पात्रों पर चर्चा: चुनाव, रचना, विकास साहित्य की विधाओं के संदर्भ में

सबसे ज़रूरी बात ये है कि पात्र हमेशा हमारे इर्द गिर्द होते हैं। उन्हीं से आप नए पात्र गढ़ते हैं। विशुद्ध कल्पना जैसी कोई चीज नहीं होती। हमारी कल्पना वास्तविकताओं के हिस्सों को इधर-उधर जोड़ने और तोड़ने से जन्म लेती है।

प्राइम टाइम: गौरी लंकेश की हत्या पर पत्रकारों का त्वरित फ़ैसला

आपको कितने बाकी रंजनों, कुमारों, पाठकों, यादवों की ख़बर मिली थी? कितनी बार आधे घंटे के अंदर ये तय हो गया कि किस विचारधारा के लोग थे उन्हें मारने वाले? कितनी बार पुलिस ने वैसे लोगों को पकड़ा?