बजट 2018: सैलरी वाले मिडिल क्लास के लोगों से कुछ सवाल

मिडिल क्लास के सैलरीधारियों से, जो इनकम टैक्स देते हैं, उनसे पूछा जाय कि उन्हें रियायत क्यों मिले तो कहेंगे कि वो टैक्स देते हैं। चूँकि वो टैक्स देते हैं तो ये मान लेते हैं कि वो ही टैक्स देते हैं।

तीस हजार से लेकर लाख रूपए तक कमाने वाले इस मिडिल क्लास सैलरीधारी आदमी से मेरा ये सवाल है कि क्या हर आदमी को वो जितना टैक्स देता है उसी अनुपात में सुविधा मिलनी चाहिए? जैसे कि मैं अगर एक लाख टैक्स देता हूँ तो मेरे लिए सड़क पर मेरी कार के लिए एक लेन अलग होनी चाहिए, जिसमें ट्रैफ़िक दो लाख वालों से ज़्यादा और पचास हजार वालों से कम हो?

क्या एक लाख टैक्स देने वाले मिडिल क्लास लोग, ऑर्गन ट्राँसप्लांट की लाइन में तीन लाख टैक्स देने वालों के बाद खड़े होंगे? क्या पचास हजार टैक्स देने वाला मिडिल क्लास टूटी सड़क, एक लाख वाला ठीक सड़क, और दो लाख वाले फ़्लाइओवर से चलें?

ये किस बात का गुमान है कि हम टैक्स देते हैं? कोई ज़्यादा टैक्स देता है इसलिए एक लाख टैक्स वाले मिडिल क्लास को भी वही सुविधा मिलती है जो किसी कम्पनी के सीईओ को मिलती है जो टैक्स करोड़ों में देता है। मैं यहाँ सार्वजनिक उपयोग की सुविधाओं की बात कर रहा हूँ। ऐसा तो है नहीं कि आपके बिज़नेस क्लास की सीट उसके बिज़नेस क्लास की सीट से ज़्यादा/कम दाम में आती है।

इस तर्क से चलें तो ग़रीबों को तो तमाम सुविधाओं से वंचित रखना ज़ायज है। वो तो टैक्स देते ही नहीं। क्या बीस प्रतिशत या नीचे के टैक्स देने वाले ये सोचते हैं कि सिर्फ उन्हीं के पैसों से एसी बसें, मेट्रो और ट्रेन के डिब्बे बनते हैं, तथा बाकी लोगों का इस पर कोई अधिकार नहीं?

यही तर्क होता तो आप, जिनके पूर्वज पहले गरीब थे, हमेशा ही वंचित रहते और आपके तर्क से ये ज़ायज भी होता। सरकार पिछड़ों के लिए, किसानों के लिए, आपकी तमाम सुविधाओं के लिए कुछ काम करना चाह रही है तो आपको अपने पाँच हजार रुपए टैक्स बचाने की पड़ी है!

आपको भी कई सुविधाएँ इसलिए मिल रही हैं क्योंकि कोई आपसे ज़्यादा टैक्स देता है। जब हम सब समान नागरिक हैं, और मैं अपनी प्रतिभा के कारण ज्यादा कमा रहा हूँ तो फिर किस तर्क से मैं किसी कम प्रतिभा वाले व्यक्ति से ज़्यादा टैक्स दूँ? फिर तो ये टैक्स संविधान-विरोधी है कि ज़्यादा कमाने वाला ज़्यादा टैक्स क्यों दे? सबको समान अवसर थे बेहतरी के, सबको अपना रास्ता चुनने का हक़ था, फिर जो ज्यादा परिश्रम करके कमा रहा है, वो ज़्यादा टैक्स क्यों दे? हर आदमी समान टैक्स क्यों न दें क्योंकि सुविधाएँ तो समान हैं?

जो प्राइवेट स्कूल से पढ़कर, गूगल का इंजीनियर बन जाए, वो सरकार को किस बात के पैसे दे टैक्स में? आखिर सरकार ने कौन-सा तीर मारा था उसकी शिक्षा के लिए? जिसने हमेशा अपनी पढ़ाई, चिकित्सा आदि का ख़र्च स्वयं वहन किया हो, वो नौकरी करने पर क्यों टैक्स दे?

क्योंकि हम एक वेलफ़ेयर स्टेट हैं। यहाँ सबको समान अवसर देने के बावजूद, समान समय नहीं दिया गया है। समान अवसर भी उपलब्ध कराने में सालों लग गए हैं। किसी को उसी मौक़े के दोहन में दस साल लगते हैं, किसी को बीस। अगर देश सबका है, तो इसके संसाधनों पर भी सबका हक़ है। सबको एक ही लम्बाई की सीढ़ी देने की जगह, सबको अलग लम्बाई की सीढ़ी देने की ज़रूरत होती है ताकि जो छः फ़ीट का है उसे भी दीवार के पार दिखे, जो दो का है उसे भी, और जो तीन का है उसे भी। एक ही सीढ़ी पकड़ा देने से सिर्फ छः फ़ीट वाला ही देख पाएगा।

मिडिल क्लास के सैलरी वालों को हमेशा ये ध्यान में रखना चाहिए कि बहुत सी सुविधाओं का लाभ वो नहीं उठा सकता अगर कोई अपर क्लास सैलरी वाला, कॉरपोरेट कम्पनियाँ टैक्स न दे रही होतीं। हम ये नहीं कह सकते कि वंचितों को वंचित रहने दो। किसी को ये काम करना ही होगा। मुझे नहीं लगता कि टैक्स स्लैब बढ़ा देने से ऐसे लोगों की क्वालिटी ऑफ़ लाइफ में धागे भर का भी फ़र्क़ पड़ेगा। लेकिन हाँ, उसी टैक्स से आए पैसे से किसी के घर की दीवार में एक ईंट जुड़ जाए तो उसकी ज़िंदगी बदल जाएगी।

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