सबरीमाला पर फ़ैसला: जेंडर इक्वालिटी, धार्मिक परम्पराएँ और धर्म

समाज और धर्म को एक ही मानकर, मंदिर को पूर्णतः पर्यटन स्थल मानकर उसमें जेंडर इक्वालिटी का तड़का मत लगाइए। हर बात, हर जगह लागू नहीं होती। अगर हो पाती तो मुस्लिम महिलाएँ भी हर मस्जिद में नमाज़ पढ़ पातीं और एक एनजीओ इसी सुप्रीम कोर्ट में इसे लागू करने के लिए लगातार प्रयत्न करती रहती।

मी टू मूवमेंट: पीड़ितों की आवाज़ें हमेशा दब क्यों जाती हैं?

ये लड़ाई नारीवाद और नारीवादियों की ही है। इसमें आप वैसे लोगों से आशाएँ मत रखिए जिनके लिए हर चीज विशुद्ध व्यापार है, ट्रान्जेक्शन है।

राफ़ेल डील: डील के पहलू, निकम्मा विपक्ष और अनभिज्ञ जनता

HAL सिर्फ मिग फ्लीट के 200 पायलट्स की मौत और आधे एयरक्राफ्ट्स की दुर्घटनाओं के ज़िम्मेदार है। इनके हाथों पर मिग, सुखोई, हॉक जैसे विमानों में मरने वाले पायलट्स के ख़ून के धब्बे हैं, जिनसे ये मुक्ति नहीं पा सकते।

अच्छा, देश के युवा का मूड पता चल गया लेकिन आगे क्या?

ये तो हमारे, आपके डर को ज़ायज ठहराते हैं कि हाँ, यहाँ आतंकियों की नर्सरी है, और जो बम नहीं बना रहे, जो जंगलों में अपने ‘साथियों’ की लाशों के पेट में बम नहीं छोड़ रहे ताकि वो मरते हुए भी दस-पाँच आम सरकारी मुलाजिम को मार दे, जो अपने साथ की महिला काडरों को सेक्स स्लेव नहीं बना रहे, वो सब मानसिक समर्थन ज़रूर दे रहे कि जो वो कर रहे हैं वो सही कर रहे हैं।

बिहिया कांड: काश कि वो किसी हिजड़ों की बस्ती से निकलती, वो बचा ली जाती

कुतूहल ने सारे मानवीय मूल्यों को ढक लिया है! आख़िर हम ये कर कैसे पाते हैं कि किसी लड़की को वस्त्रहीन करके एक भीड़ चल रही है, और कोई विडियो बना रहा है?

छात्रों के मुद्दे को मेरा समर्थन है, नेताओं को नहीं

छात्र एकता ज़िंदाबाद, लेकिन पिछले कुछ समय से किसी भी छात्र नेता ने खुद को साबित नहीं किया है कि वो क्यों नेता कहे जाने चाहिए, इसलिए, उनके लिए मेरा समर्थन नहीं है।

गौण मुद्दों के दौर में आपातकाल का हर रोज आना दोगलई का चरम है

जब मोदी इतना शक्तिशाली है ही, और वो मीडिया को दबा ही रहा है तो सबसे पहले तो ज़्यादा भौंकने वाले कुत्तों के मुँह पर जाली लगा देता, लेकिन कोई भारत में तो कोई वाशिंगटन पोस्ट में तमाम बातें लिख रहा है जो वो लिखना चाहता है।

ओह राहुल! कम इनसाइड मी… : क्विंट, स्क्रॉल, वायर, स्कोडा, लहसुन

कॉन्ग्रेस के साथ आने को इच्छुक पार्टियों को भी ये दिखाना ज़रूरी था कि उनका नेतृत्व ‘गले पड़ने’ के बाद आँख मारकर दाँत निपोड़ने वाला डिम्पल्ड क्यूटीपाय है, न कि उनसे बेहतर क्षमता और समझ वाला व्यक्तित्व।

टॉक टू अ मुस्लिम: आख़िर मैं मुसलमानों से बात क्यों करूँ

कभी ये हैशटैग क्यों नहीं चलाते कि ‘टॉक अबाउट इस्लामिक टेररिज्म’? इस पर मुसलमानों के सेमिनार, पैनल डिस्कशन, चर्चा, विचार गोष्ठी, टीवी डिबेट आदि क्यों नहीं होते? और जब कोई हिन्दू या दूसरे धर्म के लोग चर्चा करेंगे और ‘इस्लामी टेरर’ शब्द पर ऐसे आपत्ति करोगे कि कुछ गलत बोल दिया! तुम उसे ‘बिगट’ और कम्यूनल कह दोगे!

ढाई लोगों का विचार है कि भारत स्त्रियों के लिए सबसे ख़तरनाक देश है

इन एक्सपर्ट्स के एक्सपर्टीज़ का दायरा कितना व्यापक है कि इन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, आर्थिक संसाधन, सांस्कृतिक या परम्परागत प्रथाओं, यौन हिंसा और छेड़-छाड़, दूसरे तरह की हिंसा और मानव तस्करी जैसे सारे विषयों पर अपनी राय रखी है।