गौण मुद्दों के दौर में आपातकाल का हर रोज आना दोगलई का चरम है

जब मोदी इतना शक्तिशाली है ही, और वो मीडिया को दबा ही रहा है तो सबसे पहले तो ज़्यादा भौंकने वाले कुत्तों के मुँह पर जाली लगा देता, लेकिन कोई भारत में तो कोई वाशिंगटन पोस्ट में तमाम बातें लिख रहा है जो वो लिखना चाहता है।

ओह राहुल! कम इनसाइड मी… : क्विंट, स्क्रॉल, वायर, स्कोडा, लहसुन

कॉन्ग्रेस के साथ आने को इच्छुक पार्टियों को भी ये दिखाना ज़रूरी था कि उनका नेतृत्व ‘गले पड़ने’ के बाद आँख मारकर दाँत निपोड़ने वाला डिम्पल्ड क्यूटीपाय है, न कि उनसे बेहतर क्षमता और समझ वाला व्यक्तित्व।

टॉक टू अ मुस्लिम: आख़िर मैं मुसलमानों से बात क्यों करूँ

कभी ये हैशटैग क्यों नहीं चलाते कि ‘टॉक अबाउट इस्लामिक टेररिज्म’? इस पर मुसलमानों के सेमिनार, पैनल डिस्कशन, चर्चा, विचार गोष्ठी, टीवी डिबेट आदि क्यों नहीं होते? और जब कोई हिन्दू या दूसरे धर्म के लोग चर्चा करेंगे और ‘इस्लामी टेरर’ शब्द पर ऐसे आपत्ति करोगे कि कुछ गलत बोल दिया! तुम उसे ‘बिगट’ और कम्यूनल कह दोगे!

ढाई लोगों का विचार है कि भारत स्त्रियों के लिए सबसे ख़तरनाक देश है

इन एक्सपर्ट्स के एक्सपर्टीज़ का दायरा कितना व्यापक है कि इन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, आर्थिक संसाधन, सांस्कृतिक या परम्परागत प्रथाओं, यौन हिंसा और छेड़-छाड़, दूसरे तरह की हिंसा और मानव तस्करी जैसे सारे विषयों पर अपनी राय रखी है।

वामपंथी नेतृत्व चुने हुए प्रधानमंत्री को बम से उड़ाकर लोकतंत्र को बचाना चाहता है!

अगर ये लोग दलितों और आदिवासियों के हिमायती हैं तो ऐसे राज्यों और इस देश में उनकी सरकार क्यों नहीं बनती? देश में तो तीन-चौथाई आबादी दलितों और आदिवासियों की ही है, इनके सांसद विलुप्तप्राय प्रजाति क्यों हो गए हैं?

‘ठंढा आ रहा है’ वामपंथी आतंकी पिल्लो, कोंकियाओ और नए नैरेटिव गढ़ो

तुम्हारा ट्रेडिशनल आर्गुमेंट और वोटबैंक दोनों ही तुमसे भाग रहे हैं क्योंकि इस सरकार ने तुम्हारे आर्गुमेंट को भी तोड़ा है, और वोटबैंक को भी। दोनों को अपने काम से। चूँकि आँख में घोड़े का बाल और बवासीर वाले पिछवाड़े में गुस्से से तुमने कैक्टस डाल रखा है तो तुम्हें नहीं दिखेगा कि सड़के बनीं, गैस सिलिंडर मिले, फायनेंसियल इन्क्लूजन हुआ, इकॉनमी की हालत बेहतर है, टैक्स देना सहज हुआ, एक करोड़ नए कर दाता जुड़े, तुम्हारे चाचा द्वारा दिए गए लोन को लेकर भागने वालों पर कार्रवाई हो रही है…

मेरठ एक्सप्रेस-वे का सच: यूपीए सरकारों ने सबसे ज़्यादा काम किया

पाँच साल और बनने में लगते तो कॉस्ट थोड़ा और बढ़ता और कितने लोगों को ज़्यादा दिन काम करने का मौक़ा मिलता। आप कहेंगे कि वो मज़दूर कहीं और काम करेंगे! अरे! कहीं और कैसे काम करेंगे? रोज़ सड़कें थोड़े ही बनती हैं। उसको इतनी जल्दी बनवाया जाता रहा, तो कितने लोगों के पास काम नहीं रहेगा।

हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले रोहिंग्या को भारत में शरण क्यों?

इस्लामी राष्ट्रों को आगे बढ़कर इन मुसलमान शरणार्थियों को, बंग्लादेशियों के साथ अपने यहाँ बसाना चाहिए। या फिर यूएन को कुछ जगहों पर इनके रहने खाने की व्यवस्था करनी चाहिए। ये व्यवस्था वहाँ होनी चाहिए जहाँ संसाधनों की प्रचुरता हो, जनसंख्या की कमी हो, वर्कफोर्स की ज़रूरत हो।

कर्णाटक चुनाव: जब अनैतिक लोग नैतिकता की आशा करने लगें तो समझो ग़ज़ल हुई

आप जो माँग रहे हैं वो धूर्तता है। आपकी बेचैनी दिखती है क्योंकि आप जिस विचारधारा को पालते रहे हैं, उसकी सारी मक्कारी जनता पकड़ रही है। आपकी मक्कारी हमारे जैसे लोग पकड़ रहे हैं क्योंकि आपको विकास या आदर्श से कोई लेना-देना नहीं है। आप कार के पीछे भागते गली के वो कुत्ते हैं जिसे ये भी नहीं पता कि उसे कार से उतरकर आदमी पूछ ले कि क्यों भौंक रहा है तो वो क्या जवाब देगा। और तो और, उसे दो बार पुचकारकर बिस्किट फेंक देगा तो वो कार में बैठकर पैर चाटता उसके घर पहुँच जाएगा।

बंगाल चुनावी हिंसा: रवीश जी ने नाक में काग़ज़ की सीक डालकर छींका, किया इज़ इक्वल टू

पूरे आर्टिकल में प्रदेश की मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं लिया गया है। उस सांसद का नाम नहीं लिया गया है जिसने इस हिंसा के आँकड़े को सामान्य बताया है। क्यों? ट्रेन में बिकते जनरल नॉलेज की किताब में ‘कौन सी चिड़िया उड़ते हुए अंडे देती है’ के बाद वाले पन्ने पर ‘राज्य और मुख्यमंत्री’ वाले हिस्से में बंगाल की ममता का नाम नहीं छपा है क्या?