गुजरात चुनाव समीक्षा: कॉन्ग्रेस ईवीएम, ‘भाजपा को 150 नहीं मिले’ के पीछे नहीं छुप सकती

कॉन्ग्रेस नया राहुल ‘दिखा’ तो पाई, लेकिन वो ‘नया’ क्या है, ये कभी ‘बता’ नहीं पाई। पार्टी के दफ़्तर में इस पर पटाखे खूब छूटे कि वो अध्यक्ष बनने वाले हैं लेकिन इससे किसी गुजराती वोटर को क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा ये पता नहीं चला। छवि की बाहरी रूपरेखा सबने देखी, भीतरी विजन क्या था, ये बाहर नहीं आया।

रवीश कुमार सरीखे लोग स्टूडियो से रैलियाँ करना कब बंद करेंगे?

जब बिल अगस्त से ही आपके पास में है, तो चुनाव के दो दिन पहले इसे बिना पढ़े और अपने मन की बातें लिखकर पब्लिक के सामने रखने की क़वायद के पीछे की मंशा क्या है? आपके पास तो चार महीने थे, तब इस ख़बर पर विवेचना और चर्चा क्यों नहीं हुई? आखिर ये मीडिया हिट जॉब नहीं तो फिर क्या है?

अय्यर अभिजात्य रंगभेद के पर्याय हैं, ये ‘उड़ता तीर’ राहुल की जनेऊ काट देगा

आप गाली दीजिएगा, वो उसे कोट पर मेडल बनाकर चिपका लेगा, और कहता फिरेगा कि देखो ये कितना बड़ा अचीवमेंट है।

प्राइम टाइम: मेवाड़ के राजसमंद में ५० साल के मुस्लिम की हत्या किसने की?

ऐसे समय में चुप रहना सहमति देना है इस तरह के उन्माद को। ऐसे समय में चुप रहना बताता है कि आपके मन में चोर है। आप चाहते हैं कि हर मुसलमान ऐसे ही काटकर जला दिया जाय, और आप ये भी चाहते हैं कि पूरी दुनिया में बम और धमाकों के नाम पर इस्लामी हुकूमत आ जाय।

चुनावी सर्वे मूड नहीं बताते, उसे प्रभावित करने का नाकाम ज़रिया हैं

सर्वे ने पहले राहुल को घुसाया और छोटा सा छेद दिखाया; फिर राहुल के सीटों की संख्या बढ़ती दिखाई गई ताकि लगे कि राहुल के ट्वीट, चुटकुलों और गीतों का असर जनता पर हो रहा है और वो राहुल की बात समझ रहे हैं; फिर नए सर्वे में दिखाया जा रहा है कि काँटे की टक्कर है।

प्राइम टाइम: रवीश बाबू, करना तो आपको भी पत्रकारिता चाहिए लेकिन…

प्रधानमंत्री दिल्ली में क्यों नहीं है, वाहियात सवाल है। वो इसलिए कि तंत्र अपने हिसाब से चलता रहता है, और आज के दौर में कम्युनिकेट करना कबूतरों के ज़रिए नहीं होता कि प्रधानमंत्री की ज़रूरत होगी तो पता चलेगा कि बैलगाड़ी पर बैठे हैं, सात दिन में दिल्ली पहुँचेंगे।

जब भंसाली जैसे सक्षम लोग क्रिएटिविटी से ज्यादा कॉन्ट्रोवर्सी पर दाव लगाते हैं

जब बात औक़ात से बाहर जाने लगी तब ट्रेलर में ‘…वो राजपूत’ और ये राजपूत वाला एंगल डाला गया। ये ट्रेलर में डैमेज कंट्रोल हेतु दिया गया है। हो सकता है पहले से ही डालना हो, पर अब तो मैं इसे ऐसे ही देखता हूँ। जब फ़िल्म पद्मावती की है तो ख़िलजी की प्रमोशन को इतना महत्व क्यों?

लुटेरों, बलात्कारियों, आतंकियों की मेनस्ट्रीमिंग कब तक होती रहेगी?

हमलोग एक निकम्मी, मूर्ख, कायर और अव्यवस्थित जनसंख्या थे, जिन्हें महान बलात्कारियों, लुटेरों, और हत्यारों तक ने जीने का तरीक़ा सिखाया। यही तो कारण है कि ग़ुलामी का हर एक प्रतीक हमारे लिए पर्यटन स्थल है।

जस्टिस भंडारी को वर्ल्ड कोर्ट की सीट मिलने के मायने

यूएन में भारत के डिप्लैमैट सैयद अकबरूद्दीन जी के आक्रामक नेगोसिएशन और कैम्पेनिंग के कारण भारत के जेनरल असेंबली में दो तिहाई वोट मिल गए थे।

जहाँ सभ्यताएँ ऐसी रही हैं कि खुदाई में हथियार नहीं मिलते

जहाँ लड़ाई की आवश्यकता है, बेशक हथियार उठा लीजिए, लेकिन तय कीजिए कि हर बात पर लड़ाई ज़रूरी है क्या? अपनी गहरी, फैली जड़ों से नमी खींचिए।