदरसे में रियायत देकर कहती रहे कि हम ही तुम्हारे रहनुमा हैं, और उनकी बीस करोड़ की आबादी में मात्र दस लाख औरतें ग्रेजुएट हों!

तुम मुफ़्तख़ोर हो, इसलिए तुम्हें सब चीज सस्ती चाहिए। मतलब, ये सरकार नहीं देगी, तो गिरा देंगे। गिरा दो। गिरा दो ताकि तुम्हें टैक्स में छूट मिल जाए, और जिस एक लाख करोड़ से तुम्हारे गाँव की सड़क बन जाती वो ‘ज़ीरो लॉस थ्योरी’ का शिकार हो जाए। गिरा दो सरकार ताकि तुम्हारे बटर चिकन की जीएसटी कम हो जाए, और कोयला घोटाला में इस दस रुपए की छूट के बदले कोई मंत्री कई लाख करोड़ नोंच ले।

ये किस तरह की सोच है? कैसे चलेगा देश, और कहाँ से बनोगे सुपर पावर? जयललिता के फ़्री टीवी से कौन-सा विकास हो गया उस राज्य का? मिडिल क्लास पर ध्यान दे देने से कैसे शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति सुधर जाएगी? कैसे ध्यान दे दे सरकार कि सौ रुपए में तीन सौ ख़र्च हो जाए, और मोदी की सरकार बच जाए?

तुम्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि कोई पार्टी इतने बड़े वोटबैंक को हाशिए पर रखकर एक बजट क्यों ला रही है। मुझे तो नहीं लगता कि फेसबुक पर बैठे अर्थशास्त्री अमित शाह से ज्यादा ज्ञानी होंगे राजनीति के मामले में। ये चर्चा करो ना कि बजट में पैसे तो हर बार बाँटे जा रहे हैं, गंगा साफ क्यों नहीं हो रही? स्कूल क्यों नहीं खुल रहे? अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज बनाने की बातों का स्टेटस क्या है? स्मार्ट सिटी कितने बन गए हैं सच में? कितने पंचायतों में बिजली के खम्बे हैं, लेकिन बिजली सिर्फ सरकारी एप्प में जलती दिख रही है?

आखिर फलाने कमिटी के रिपोर्ट के अनुसार भारत की अस्सी प्रतिशत जनता जो पचास रुपए में अपना गुज़र-बसर करती है, उसके लिए सरकार क्यों न कुछ करे? या उनको कनाडा भेज दिया जाए क्योंकि वहाँ जनसंख्या कम है? लगभग पाँच करोड़ उच्च जाति के लोग, और बीस करोड़ एससी, एसटी, ओबीसी में ग़रीबी रेखा के नीचे हैं। और ग़रीबी रेखा की परिभाषा खोज लीजिए कि क्या है, कितने रुपए प्रतिदिन पर रेखा रखी गई है। लेकिन आपको टैक्स में छूट चाहिए।

जो गरीब हैं, उनको तो फिर आपके हिसाब से न तो स्कूल मिलना चाहिए, न ही मेडिकल सेवाएँ, न ही सड़कें, न ही रियायतें क्योंकि वो तो मिडिल क्लास नहीं हैं! और सारा टैक्स तो मिडिल क्लास ही देता है। कम्पनियाँ टैक्स नहीं देतीं, अमीर लोग टैक्स नहीं देते। अमीरों से उसी अनुपात में टैक्स लिया जाना चाहिए, इस पर नया कानून बने, इसपर मेरी सहमति है। लेकिन जो टैक्स स्ट्रक्चर है, उसमें हर बार रियायत की उम्मीद क्यों की जाती है?

आप जो खाते हैं, उसको उगाने वाले का उत्पाद ज्यादा होने पर पचास पैसे किलो बिकता है, और कम होने पर आप एक किलो की जगह आधा किलो प्याज़ खाकर काम चला लेते हैं। उसको बेहतर सुविधाएँ मिले या आपको, जो पहले से ही एक स्तर ऊपर चल रहे हैं? संसाधनों पर हक़ किसका है? आप कोई अहसान नहीं कर रहे, न ही सरकारें एहसान कर रही हैं। देश फिस्कल डेफिसिट से बाहर होना चाहिए, न कि आपके वोट के लिए आपको रियायत देकर वर्ल्ड बैंक में अपना सोना गिरवी रख आए।

खुली अर्थव्यवस्था में कोई भी देश सिर्फ अपने दायरे में नहीं होता, उसका विकास बहुत सारे तरह की वैश्विक और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर होता है। पाकिस्तान नहीं होता तो जीडीपी का आठ प्रतिशत टैंक और मिसाइल की जगह कहीं और ख़र्च हो जाता। हमारी शिक्षा व्यवस्था बेहतरीन होती तो हमारे यहाँ के बने फोन बाज़ार में होते, न कि हम चीन के फोन पर ज्ञान बाँटते रहते।

इतनी जनसंख्या न होती तो हर साल तेरह लाख बच्चे कुपोषण से न मरते। जनसंख्या स्कूलों में जा पाती तो उसे टीबी के बारे में पता होता और बचाव के उपाय करने में सरकार को हर बजट में सैकड़ों करोड़ आवंटित न करने होते। आपके बीच के ठेकेदार, जो आपके बाप-भाई-चाचा हो सकते हैं, बेईमान न होते तो हर साल आपके पास की सड़क टूटती नहीं।

बाकी, वोट देना आपके हाथ में है ही। चुन लीजिए, नोटा दबा दीजिए, और घोषणापत्रों में लिखवा लीजिए कि भाई हमको टैक्स में छूट दोगे तो ही वोट देंगे। आपको नहीं लगता कि आप नंबर के मामले में भी पीछे पड़ जाएँगे? आपको पता है न कि ग़रीबों की संख्या मिडिल क्लास से ज्यादा है? आपको ये भी पता होगा कि अमीर लोगों का हर चुनाव पर किस तरह से इनडायरेक्ट असर होता है?

मिडिल क्लास का रोना मत रोइए, कष्ट काटिए। नहीं काट सकते तो काम कीजिए और मिडिल क्लास से अपर क्लास हो जाइए। मेहनत करना आपके हाथ में है। या आपको लगता है कि ड्रग्स बेचने वाले, बेईमानी करने वालों को सजा नहीं होती, और वो टैक्स नहीं देते, तो वो रास्ता भी आपके लिए खुला है। लेकिन मुफ़्तख़ोरी की आदत रखकर एक विकसित देश का सपना छोड़ दीजिए। नहीं छोड़िएगा तो हर सरकार आपका ‘गरीबी हटाओ’ का झुनझुना थमाकर हर बार काटती रहेगी।

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