बंगाल चुनावी हिंसा: रवीश जी ने नाक में काग़ज़ की सीक डालकर छींका, किया इज़ इक्वल टू

पूरे आर्टिकल में प्रदेश की मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं लिया गया है। उस सांसद का नाम नहीं लिया गया है जिसने इस हिंसा के आँकड़े को सामान्य बताया है। क्यों? ट्रेन में बिकते जनरल नॉलेज की किताब में ‘कौन सी चिड़िया उड़ते हुए अंडे देती है’ के बाद वाले पन्ने पर ‘राज्य और मुख्यमंत्री’ वाले हिस्से में बंगाल की ममता का नाम नहीं छपा है क्या?

झारखंड रेप-हत्या कांड: इन गाँवों के लोग किस दुनिया में रह रहे हैं?

क्या दलित द्वारा दलित का बलात्कार और हत्या से शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए? क्या वो शर्मिंदगी और क्रोध सिर्फ़ हिन्दू-मुसलमान, दलित-सवर्ण वाले मामले में ही लागू होता है?

रवीश जी का हर झूठ टायटेनियम है, उसकी ढाल बनाकर उनको कैप्टन भारत बन जाना चाहिए

जब आपको मोदी लगता है कि बातों को छुपा रहा है, तो क्या उसके विपक्ष में खड़े हर नेता की रैली में आदर्श लोग आदर्श बातें कर रहे हैं जिनका कुर्ता पूरा सफ़ेद है?

रवीश ने धर लिया: मोदी ने बस 99.9995% गाँवों में ही बिजली पहुँचाई!

मंशा क्या होनी चाहिए और क्या है। सत्तर साल बाद हर गाँव में बिजली पहुँची ये देश के लिए अच्छी बात है। कुछ गाँवों में नहीं पहुँची इसका मतलब उन गाँवों के अधिकारियों ने गलत सूचना पहुँचाई, या 0.0005% (या चलिए ऐसे सौ गाँव और ले लीजिए, फिर भी 18000 पर भी 0.55% होगा) रह जाने के बावजूद मोदी ने कहा सौ प्रतिशत में पहुँच गया। मतलब मोदी को कहना था कि ‘मितरों! बिजली 99.9995% गाँवों में पहुँच गई!

पत्रकारिता के गिरते स्तर में ज़्यादा ज़िम्मेदारी किसकी?

मीडिया का काम सत्ता की आलोचना तक ही सीमित नहीं है। मीडिया का एक काम सूचना पहुँचाना है, और एक काम विवेचना है। विवेचना और चर्चा सिर्फ नाकामियाँ और खोट गिनाने के लिए नहीं होती, न ही सिर्फ हर बात को देवत्व के स्तर पर ले जाकर बताने के लिए होती है। जहाँ सत्ता सही कर रही है, जिस अनुपात में कर रही है, उसी अनुपात में आलोचना और विवेचना होनी चाहिए।

गीता रेप कांड: …तो मैं अब ये लिखूँ कि अल्लाह कितना शर्मिंदा हो रहा होगा?

रेप के कारण वैयक्तिक ही रहेंगे, सामाजिक या राष्ट्रीय नहीं हो सकते। किसी अपराधी के अपराध का बोझ पूरा धर्म, पूरा समाज अपने सर पर क्यों लेगा? क्यों थोप दिया जाय ऐसे घृणित और जघन्य कुकर्म का पाप पूरे राष्ट्र पर?

कॉन्ग्रेस का अंतिम दाव: न्यायपालिका को उठल्लू बताना

सिकुड़ते वोटबैंक, बिना किसी विजन या दिशा के चलती इस पार्टी, और इनके द्वारा पाले जा रहे कुत्ते पत्रकारों के बुरे दिन लम्बे समय तक चलने वाले हैं इसीलिए ये दिया इस साल तेज़ फड़फड़ाएगा। अब ये ढिंढोरा पीटा जाएगा कि जज ‘बैन्च फ़िक्स’ करते हैं जबकि चीफ़ जस्टिस को ही रोस्टर तय करने का अधिकार है। पाँच जजों की पीठ में चीफ़ जस्टिस हमेशा से एक सीट लेते हैं, ये तय है।

प्रसून जोशी-मोदी इंटरव्यू: इंटरव्यू लेते वक़्त मीडिया वाले क्यों नहीं चिल्लाते

इंटरव्यू जिसका भी आप लेने वाले हैं, पहले तो उसकी सहमति होनी चाहिए। दूसरी बात आपको एक प्रीइंटरव्यू के तौर पर सारे सवाल अपने सामने वाले को बताने होते हैं। ये उसकी इच्छा है कि वो किस सवाल की आपको अनुमति दे, किसकी नहीं।

रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था।